आगरा के चर्चित तेजाब कांड में अदालत का ऐतिहासिक फैसला: 13 महीने जेल काटने के बाद निर्दोष साबित हुआ कल्लू, असली आरोपियों पर चलेगा नया मुकदमा

Crime

उत्तर प्रदेश के ताजनगरी आगरा की एक स्थानीय अदालत ने शाहगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत हुए बेहद चर्चित और खौफनाक तेजाब कांड में एक बहुत ही अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पुलिस की त्रुटिपूर्ण और लापरवाह विवेचना पर तीखे सवाल खड़े करते हुए उस बेकसूर व्यक्ति को बड़ी राहत दी है, जिसे बिना किसी अपराध के 13 महीने तक सलाखों के पीछे जिंदगी गुजारनी पड़ी थी। इस मामले में न्यायालय ने अब वास्तविक और छुपे हुए आरोपियों को तलब करते हुए उनके खिलाफ नए सिरे से मुकदमा चलाने का सख्त आदेश जारी किया है।

प्राप्त जानकारी और न्यायालय के दस्तावेजों के मुताबिक, यह सनसनीखेज घटना मई 2022 की है, जब वादी असलम की पत्नी रेशमा, बेटी इल्मा और बेटे साहिल पर अज्ञात बदमाशों द्वारा तेजाब फेंक दिया गया था। इस मामले की शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने जल्दबाजी दिखाते हुए कल्लू नामक एक निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया था। बाद में वादी असलम ने खुद अदालत में यह सच्चाई बयां की कि घटना के वक्त सदमे और घबराहट के माहौल में पुलिस तथा असली दोषियों ने मिलकर उससे बिना कुछ पढ़वाए एक झूठी तहरीर पर जबरन हस्ताक्षर करवा लिए थे, जिसकी आड़ में एक बेकसूर कल्लू को फंसा दिया गया।

​अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाहों और खुद तेजाब कांड की पीड़ितों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए अदालत के सामने असल सच रखा। वादी की तरफ से पैरवी कर रहे प्रख्यात अधिवक्ता नरेश पारस ने अदालत में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 के तहत एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। अपनी सतत कानूनी रिसर्च और मजबूत तर्कों के आधार पर उन्होंने माननीय न्यायालय को अवगत कराया कि मासूमों पर तेजाब कल्लू ने नहीं, बल्कि खुद वादी असलम के अपने सगे भाइयों रिजवान और फैजान ने फेंका था।

पारिवारिक विवाद और आपसी रंजिश के चलते मकान खाली कराने की नीयत से इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया गया था। अधिवक्ता नरेश पारस ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न दृष्टांतों और कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए असली अपराधियों को कटघरे में खड़े करने की जोरदार मांग की। वहीं दूसरी ओर, बचाव पक्ष के अधिवक्ता विजय आहूजा ने भी अदालत में अपने कानूनी तर्क रखे।

मामले की सुनवाई कर रहे अपर सत्र न्यायाधीश (न्यायालय संख्या-1) माननीय पुष्कर उपाध्याय की अदालत ने पत्रावली पर मौजूद तमाम साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और पुलिस डायरी का बेहद गहनता से अवलोकन किया। गवाहों के बयनों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि तेजाब फेंकने का यह कृत्य असल में रिजवान और फैजान ने ही किया था और विरोध करने पर उन्होंने पीड़ितों को चाकू दिखाकर जान से मारने की धमकी भी दी थी।

अदालत ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया असली और वास्तविक आरोपी रिजवान और फैजान ही हैं। न्यायालय ने विवेचना कर रहे अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर असंतोष जताते हुए उसे दरकिनार कर दिया और न्यायहित में वादी पक्ष के प्रार्थना पत्र को पूर्णतः स्वीकार कर लिया।

अदालत ने दोनों नए आरोपियों—रिजवान और फैजान—को भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं (धारा 326ए और 506) के तहत विचारण (ट्रायल) के लिए आगामी 15 सितंबर 2026 को अदालत में तलब किया है। इस ऐतिहासिक आदेश के बाद अब इस पूरे केस का ट्रायल बिल्कुल नए सिरे से आगे बढ़ेगा।

यह फैसला उन पीड़ित महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी कानूनी जीत है, जो लंबे समय से न्याय की आस में कड़ा संघर्ष कर रही थीं। इस न्यायसंगत फैसले से यह साफ हो गया है कि अब कानून की गिरफ्त से असली गुनाहगार बच नहीं सकेंगे।

Dr. Bhanu Pratap Singh