संघ प्रमुख की दो टूक: दुनिया से लेन-देन करेंगे, लेकिन अपनी शर्तों पर; दबाव में नहीं लेगी सरकार कोई फैसला

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मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक नीति पर बड़ा बयान दिया है। भारत और अमेरिका के बीच हालिया ट्रेड डील की पृष्ठभूमि में उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत दुनिया से अलग-थलग नहीं रह सकता, लेकिन व्यापारिक लेन-देन किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर होगा।

​स्वदेशी और अर्थव्यवस्था

मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लेन-देन अनिवार्य है और सरकारी नीतियां अपनी गति से आगे बढ़ेंगी। हालांकि, उन्होंने नागरिकों से अपील की कि व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर ‘स्वदेशी’ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, “हम जो भी खरीदारी करें, वह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली होनी चाहिए। विदेशी वस्तुओं को केवल तभी अपनाएं जब कोई स्वदेशी विकल्प उपलब्ध न हो।

हिंदुत्व और विश्व गुरु का विजन

हिंदुत्व पर चर्चा करते हुए भागवत ने हिंदुओं को चार श्रेणियों में बांटा—गर्व करने वाले, उदासीन, डरकर बोलने वाले और अपनी पहचान भूल चुके हिंदू। उन्होंने कहा कि भारत को ‘विश्व गुरु’ केवल भाषणों से नहीं बल्कि ठोस उदाहरणों से बनना होगा। उन्होंने याद दिलाया कि भारतीय होना एक ऐसा हुनर है जो विरासत में मिला है, और अब समय है कि इसे पूरी दुनिया के सामने एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाए।

Dr. Bhanu Pratap Singh