वंदे मातरम् : राष्ट्रभक्ति का अमर गीत
मानव भावनाओं की असीम दुनिया
मनुष्य की विचार-शक्ति जहाँ थक जाती है, कल्पना और तर्क-शक्ति जहाँ मार्ग नहीं खोज पाती, बुद्धि असहाय हो जाती है, हृदयगत भावों की दुनिया वहाँ से प्रारंभ होती है। मानव-मस्तिष्क की उड़ान सीमित है, परन्तु सहानुभूति, ममता, त्याग, दया, करुणा, प्रेम, श्रद्धा, भक्ति आदि का संसार अनन्त आकाश की तरह असीमित है, अपरिमित है। धवल उज्ज्वल मंगलमय क्रान्तिकारी विचार जब पवित्र भावों की भूमि पर अंकुरित होते हैं तो उनका अप्रतिम सौंदर्य, लावण्यमयी मादकता और अनुपम छटा दीवाना बना देती है, पागलपन की हद तक पहुँचा देती है।
बंकिम चन्द्र चटर्जी की प्रेरणा
एक सितम्बर १८७५ की अविस्मरणीय रोचक घटना है—बंगाल के महान उपन्यासकार बंकिम चन्द्र चटर्जी कलकत्ता से रेलगाड़ी द्वारा अपने गाँव जा रहे थे। मौसम बहुत सुहावना और मनमोहक था। रेलगाड़ी सिआलदहा से नैहाटी जा रही थी। बीच में कांतलपुर रेलवे स्टेशन था, जहाँ गाड़ी से उतर कर उन्हें अपने घर जाना था। उस शाम खेतों में धान के हरे-हरे पौधे, मातृभूमि की श्याम हरीतिमा को अलौकिक सौंदर्य प्रदान कर रहे थे। शीतल वायु के हल्के-हल्के झोंके रंग-बिरंगे फूलों की भीनी-भीनी गंध वातावरण को मादक बना रहे थे। कल-कल करते झरने, विविधा पशु-पक्षियों का कौतूहलपूर्ण कोलाहल विहंगम दृश्य उपस्थित कर रहा था। दूर-दूर तक बिखरी प्रकृति की सौंदर्यमयी रमणीयता ने कवि को रोमांचित कर दिया, उनका हृदय आनन्द से भर गया, मन-मयूर नाच उठा। मातृभूमि के इस विराट सौदर्य में बंकिम अपनी सुधबुध खो बैठे। कुछ क्षणों तक शून्य में टकटकी बाँधे देखते रहे। उनके हृदय का सौंदर्य फूट पड़ा। बंकिम ने भारत माँ को मन ही मन नमन किया, भरे हृदय से साष्टांग प्रणाम किया और माँ की आराधना करने लगे। पल-पल की नवीन अनुभूतियों को अभिव्यक्ति का सशक्त स्वर मिलता चला गया। लय एवं संगीतबद्ध कालजयी गीत ‘वन्दे मातरम्‘ रच गया।
वन्दे मातरम् का महत्व
‘वन्दे मातरम्’ पवित्र राष्ट्रीय भावों का अलौकिक गीत है। यह राष्ट्र के प्रति सच्चे समर्पण, भक्ति और मातृभूमि की वन्दना का प्रतीक है। यह भारत माँ का गायत्री मंत्र है, स्वाधीनता संग्राम का अपराजेय महामंत्र।
गीत की प्रेरणा और प्रभाव
बंकिम ने बार-बार इस गीत की पंक्तियों को दोहराया। हर बार उन्हें नयी अनुभूति मिली। हृदय के उज्ज्वल पक्ष द्वारा भारत माता की वन्दना का यह स्रोत बंगला और संस्कृत में रचा गया। १९८२ में उन्होंने “आनन्दमठ” लिखा, जिसमें ‘वन्दे मातरम्’ को महत्वपूर्ण स्थान मिला।
कांग्रेस अधिवेशनों में गूंज
१८८६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार यह गीत सस्वर गाया गया। टाउन हॉल गूँज उठा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे अपने जीवन का श्रेष्ठ गीत कहा और स्वयं धुन बनाकर गाया। उन्होंने कहा, “यह गीत नहीं था, यह पिघलती हुई आग थी।”
राष्ट्रीय आंदोलन का नारा बना
बंकिम ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन यह गीत पूरे देश को झकझोर देगा — और ऐसा ही हुआ। १६०५ के बंगाल विभाजन के विरोध में ‘वन्दे मातरम्’ के नारे से पूरा भारत गूंज उठा। यह क्रान्ति का पर्याय बन गया।
ब्रिटिश विरोध और प्रतिबंध
ब्रिटिश शासन ने जब देखा कि यह गीत भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध रहा है, तो उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर भी यह गीत हर अधिवेशन में गाया जाता रहा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भतीजी सरला देवी ने इसका गायन किया। भगिनी निवेदिता ने कहा, “जब ‘वन्दे मातरम्’ गाया गया, सभी श्रोता एक उन्मत्त परंतु गरिमामयी भावना में बह गये।”
आन्दोलन की ज्वाला और प्रसार
बैनरों और बिल्लों पर इस गीत के शब्द लिखे जाने लगे। १६०६ में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और विपिन चन्द्र पाल के नेतृत्व में बरिसाल में विशाल जुलूस निकला, जिस पर पुलिस ने बर्बरता की। फिर भी पूरे देश में ‘वन्दे मातरम्’ गूंजता रहा।
राष्ट्र चेतना का प्रतीक
विपिन चन्द्र पाल ने इसे दक्षिण भारत तक पहुँचाया। सुब्रह्मण्यम भारती ने इस पर आधारित तमिल गीत लिखा। मैडम कामा ने १८०७ में इसका तिरंगा फहराया। महात्मा गाँधी और सरदार पटेल ने अपने भाषणों की समाप्ति इसी जयघोष से की। ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई।
अमर गीत की सार्वभौमिकता
‘वन्दे मातरम्’ ने भारतीयों में अदम्य साहस, वीरता और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना भरी। इसने स्वाधीनता आन्दोलन को नयी दिशा दी। आज भी इस गीत में ताजगी, प्रेरणा और अलौकिक शक्ति है। इसकी प्रासंगिकता चिरस्थायी है, सार्वभौमिक है। आओ, हम सब मिलकर ऐसे अमर गीत को नमन करें, अभिनन्दन करें।
डॉ देवी सिंह नरवार, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष, हिंदी साहित्य भारती अंतरराष्ट्रीय
संपादकीय
डॉ देवी सिंह नरवार ने वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर जो शोधपूर्ण, ओजस्वी और प्रेरणादायक लेख लिखा है, वह न केवल भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास को पुनर्जीवित करता है बल्कि आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने इस अमर गीत की उत्पत्ति, भावना और उसके राष्ट्रीय चेतना में योगदान को जिस गहराई से प्रस्तुत किया है, वह अद्वितीय है। डॉ देवी सिंह नरवार को इस अद्भुत लेखन के लिए साधुवाद। यह लेख हर भारतीय के भीतर राष्ट्रप्रेम की ज्वाला को फिर से प्रज्वलित कर देता है।
— डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
Live Story Time, Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.
- लोकसभा में गूंजी ब्रज की आवाज: सांसद राजकुमार चाहर ने उठाई ‘स्पेशल पैकेज’ की मांग, TTZ बाधाओं पर जताई चिंता - March 12, 2026
- आगरा स्कूल बस हादसा: मासूम नैना की मौत के बाद एक्शन में प्रशासन, स्कूल की मान्यता रद्द करने की संस्तुति, जर्जर बस में सीढ़ी की जगह लगी थी लकड़ी की तख्ती - March 12, 2026
- आगरा में ‘फाइनेंस माफिया’ का नंगा नाच: बीमार मां को अस्पताल ले जा रहे युवक की बीच सड़क छीनी बाइक, बोले- थाने को 50 हजार महीना देते हैं… - March 12, 2026