न्याय पालिका ने हाल ही में राज सभा और संबंधित अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करते हुए एक बड़ा ही ‘अजीब’ सवाल पूछ लिया। कोर्ट ने पूछा कि जब इंद्रप्रस्थ की हवा ‘इमरजेंसी’ के दौर से गुजर रही है और लोग सांस के बदले जहर फांक रहे हैं, तो एयर प्यूरीफायर जैसी जीवनरक्षक मशीन पर टैक्स का चाबुक क्यों चलाया जा रहा है? माननीय का तर्क सीधा था—अगर हुकूमत जनता को मुफ्त की साफ हवा मुहैया नहीं करा सकती, तो कम से कम साफ हवा खरीदने के रास्ते में ‘टैक्स’ की दीवार तो ऊँची न करे।
लेकिन माननीय शायद इस बात से अनजान है कि हमारी सरकारें ‘शुद्ध हवा’ से ज्यादा ‘शुद्ध आंकड़ों’ और ‘प्रतीकात्मक युद्धों’ में विश्वास रखती हैं। प्रदूषण को हराने के लिए इंद्रप्रस्थ में जो ‘युद्ध स्तर’ पर तैयारी चल रही है, उसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी।
मंत्री जी का ‘वार्तालाप’ और तंदूर का ‘पाप’
अब देखिए न, इंद्रप्रस्थ के मंत्री हर 15 दिन में प्रदूषण के पास जाकर हाथ जोड़कर या शायद आंखें दिखाकर कह रहे हैं—”तुझे जाना पड़ेगा भाई!” यह एक अलग ही किस्म की कूटनीति है, जहाँ जहर से लड़ने के लिए मास्क की नहीं, बल्कि ‘मन्नत’ की जरूरत महसूस की जा रही है।
इस महायुद्ध में सबसे बड़ा ‘दुश्मन’ निकलकर आया है—तंदूर। जी हां, वही मिट्टी का ढांचा जिसमें आपकी तंदूरी रोटी सिकती थी। सरकार ने तंदूरों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। अब आप तंदूरी रोटी का लुत्फ नहीं ले सकते क्योंकि हुकूमत का मानना है कि इंद्रप्रस्थ के फेफड़ों को सड़ने से बचाने के लिए उस एक तंदूर का बुझना जरूरी है।
सिस्टम का चश्मा और चयनात्मक न्याय
सिस्टम की परिभाषाएं बड़ी दिलचस्प हैं:
सड़कों पर रेंगती लाखों गाड़ियां जो दिन-रात जहरीला धुआं उगलती हैं, उन्हें ‘जरूरत’ के खाते में डाल दिया गया है। कोयले से चलने वाले विशाल पावर प्लांट जो आसमान को काला कर रहे हैं, वे ‘इकोनॉमी’ की रीढ़ हैं। मानकों को ताक पर रखकर उड़ती कंस्ट्रक्शन की धूल ‘डेवलपमेंट’ का चमकता हुआ चेहरा है। और फैक्ट्रियों से निकलता केमिकल युक्त धुआं… वो तो मानो देश की तरक्की की अगरबत्ती है। लेकिन, जैसे ही किसी गरीब ढाबे वाले का तंदूर सुलगता है, पर्यावरण प्रेमियों और सिस्टम की आत्मा जाग जाती है। अचानक लगने लगता है कि हिमालय पिघलने और दिल्ली के घुटने के पीछे यही एक तंदूर जिम्मेदार है। दरअसल, सिस्टम को हमेशा एक ऐसे अपराधी की तलाश होती है जो पलटकर सवाल न पूछ सके। तंदूर बंद कराने में न कोई बड़ा कॉर्पोरेट रिस्क है, न ही कोई वोट बैंक का बड़ा आंदोलन। बस एक आदेश निकालिए और हेडलाइन चमकाइए—“प्रदूषण के खिलाफ सरकार का वज्रपात!”
अंधेर नगरी और आधुनिक न्याय
यह पूरा परिदृश्य भारतेंदु हरिश्चंद्र के कालजयी नाटक ‘अंधेर नगरी’ की याद दिलाता है। वही मशहूर कहावत—”अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।” उस नाटक में दीवार गिरने से एक बकरी मर जाती है और न्याय की तलाश में राजा साहब एक के बाद एक को फांसी के फंदे तक ले जाते हैं। अंत में जब असली दोषी नहीं मिलता, तो सिर्फ इसलिए किसी निर्दोष को फांसी पर चढ़ाने का हुक्म दे दिया जाता है क्योंकि उसकी गर्दन फांसी के फंदे में फिट बैठती थी।
आज का ‘प्रदूषण प्रबंधन’ भी उसी नाटक का सजीव मंचन है। यहाँ ‘साफ हवा’ की मौत हो चुकी है, अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं, और व्यवस्था एक ‘तंदूर’ की गर्दन ढूंढ लाई है ताकि न्याय की खानापूर्ति की जा सके। एयर प्यूरीफायर पर टैक्स वसूलना और तंदूर बंद करना, दरअसल उसी ‘चौपट राजा’ वाली मानसिकता का विस्तार है, जहाँ समाधान खोजने के बजाय जनता की मजबूरी पर टैक्स वसूला जाता है और छोटे को बलि का बकरा बनाकर बड़े अपराधियों को क्लीन चिट दे दी जाती है।
साभार सहित सोशल मीडिया
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