डॉ. भानु प्रताप सिंह
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कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वच्छता में अग्रणी रहने वाला नगर निगम आगरा भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा हुआ है। नगर निगम की अधिकांश सीटों पर रिश्वतखोर शिप्रा गुप्ता विराजमान हैं। जिस दिन आप फँस गए, कलपते रहिए, रोते रहिए, सिफारिशें लगवाते रहिए, कुछ नहीं होने वाला। नगर निगम का यह हाल तब है जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति बनाई हुई है। अगर आप नगर निगम के किसी रिश्वतखोर कर्मचारी के पंजे में नहीं फँसे हैं तो भाग्यशाली हैं।
आगे बढ़ने से पहले जानते हैं यह आलेख क्यों लिखा जा रहा है। कमला नगर ई-ब्लाक निवासी सुभाष अग्रवाल को अपना आवासीय भवन व्यावसायिक में कराना था। राजस्व निरीक्षक शिप्रा गुप्ता ने उनसे पांच लाख की रिश्वत मांगी। दो लाख रुपये में मामला तय हो गया। राजस्व निरीक्षक ने एक लाख रुपये काम होने से पहले मांगे थे। बाकी के एक लाख रुपये काम होने के बाद देना तय हुआ था। सुभाष अग्रवाल की शिकायत पर एसपी विजिलेंस शगुन गौतम ने जांच कराई। मामला सही निकला तो विजिलेंस टीम ने नगर निगम परिसर में राजस्व निरीक्षक शिप्रा गुप्ता और दलाल अनुराग नगर (बल्केश्वर) निवासी सुभाष को रंगेहाथ पकड़ लिया। राजस्व निरीक्षक शिप्रा गुप्ता मूलरूप से मोहल्ला जोशियान फिरोजाबाद की रहने वाली हैं। 34 लाख रुपये का हाउस टैक्स दो लाख रुपये में निपटाने की योजना थी।
सर्वाधिक भ्रष्टाचार कर निर्धारण में है। अनाप-शनाप कर निर्धारण का नोटिस बनाकर भेजा जाता है। फिर कम करने के लिए सौदेबाजी होती है। परेशान व्यक्ति सांसद और विधायकों के पास जाता है। उनकी बात भी नहीं सुनी जाती है तो ‘गांधी जी’ यानी रिश्वत का ही सहारा है। सुभाष अग्रवाल जैसे जीदार लोग कम ही हैं जो शिकायत करके रिश्वतखोरों को रंगेहाथ पकड़वाते हैं।
सब जानते हैं कि निर्माण कार्य किस तरह से होते हैं और किस तरह से कमनीशनखोरी की जाती है। इसका न कोई प्रमाण है न कोई शिकायत। सुनने में तो यह आया है कि अब तो निर्माण कार्य में हिस्सेदारी होने लगी है। जिसमें हिस्सा है, उस ठेकेदार का भुगतान होकर अगली किस्त दे दी जाती है। कितने ही ठेकेदार हैं जो निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद भुगतान के लिए भटक रहे हैं।
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नगर निगम में लंबित भुगतान वाली फाइलों की जांच की जाए तो भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है। कोई बताने वाला नहीं है कि एक, दो, तीन.. साल से भुगतान क्यों लंबित हैं? जिन मामलों में सौदा तय हो जाता है, उनका भुगतान कर दिया जाता है। बाकी फाइलें अलमारी में बंद ही रहती हैं। कोई भी ठेकादार शिकायत नहीं करता क्योंकि उसे अगली बार कोई काम नहीं मिलेगा।
आप यह न समझें कि किसी पीड़ित ठेकेदार के कहने पर लिखा है। मैंने अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में रिपोर्टिंग के दौरान वर्षों नगर निगम को बीट के रूप में कवर किया है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सीरीज लिखी हैं। सरकारें बदलती रहीं और भ्रष्टाचार नए-नए रूप में सामने आता रहा है। रिश्वतखोरी बढ़ती ही जा रही है। सवाल यह भी कि एक-दो वर्ष के लिए आने वााला अधिकारी भ्रष्टाचार रोके भी तो कैसे?
कमाल की बात यह है कि नगर निगम समेत तमाम सरकारी विभागों में चल रहे घनघोर भ्रष्टाचार के बारे में कोई भी जनप्रतिनिधि मुँह नहीं खोलता है। कोई शिकायत करे तो जनप्रतिनिधि कहते हैं कि अधिकारी हमारी सुनते नहीं है। इसके विपरीत किसी भी जनप्रतिनिधि का कोई काम रुकता नहीं है। हाल ही में 50 करोड़ की जमीन पर अवैध कब्जे का मामला खुला है। इससे अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह से भ्रष्टाचार की जड़ों को सींचा जा रहा है।
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भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता ने बताया कि हमें नियम कानून बताकर टरका दिया जाता है लेकिन विरोधी दल वालों के सभी काम करा दिए जाते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, यह रहस्य आज तक खुला नहीं है।
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