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गुरु पूर्णिमा 24 कोः राधास्वामी मत के आचार्य दादाजी महाराज ने बताई सच्चे गुरु की पहचान, पढ़िए आत्मा को तृप्त करने वाला आध्यात्मिक साक्षात्कार

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160 वर्ष पूर्व आगरा में स्थापित राधास्वामी मत में गुरु परंपरा

हजूरी भवन में हजूर महाराज की समाध पर होगा विशेष सत्संग

डॉ. भानु प्रताप सिंह

Agra, Uttar Pradesh, India. इस बार गुरु पूर्णिमा महोत्सव 24 जुलाई, 2021 को है। आगरा शहर में 160 वर्ष पूर्व राधास्वामी मत की स्थापना हुई। राधास्वामी मत का आदि केन्द्र हजूरी भवन पीपल मंडी, आगरा में है, जहां हजूर महाराज की समाधि है। यहां गुरु पूर्णिमा पर विशेष सत्संग होगा। राधास्वामी मत में गुरु परंपरा है। प्रथम गुरु स्वामी जी महाराज, द्वितीय हजूर महाराज, तृतीय गुरु लालाजी महाराज, चतुर्थ गुरु कुँवरजी महाराज थे। वर्तमान आचार्य दादाजी महाराज (प्रो. अगम प्रसाद माथुर) हैं। वे आगरा विश्वविद्यालय के लगातार जो बार कुलपति रहे हैं, जो एक रिकॉर्ड है। उन्होंने विशेष बातचीत में गुरु की महिमा बताई। साथ ही कहा- मालिक का सच्चा सेवक और भक्त वही होता है जो स्वयं गरल पीकर अमृत बांटता है। प्रस्तुत हैं मुख्य अंशः

डॉ. भानु प्रताप सिंहः राधास्वामी मत क्या है?

दादाजी महाराजः राधास्वामी नाम एक ध्वन्यात्मक नाम है। सृष्टि रचना में मालिक में स्वयं को सर्वप्रथम शब्द में अवतरित किया। निर्मल आत्मतत्व के सृजनात्मक गुण से गति प्रेरित हुई, जिसके साथ निर्मल आध्यात्मिक ध्वनि हुई। राधास्वामी ही सृष्टि में सर्वव्यापक ध्वनि शब्द है तथा भक्त इसे आध्यात्मिक अभ्यास (योग) के समय अपने अंतर में सुन सकता है। राधास्वामी वह आध्यात्मिक धुन है जो रचना के समय सर्वोच्च लोक में अनवरत गाज रही है। मौलिक धुन अथवा आदि शब्द (प्रथम धुन) ही स्वामी है। राधा वह सृजनात्मक शक्ति है, जो आदि शब्द से प्रकट हुई। स्वामी शब्द का भंडार है। द्वितीय गुरु हजूर महाराज ने महाप्रकाशवान धुन राधास्वामी अंतर में श्रवण की औऱ अपने गुरु स्वामी जी महाराज को राधास्वामी साहब कहकर संबोधित करने लगे। उन्हें कुल मालिक राधास्वामी का अवतार मानने लगे। जो भक्त सुरत-शब्द-योग का अभ्यास करता है और ऐसे आध्यात्मिक उत्थान की प्राप्ति कर पता है कि सतगुरु को कुलमालिक से एकात्मक कर सके, वही राधास्वामी नाम के रहस्य का उद्घाटन कर सकता है।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः गुरु क्या करते हैं?

दादाजी महाराजः सतगुरु अपने सूक्ष्म रूप से भक्तों को विशुद्ध आत्मतत्व की निरकार रचना तक ले जाते हैं। आध्यात्मिक योग साधना के समय इस सत्य का भास करा देते हैं। वे अपनी आध्यात्मिक शक्ति को संसार में प्रदर्शित नहीं करते। जीव सतगुरु की मेहर से ही काम क्रोध, मद लोभ, मोह और अहंकार की कुप्रवृत्तियों से संघर्ष कर सकता है। काल, मन और माया के जाल से मुक्त हो सकता है।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः भक्तजन क्या करें?

दुनिया की चिन्ता न करके अपना ध्यान अंतर में लगाएं। गुरु स्वरूप का ध्यान करें। राधास्वामी नाम का सुमिरन और अंतर में धुन को सुनना है। ये अभ्यास निरंतर जारी रखें। कोई काम कानून के विरुद्ध न करें। हमको शांति से रहना चाहिए। प्रेम से रहना चाहिए। आपस में भ्रातृत्व की आवश्यकता है। बहुत बिखराव हो रहा है। एकता लाई जाए। सामाजिक एकता की अत्यंत आवश्यकता है। किसी तरह से समाज में एकता स्थापित हो।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः अंतर में धुन तो राधास्वामी मत के अनुयायी सुन सकते हैं, लेकिन जो अनुयायी नहीं हैं, वे क्या करें?

दादाजी महाराजः जो भी उनका इष्ट है, उसको मानें। परमार्थ को जरूर करें।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः परमार्थ यानी?

दादाजी महाराजः परमार्थ यानी जो जिसको मानता है, उसकी आराधना करें।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः आखिर साधना कैसे करें?

दादाजी महाराजः अपनी अंतर्मुख साधना के वक्त आप अपने सुमिरन, ध्यान और भजन में लगते हैं तब दुनिया के किसी ख्याल को मत आने दीजिए। राधास्वामी मत में अभ्यास जोर जबरदस्ती से नहीं बल्कि स्वतः कराया जाता है। जब आप दुनिया के कामों से फुरसत पा लें, तब परमार्थ के काम में बैठिए और बैठिए तो ऐसे लगिए कि फिर कोई दूसरा दुनिया का ख्याल न आए।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः वर्तमान तो कठिन है, क्या करें?

दादाजी महाराजः वर्तमान समय विकराल रूप धारण किए हुए है। काल का यह प्रकोप इतना बढ़ गया है कि वह प्रेम को सुखाना चाहता है। राधास्वामी दयाल के सामने काल कहीं नहीं ठहरता है। इसलिए काल का कुसंग छोड़कर दयाल के संग में रहना, निर्मल प्रेम की अविरल धारा का पान करना है।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः जिन्दगी कैसे जिएं?

दादाजी महाराजः अपनी नरदेही को सफल बनाने के लिए प्रेमाभक्ति के मार्ग पर चलें और जिन्दगी जीना सीखें। अधिकांश लोग जिन्दगी ढो रहे हैं। जिन्दगी हँसकर जिएं। विसंगतियों में भी आशा की किरण को संजोये रखें। अंतर्विरोधों को धैर्य और सहजता से मिटाएं। प्रेम, शांति और सद्भाव को अपनी जिन्दगी के मूल तत्व मानें। मैं मुरझाए चेहरों पर मुस्कान देखना चाहता हूँ।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः राधास्वामी मत प्रेम का मत है?

दादाजी महाराजः मेरे पास लेने को भी प्रेम है और देने को भी प्रेम के सिवाय कुछ नहीं है। मालिक से प्रेम पाता हूँ और बांट भी देता हूँ। कभी-कभी वो गागर को सागर कर देते हैं। एक ही अनुरोध है कि कुलमालिक राधास्वामी दयाल को मानें, उनकी मौज को निहारें और जो भी काम करें, उसमें उनकी प्रसन्नता को देखें। ऐसे हर काम से बचें जिसमें मालिक अप्रसन्न हों और ऐसे हर काम को करें जिसमें मालिक प्रसन्न हों।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः गुरुपूर्णिमा पर कोई संदेश?

दादाजी महाराजः नैतिक सिद्धांत और भारतीय मूल्यों का पालन होना चाहिए। महिलाओं की इज्जत होनी चाहिए। जो नए बच्चे हैं, उन्हें प्रोत्साहन मिले ताकि वे आगे बढ़कर कुछ न कुछ काम कर सकें। इस समय कुछ दिक्कते हैं, उनसे पार पाने के लिए बच्चों को साहस देने का काम बड़ों का है।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः सत्संगियों के लिए संदेश?
दादाजी महाराजः सत्संगी के सभी क्रियाकलापों में सत्य ही पथ दिग्दर्शक होना चाहिए। जिसमें सत्य का रंचमात्र भी अभाव हो, उसे कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए।

हजूर महाराज के कहने पर प्रकट किया राधास्वामी मत

दादाजी महाराजः स्वामी जी महाराज (शिवदयाल सिंह साहब) ने द्वितीय गुरु हजूर महाराज की प्रार्थना पर 15 फरवरी, सन 1861 में बसंत पंचमी के दिन राधास्वामी मत को सार्वजनिक किया। इससे पहले चुनिंदा लोगों को ही राधास्वामी मत का उपदेश दिया जाता था। स्वामी जी महाराज का जन्म 24 अगस्त 1818 को पन्नी गली, आगरा में हुआ था। उनकी समाध स्वामी बाग (दयालबाग) में है। हजूर महाराज की समाध हजूरी भवन, पीपल मंडी में है। हजूरी भवन  में हर वक्त राधास्वामी नाम की गूंज होती रहती है। 

Dr. Bhanu Pratap Singh