गरीबों की मिठाई कहे जाने वाले आगरा के पेठे पर पड़ी महंगाई की मार, 10 से 20 रुपये तक बढ़े दाम

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आगरा: ​ताजनगरी आगरा की वैश्विक पहचान होने के साथ-साथ गरीबों की पसंदीदा मिठाई के रूप में अपनी खास जगह रखने वाला मशहूर पेठा उद्योग इन दिनों भारी महंगाई की मार का सामना कर रहा है। खुले बाजार में चीनी के दामों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी का सीधा और प्रतिकूल असर अब पेठे के पूरे कारोबार पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। पेठा उद्योग से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि लागत मूल्य में अचानक हुई इस वृद्धि के चलते उन्हें मजबूरी में अपने उत्पादों के दाम करीब 10 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ाने पड़े हैं। इस मूल्य वृद्धि का असर अब सीधे तौर पर इसकी मांग और बिक्री पर भी पड़ रहा है, जिसके कारण ग्राहक पहले के मुकाबले काफी कम मात्रा में पेठा खरीद रहे हैं।

​स्थानीय पेठा व्यापारियों का यह भी कहना है कि चीनी की कीमतों में करीब 20 से 25 रुपये की एकमुश्त भारी बढ़ोतरी हो गई है, जिसकी वजह से तमाम मिठाई कारोबारियों के सामने कम लागत पर कच्चा माल खरीद पाना बेहद पेचीदा और मुश्किल हो गया है। उत्पादन की यह बढ़ी हुई अतिरिक्त लागत अकेले व्यापारियों के लिए लंबे समय तक सहन करना संभव नहीं था, इसलिए उन्हें अपने लाभ का मार्जिन छोड़कर विवशतावश पेठे के खुदरा विक्रय मूल्य में इजाफा करना पड़ा।

​व्यापारियों के अनुसार, पेठा महज एक साधारण मिठाई नहीं है, बल्कि यह कुष्मांडा यानी शुद्ध सफेद कद्दू से तैयार किया जाने वाला एक पारंपरिक और पौष्टिक खाद्य पदार्थ है। इसे पारंपरिक रूप से गर्मियों के मौसम में शरीर को ठंडक और ताजगी प्रदान करने वाला माना जाता है। यही वजह है कि खास तौर पर मेहनत-मजदूरी करने वाले मजदूर वर्ग और धूप में कड़ाके की मेहनत करने वाले आम लोग इस पारंपरिक मिठाई को बहुत चाव से पसंद करते हैं।

कारोबारियों का दर्द साझा करते हुए यह भी बताया गया कि शुद्ध देसी घी से तैयार होने वाली महंगी मिठाइयां वैसे भी आम और गरीब आदमी की पहुंच से हमेशा बाहर ही रहती हैं, लेकिन पेठा एक ऐसी अकेली किफायती मिठाई थी जिसे कम कीमत में आसानी से खरीदा जा सकता था। अब इसके भी दाम बढ़ जाने के कारण आम आदमी के लिए यह सस्ता विकल्प भी धीरे-धीरे काफी मुश्किल और पहुंच से बाहर होता जा रहा है।

इतिहास के पन्नों को पलटते हुए पेठा कारोबारियों ने यह भी बताया कि आगरा में पेठे के उद्भव और इतिहास को अक्सर ऐतिहासिक ताजमहल के निर्माण के दौर से भी जोड़ा जाता है। ऐसी पुरानी लोक मान्यता है कि मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल में जब भव्य इमारतों का निर्माण कार्य चल रहा था, तब वहां कड़ी धूप में काम करने वाले मजदूरों के लिए ऊर्जा और ठंडक देने के उद्देश्य से पेठे जैसी विशेष मिठाई तैयार करवाई जाती थी। हालांकि, इस ऐतिहासिक दावे के समर्थन में अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों और दस्तावेजों में अलग-अलग तरह के मत और प्रमाण मिलते हैं।

बहरहाल, वर्तमान समय में चीनी की लगातार बढ़ती इन कीमतों ने आगरा के पारंपरिक पेठा उद्योग के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। स्थानीय व्यापारियों को अब इस बात का गहरा डर सता रहा है कि यदि महंगाई का यह दौर इसी प्रकार जारी रहा, तो आने वाले समय में उनकी कुल बिक्री और संपूर्ण कारोबार दोनों ही बहुत बुरी तरह से प्रभावित हो सकते हैं।

Dr. Bhanu Pratap Singh