ताजनगरी में मोरारी बापू की रामकथा का भावपूर्ण विश्राम: बोले—वैराग्य संसार से भागना नहीं, बल्कि आसक्ति से मुक्ति है

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आगरा। नौ दिनों तक भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और रामनाम की रसधारा में डूबी ताजनगरी में बुधवार को मोरारी बापू की रामकथा का भावपूर्ण विश्राम हुआ। जेपी वेडिंग ग्राउंड में करूणानिधान परिवार द्वारा आयोजित श्री राम कथा के अंतिम दिन विदाई की संवेदना के साथ कथा पंडाल का वातावरण भक्ति से पुलकित रहा। मोरारी बापू ने आदि गुरु शंकराचार्य के वैराग्य मंत्र के भाव से अंतिम दिवस की शुरुआत करते हुए आगरा के तीर्थों, देवस्थानों, यमुना मैया, धर्माचार्यों, संतों, मठाधीशों और नगर के साहित्यकारों को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि कथा सुनते-सुनते मनुष्य का आरोहण होता है और वैराग्य उसका दूसरा पंख है। संसार में रहते हुए भीतर से मुक्त होना ही सच्चा वैराग्य है।

हम सभी पंछी हैं, वैराग्य हमारा दूसरा पंख

बापू ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य के वैराग्य भाव में मनुष्य की उस आकांक्षा का संकेत है, जिसमें वह पंछी की तरह ऊपर उठना चाहता है। उपनिषदों में भी मनुष्य को पंछी के रूपक से समझाया गया है। हर बार कथा का श्रवण हमारे भीतर एक नया आरोहण करता है।

मोक्ष के बाद क्या होगा, यह मनुष्य नहीं जानता, लेकिन वैराग्य ऐसा मार्ग है जिसमें संसार में रहते हुए भी व्यक्ति भीतर से मुक्त हो सकता है। माता सीता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि रावण के तमाम प्रलोभनों और अत्याचारों के सामने मिथिला की बेटी ने एक छोटे से तिनके को अपनी ढाल बना लिया। साधक जब तीनों गुणों का त्याग कर उस त्याग के अहंकार को भी छोड़ देता है, तब वास्तविक वैराग्य प्रकट होता है।

दान और त्याग का प्रदर्शन मत करो, वरना वैराग्य में भी दाग लग जाएगा

बापू ने कहा कि वैराग्य प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। मौन रहो, मुस्कुराकर देखो और सरल होकर जियो। दान, त्याग और वैराग्य की घोषणा करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि त्याग का भी प्रदर्शन किया तो उसमें दाग लग जाएगा।
तुलसीदास जी द्वारा नवनीत यानी मक्खन के उदाहरण का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि मक्खन में ममता रूपी दोष रह जाता है, इसलिए उसे तपाकर शुद्ध घी बनाना पड़ता है।

युद्ध का विजय रथ लकड़ी का नहीं, धर्म का होता है

रामधुन के बाद बापू लंका कांड में पहुंचे। विभीषण को श्रीराम द्वारा दिए गए ज्ञान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध में विजय का रथ लकड़ी का नहीं, धर्म का होता है। वैराग्य उसकी ढाल है। हृदय में बोध हो तो वैराग्य हमारी रक्षा करता है।

उन्होंने कहा कि वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि आसक्ति से मुक्त होना है। भीतर बह रही भक्ति की धारा की रक्षा के लिए वैराग्य आवश्यक है। मोह जिस भी रूप में सामने आए, वह रावण के समान है।

अंगद का संधि प्रस्ताव नहीं माना, शुरू हुआ घमासान युद्ध

लंका कांड के क्रम में बापू ने अंगद द्वारा रावण के पास संधि प्रस्ताव लेकर जाने का प्रसंग सुनाया। रावण द्वारा प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने के बाद घमासान युद्ध हुआ। लक्ष्मणजी के मूर्छित होने, मेघनाद के वध और अनेक शक्तिशाली राक्षसों के संहार का वर्णन हुआ।

विभीषण ने रावण की नाभि में स्थित अमृत के रहस्य की जानकारी श्रीराम को दी। इसके बाद भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया। बापू ने रावण के चरित्र की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि राम के लिए विजय या पराजय ही अंतिम बात नहीं थी, बल्कि रावण के लिए मोक्ष का मार्ग भी इसी प्रसंग में खुला।

पुष्पक विमान से लौटे राम, अयोध्या में छाया आनंद

लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे। राम और भरत के मिलन का प्रसंग सुनाते हुए बापू ने कहा कि उस समय यह पहचानना कठिन था कि कौन वनवासी है और कौन राजकुमार—दोनों का प्रेम ही सब पर भारी था।

उन्होंने कहा कि अयोध्या का प्रत्येक व्यक्ति श्रीराम के दर्शन के लिए व्याकुल था। प्रभु ने सबके प्रेम का मान रखते हुए प्रत्येक के साथ ऐसा संबंध बनाया कि उसे ईश्वर साक्षात्कार का अनुभव हुआ। अयोध्या पहुंचकर श्रीराम सबसे पहले माताओं से मिले और इसके बाद उनका राज्याभिषेक हुआ। गुरु वशिष्ठ ने प्रथम तिलक किया।

बापू ने भावपूर्ण ढंग से कहा कि उस क्षण केवल अयोध्या के लोग ही नहीं, बल्कि रामकथा से जुड़े चेतन तत्व भी मानो उपस्थित थे। अहिल्या, शबरी, अनसूया, मंदोदरी और त्रिजटा जैसे पात्रों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि रामकथा के पात्र समय की सीमा से परे हैं।

सीता के दूसरे त्याग को लेकर बापू ने रखी अपनी बात

कथा के समापन प्रसंगों में बापू ने माता सीता के दूसरे त्याग, जिसमें श्री राम सीता का त्याग बताया जाता है, से जुड़े उस प्रसंग पर भी चर्चा की, जिसे लेकर अलग-अलग रामकथा परंपराओं में भिन्न मत मिलते हैं। उन्होंने कहा कि जिस रूप में यह प्रसंग लोकप्रिय रूप से बताया जाता है, वह तुलसीदास जी के रामचरितमानस में नहीं है। सीता के दोनों पुत्रों का भी उन्होंने स्मरण किया।

‘राम का स्मरण सत्य, राम को गाना प्रेम और राम को सुनना करुणा’

मोरारी बापू ने सत्य, प्रेम और करुणा की व्याख्या करते हुए कहा—“राम का स्मरण सत्य है, राम को गाना प्रेम है और राम को सुनना करुणा है।” उन्होंने कहा कि रामकथा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर सत्य, प्रेम और करुणा को जागृत करना है।

संत रामस्वरूप आचार्य बोले—आगरा साधारण नगरी नहीं, ऋषियों की भूमि है

कथा विश्राम के अवसर पर कामदगिरि पीठाधीश्वर श्रीमद् जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज भी कथा श्रवण करने पहुंचे। उन्होंने आगरा की पौराणिक और आध्यात्मिक महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि आगरा केवल ऐतिहासिक नगरी नहीं, बल्कि ऋषियों की भूमि और ब्रज क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि ब्रज केवल मथुरा-वृंदावन तक सीमित नहीं, बल्कि आगरा से गोहद की सीमा तक इसका व्यापक सांस्कृतिक विस्तार है।

उन्होंने कहा कि ऋषि पंचमी से आगरा में शुरू हुई मोरारी बापू की रामकथा अपने आप में विशेष है। ऋषि पंचमी ऋषियों का पर्व है और इसी दिन से कथा का शुभारंभ होना ऋषियों की प्रेरणा का संकेत है। उन्होंने कहा कि बापू ने तुलसीदास जी को बहुत गाया है और तुलसीदास जी की कृपा भी उन पर परिपूर्ण है।

स्वामी रामस्वरूपाचार्य ने कहा कि कथाएं बहुत होती हैं और आगे भी होती रहेंगी, लेकिन ऋषि पंचमी से अग्रवन में हुई यह कथा ऋषि-मुनियों की प्रेरणा का प्रसाद है। ऋषि और मुनि दोनों के गुण जहां मिल जाते हैं, वहां परम साधु का दर्शन होता है।

उन्होंने संत की व्याख्या करते हुए कहा कि जहां समस्त कामनाओं का अंत हो जाए, वहीं संत तत्व प्रकट होता है। उन्होंने भद्र पुरुष को साधु की संज्ञा दी।

‘81 बापूजी की आवाज टनाटन’

मोरारी बापू की आयु और कथा के प्रति उनकी ऊर्जा का उल्लेख करते हुए स्वामी रामस्वरूप आचार्य ने कहा—“81 बापूजी की आवाज टनाटन है।” उन्होंने कहा कि यह ऊर्जा केवल शरीर से नहीं, बल्कि राम रसायन से मिल रही है। बापू राम रसायन का पान करते हैं और अपने भक्तों को भी उसका रस प्रदान करते हैं।

उन्होंने कामदगिरि पर्वत की महिमा का उल्लेख करते हुए गोवर्धन और कामदगिरि की परिक्रमा की आध्यात्मिक महत्ता भी बताई।

नौ दिनों की कथा के लिए करुणानिधान परिवार ने जताया आभार

करुणानिधान परिवार की ओर से नौ दिनों तक कथा में पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं, संतों, धर्माचार्यों, सहयोगियों और कथा व्यास मोरारी बापू के प्रति आभार व्यक्त किया गया। आयोजकों ने कहा कि 23 वर्ष बाद आगरा की धरती पर हुई इस रामकथा ने ताजनगरी को नौ दिनों तक रामनाम, भक्ति, ज्ञान, प्रेम और वैराग्य के भाव से जोड़े रखा।

Dr. Bhanu Pratap Singh