पुत्री सीता के घर का पानी नहीं पीना चाहते थे राजा जनक, तभी अयोध्या के पास बसाया था जनौरा
अयोध्या से सटे जनौरा गांव को राजा जनक ने जमीन खरीद कर बसाया था. इसके पीछे की कहानी यह है कि राजा जनक बेटी के घर का पानी भी नहीं पीना चाहते थे. इसलिए जब वह सीता विवाह के बाद पहली बार कलेवा लेकर अयोध्या आए तो उन्होंने खुद की जमीन पर महल बनाया और यहीं पर ठहरे. इसके बाद यह जनौरा गांव आयोध्या की विभिन्न तारीखों का गवाह बना. पहले राम के वनवास फिर उनके राजतिलक और अब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को भी जनौरा देख रहा है.
सबको पता है कि माता सीता का मायका जनकपुर में है. वही जनकपुर जिसका कुछ हिस्सा बिहार में है तो कुछ नेपाल में, लेकिन क्या आप जानते हैं कि माता सीता का एक मायका अयोध्या में भी है. यदि नहीं जानते तो यहां हम आपको बता रहे हैं कि कैसे माता सीता का एक मायका अयोध्या में भी है. अब आप चौंक सकते हैं कि अयोध्या में तो उनकी ससुराल है, तो फिर मायका कैसे? लेकिन ऐसा ही है. दरअसल अयोध्या से सटे जनौरा गांव को राजा जनक की मल्कियत कहा जाता है. इस गांव की जमीन राजा जनक ने अयोध्या पति दशरथ से खरीद कर बसाया था.
यहां पर राजा जनक का महल है और उनके आराध्य शिव जी का जाग्रत मंदिर भी. यहां सीता कुंड है तो यज्ञ हवन के लिए ब्रह्मकुंड भी. भगवान राम के समकालीन महर्षि वाल्मिकी ने अपने रामायण में इस स्थान का वर्णन जनकचौरा के नाम से किया है. हालांकि कालांतर में अपभ्रंष की वजह यह जनकचौरा से जनौरा बन गया. अब यही नाम आज के राजस्व रिकार्ड में भी है. आइए, अब इस गांव की कथा पर आते हैं. वाल्मिकी रामायण के अलग अलग प्रसंगों के मुताबिक राजा जनक बड़े रुढिवादी और पारंपरिक व्यक्ति थे.
सीता की ससुराल का पानी भी नहीं पीए जनक
उन्होंने सीता विवाह के बाद उन्हें राम के साथ विदा तो कर दिया, लेकिन वह विह्वल रहने लगे थे. इतने में एक पखवाड़ा गुजर गया. कुलगुरु ने सलाह दी कि अब सीता जी को कलेवा भेज देना चाहिए. उनकी सलाह पर राजा जनक ने खुद कलेवा लेकर अयोध्या जाने का फैसला किया. उस समय दिक्कत यह थी कि अयोध्या प्रवास के दौरान वह कहां खाएंगे और कहां रहेंगे. दरअसल परंपरा है कि बेटी के विवाह के बाद पिता उसके घर का अन्न तो दूर, पानी भी नहीं पी सकता. ऐसे में राजा जनक ने एक दूत अयोध्या रवाना किया और राजा दशरथ से उचित कीमत पर एक भूखंड देने का आग्रह किया था.
खरीद कर जनक ने बसाया गांव
जनक के इस आग्रह पर राजा दशरथ तो एक बार हैरत में पड़ गए, लेकिन फिर उन्होंने महामंत्री सुमंत को आदेश किया कि वह दूत द्वारा चिन्हित कोई भी भूखंड उचित कीमत लेकर राजा जनक के नाम कर दें. इस भूखंड के मालिकाना हक के ट्रांसफर का विवरण राज्य के राजस्व रिकार्ड में भी दर्ज किया जाए. इसके बाद दूत ने अयोध्या नगर की सीमा से बाहर एक जमीन को चिन्हित किया. उस समय वह जमीन खेती के लिए इस्तेमाल होती थी. आनन फानन में इस जमीन पर एक गांव बसाया गया.
आज भी है राजा जनक का महल और मंदिर
जनकपुर से सारी सामग्री रथों पर लाद कर लाई गई और फिर राजा जनक सीता जी का कलेवा लेकर अयोध्या आए. रामायण में कथा आती है कि उस समय राजा जनक अयोध्या में एक अरसे तक ठहरे थे. इसलिए उन्होंने अपने आराध्य शिव जी के पूजन के लिए एक शिवमंदिर बनाया, स्नान के लिए कुंड खुदवाया और हवन यज्ञ के लिए ब्रह्म कुंड भी बनवाया. मंदिर के रूप में राजा जनक का भवन आज भी यहां मौजूद है. इसी प्रकार सरोवर सीता कुंड के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि इसके बाद भी जब जब राजा जनक अयोध्या आए, तो इसी भवन में ठहरे.
राम के वनवास, राजतिलक और अब प्राण प्रतिष्ठा का गवाह
अयोध्या का जनौरा गांव राम के वनवास का गवाह बना. रावण विजय के बाद जब राम अयोध्या आए तो उनके राजतिलक का गवाह बना. इन दोनों मौकों पर राजा जनक जनौरा में मौजूद रहे और लंबे समय तक यहां प्रवास किया था. इसी जनौरा में उन्होंने वनवास के समय माता सीता को उपदेश किया था. इसके बाद राजतिलक के वक्त भी राजा जनक ने सीता को एक पटरानी की मर्यादा सिखाई थी. अब एक बार फिर जनकपुर से बड़ी संख्या में लोग रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अयोध्या पहुंचे हैं. इनके ठहरने का इंतजाम भी इसी जनौरा में किया गया है.
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