आगरा। करुणानिधान परिवार द्वारा जेपी वेडिंग ग्राउंड, फतेहाबाद रोड पर चल रही मोरारी बापू की रामकथा के आठवें दिन कथा का आरंभ मानस ऋषि पंचमी के भाव को आगे बढ़ाते हुए ऋषियों, मुनियों और साधुओं को प्रणाम से हुआ। बापू ने कहा कि हरिभजन करते-करते प्रबल दोष और तीव्र पाप भी क्षीण होने लगते हैं। जिसके दोष हरिभजन से अपने आप मिटने लगें, वह ऋषि भाव की ओर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि मानस में हनुमानजी और भरतजी ऐसे साधु हैं, जिनमें ऋषि और मुनि दोनों के गुण दिखाई देते हैं। हनुमानजी सेवा-परायण साधु हैं तो भरतजी त्याग और वैराग्य के आदर्श।
सफल होकर भी सरल और सजल रहना ही साधुता
बापू ने कहा कि साधु कोई पद या क्रिया नहीं, बल्कि एक स्वभाव है। जो सबल होकर भी सरल रहे और जिसके नेत्रों में करुणा का रस हो, वह परम साधु है। उन्होंने संतों के प्रति श्रद्धा रखने और किसी साधु, संत अथवा देव परंपरा की निंदा से बचने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर की भक्ति और साधु से प्रेम मनुष्य के भीतर परिवर्तन लाता है।
हनुमानजी और भरतजी के प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने साधुता, सेवा और त्याग की व्याख्या की। हनुमानजी द्वारा संजीवनी पर्वत ले जाने के प्रसंग में भरतजी द्वारा गुरु और आराध्य की शक्ति का स्मरण कराने की बात कही। बापू ने गुरु के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा करते हुए कहा कि गुरु जीवन को दिशा देने वाली शक्ति है।
पंचमियों में भी है साधना और स्मरण का संदेश
बापू ने ऋषि पंचमी सहित वर्ष की विभिन्न पंचमियों का उल्लेख किया। लाभ पंचमी, विवाह पंचमी, वसंत पंचमी, रंग पंचमी, श्री पंचमी, नाग पंचमी और ललिता पंचमी आदि पर्वों की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में तिथियां केवल तारीखें नहीं, बल्कि साधना, स्मरण और संस्कार के अवसर हैं।
रामकथा किसी संप्रदाय की नहीं, पूरे जग की कथा
बापू ने कहा कि रामकथा किसी संप्रदाय की नहीं, पूरे जग की कथा है। रामचरितमानस पढ़ना चाहिए, लेकिन उससे पहले उसका श्रवण करना जरूरी है। श्रवण से कथा के प्रति प्रीति पैदा होती है। उन्होंने कहा कि कथा के आयोजन में अन्न वितरण और प्रसादी की परंपरा भी अवश्य होनी चाहिए।
इसी भाव में उन्होंने गुरु नानक की पंगत-संगत और सिख परंपरा के लंगर का स्मरण किया। उन्होंने कहा—“भजन करो और भोजन करो।” इसके बाद भजन-कीर्तन के साथ अयोध्या कांड में प्रवेश हुआ।
युवावस्था में गुरु की शरण, समय पर जिम्मेदारी छोड़ना सीखें
अयोध्या कांड की शुरुआत गुरु वंदना से करते हुए बापू ने कहा कि युवावस्था में प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी गुरु की शरण अवश्य लेनी चाहिए। उन्होंने अयोध्या, मिथिला, किष्किंधा और लंका की आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता बताते हुए कहा कि चित्रकूट को प्रेम की नगरी भी कहा जा सकता है।
दशरथजी के प्रसंग से परिवारों को संदेश देते हुए बापू ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को दर्पण में स्वयं को देखकर समय की पहचान करनी चाहिए। सफेद बाल दिखाई देने लगें तो समझना चाहिए कि अब संतान को परिवार और कारोबार की जिम्मेदारी सौंपने का समय आ गया है। संतान को जिम्मेदारी दें, लेकिन उसके जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। पुत्रवधू की प्रशंसा करें और परिवार में प्रेम बनाए रखें।
राज्याभिषेक से वनवास तक
कथा में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों का प्रसंग आया। परिस्थितियों और वचनबद्धता के कारण श्रीराम को वनवास मिला। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन की ओर चले। मार्ग में ऋषि-मुनियों के आश्रमों का प्रसंग आया और अत्रि-अनसूया आश्रम में पहुंचने तथा पंचवटी में निवास का वर्णन हुआ।
इसी क्रम में सुमंत के अयोध्या लौटने, दशरथजी की व्याकुलता और भरत के चित्रकूट पहुंचने का प्रसंग आया।
भरत ने श्रीराम को अयोध्या लौटने के लिए मनाया, लेकिन प्रभु ने पिता के वचन की मर्यादा निभाई। भरत ने श्रीराम की खड़ाऊं को स्वीकार किया और नंदीग्राम में रहकर राज्य का संचालन किया। बापू ने कहा कि भरत ने कभी अपने वैराग्य का प्रदर्शन नहीं किया, उनका त्याग सहज था।
चित्रकूट से पंचवटी और शूर्पणखा प्रसंग
कथा आगे बढ़ी तो श्रीराम के चित्रकूट और पंचवटी प्रवास, ऋषियों से भेंट और शूर्पणखा प्रसंग का वर्णन हुआ। बापू ने मानस में प्रयुक्त ‘बड़भागी’ शब्द की चर्चा करते हुए कहा कि गुरु के चरणों में अनुराग रखने वाला भी बड़भागी है। जटायु के लिए व्यक्त किए गए भाव का भी उन्होंने स्मरण कराया।
किष्किंधा में सुग्रीव से मित्रता, हनुमानजी को मिली अपनी शक्ति की पहचान
कथा किष्किंधा कांड में पहुंची तो बाली-सुग्रीव युद्ध और श्रीराम-सुग्रीव मित्रता का प्रसंग आया। सीता की खोज के लिए वानर दल को चारों दिशाओं में भेजा गया। दक्षिण दिशा की ओर जामवंतजी के साथ हनुमानजी को भेजा गया।
जब हनुमानजी अपनी शक्ति को भूल गए तो जामवंतजी ने उन्हें उनकी सामर्थ्य का स्मरण कराया। बापू ने कहा कि कई बार मनुष्य अपनी शक्ति भूल जाता है, ऐसे समय गुरु या संत उसे उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं।
समुद्र लांघकर लंका पहुंचे हनुमान, सीता को दी राम की मुद्रिका
हनुमानजी समुद्र लांघकर लंका पहुंचे। विभीषण से भेंट के बाद अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन किए और उन्हें श्रीराम की मुद्रिका दी। बापू ने कहा कि हनुमानजी का लंका जलाना मूल उद्देश्य नहीं था। त्रिजटा के स्वप्न का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आगे ऐसी लीला बनी कि लंका दहन हुआ।
हनुमानजी माता सीता से चूड़ामणि लेकर वापस लौटे और श्रीराम को पूरा समाचार दिया। प्रभु ने हनुमानजी को हृदय से लगा लिया। बापू ने इस प्रसंग को सेवा और समर्पण की पराकाष्ठा बताते हुए कहा कि हनुमानजी की सेवा का ऋण चुकाना स्वयं श्रीराम के लिए भी संभव नहीं।
लंका पर चढ़ाई और रामेश्वरम स्थापना
कथा इसके बाद लंका पर चढ़ाई और रामेश्वरम स्थापना के प्रसंग तक पहुंची। बापू ने कहा कि रामकथा में सेवा, त्याग, प्रेम, मर्यादा और समर्पण के सभी सूत्र एक साथ दिखाई देते हैं। साधु का स्वभाव हो, भरत का त्याग हो या हनुमानजी की सेवा—हर प्रसंग मनुष्य को अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है।
बुधवार को सुबह नौ बजे से होगी अंतिम दिन की कथा
मोरारी बापू ने मंच से घोषणा की कि बुधवार को कथा के अंतिम दिन सुबह 9 बजे से कथा प्रारंभ होगी और लगभग 12 बजे विश्राम होगा।
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