रोहित शेट्टी और अजय देवगन से पूछा गया था कि कोई भारतीय परिवेश यानी सनातन के इर्दगिर्द कंटेंट बनायेंगे। तब उन्होंने कहा नहीं, उदाहरण देते हुए कहा कि, “शोले में महादेव के पीछे खड़े होकर वीरू और बसंती वाला सीक्वेंस आज होता तो बवाल मचाता”
अर्थात् भावनाएं आहत हो जाती है इसलिए ऐसे दृश्य नहीं रख सकते है। ठीक बात भी है।
जब पुष्पा से अल्लू अर्जुन का काली माता गेटअप में पहला पोस्टर आया था तो सवाल उठे थे कि हाथ में रिवॉल्वर है। ऐसे नहीं दिखाना चाहिए था।
पिछले साल माँ काली को स्मोकिंग के साथ प्रस्तुत किया था तब ज्यादा सवाल सुनने को नहीं मिले थे सिर्फ राष्ट्रवादी विंग ने विरोध दर्ज करवाया था।
रिवॉल्वर, समय के साथ वाला अस्त्र है। माँ काली के हाथ में अस्त्र रहते है। खैर
सुकुमार ने माँ काली वाले सीक्वेंस अद्भुत फ़िल्मायें है उन्हें बड़ा बनाया है और सभ्य तरीक़े से ऐसा किया है। इसी परिदृश्य में पुष्पा महादेव की पूजा करके शंखनाद करता है। ऐसे सीक्वेंस पूरे भाव के साथ बनते है तब विरोध नहीं कनेक्टिव फील देता है।
रोहित शेट्टी और अजय में ऐसा भाव नहीं था, तभी तो उनकी बनाई रामायण जुगलबंदी सिंघम हिट के लिए संघर्ष कर रही है तो वही, कहानी कनेक्टिव नहीं बनी। यक़ीनन बॉलीवुड शुरुआती सालों में ही अपनी संस्कृति से कटता चला गया और दूसरी संस्कृति को अपनाने के चक्कर में लुढ़क बैठा। इसके प्रतिउत्तर में ऋषभ ने कहा कि, अपने मूल से हटेंगे तो सफलता नहीं लगेगी। मूल में रहेंगे तो लोगों से जुड़ेंगे।
साउथ सिनेमा से तेलुगू और कन्नड़ कंटेंट नार्थ में अच्छा रिस्पांस बटोर रहे है।
बाहुबली ने शंखनाद किया तो पुष्पा ने आगे बढ़ाया है। अच्छा और बुरा दोनों शेड्स रहते है, लेकिन अपने रीजन में रहे तो जुड़ाव देते है।
नितेश तिवारी रामायण शुरू किए है अगर वाकई अच्छे भाव में बनायें तो कनेक्ट करेंगे वरना आदिपुरुष होने में देर नहीं लगेगी। ओम राउत और मनोज मुंतशिर के केंद्र में रामायण नहीं थी तो दर्शकों ने लतिया दिए।
जिसे आप फील करते है और फिर कहानी से सिनेमा में लाते है दर्शक हाथोंहाथ लेते है। महज माहौल को देखते हुए आयेंगे तो मात खाएँगे। ऋषभ शेट्टी कांतारा प्रीक्वल में बिग स्केल ले कर आयेंगे।
उत्तर भारत ने क्लियर शब्दों में पुष्पा से बतला दिया है कि भारतीयता वाले कंटेंट होंगे तो बॉक्स ऑफिस ज़ोरों से शंखनाद होगा।
-ओम लवानिया
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