लखनऊ: उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर राजनीतिक गलियारों में टिकट वितरण को लेकर मंथन तेज हो गया है। पार्टी के सामने सबसे बड़ा और अहम सवाल यह है कि जिन मौजूदा विधायकों के दम पर पार्टी ने पिछले चुनावों में शानदार सफलता हासिल की थी, क्या आगामी चुनाव में भी उन्हीं चेहरों पर दोबारा दांव खेला जाएगा या फिर नए और युवा चेहरों को मैदान में उतारा जाएगा? हाल ही में पार्टी के आंतरिक सर्वे में 124 विधायकों की रिपोर्ट संतोषजनक न होने की चर्चाओं ने इस सियासी बहस को और अधिक हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में 100 से अधिक विधायकों के टिकट काटे जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं, जिससे मौजूदा जनप्रतिनिधियों की धड़कनें तेज हो गई हैं।
अनुभव को तरजीह या कामकाज बनेगा टिकट का आधार?
चुनावी राजनीति में लगातार जीत दर्ज करना किसी भी विधायक की राजनीतिक ताकत माना जाता है, लेकिन भाजपा के समक्ष इस बार चुनौती यह तय करने की है कि पिछले चुनावों का प्रदर्शन आगामी चुनाव में टिकट की मुहर लगाने की अकेली गारंटी बनेगा या नहीं। पार्टी के भीतर चर्चा है कि जिन विधायकों के खिलाफ असंतोष की सुगबुगाहट है, उनमें से कई ऐसे भी हैं जो एक से अधिक बार चुनावी वैतरणी पार कर चुके हैं।
दूसरी ओर, यह भी कहा जा रहा है कि एक सौ से अधिक विधायकों के कामकाज की रिपोर्ट बेहद संतोषजनक और सकारात्मक है। यानी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। कुछ मौजूदा विधायकों के लिए अपनी गिरती साख और स्थिति को संभालना बड़ी चुनौती बन गया है, तो वहीं कई अन्य के पक्ष में सकारात्मक माहौल होने की भी चर्चा है।
असंतोष की जड़: विधायक की कार्यशैली या स्थानीय समीकरण?
विशेषज्ञों का मानना है कि टिकट का कोई भी फैसला केवल किसी एक विधायक के खिलाफ दर्ज शिकायतों की संख्या के आधार पर करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। असली और बड़ा सवाल यह है कि इस नाराजगी की असल वजह क्या है— क्या यह विधायक का व्यक्तिगत कामकाज है, क्षेत्र में विकास कार्यों की कमी है, जनता से उनकी बढ़ती दूरी है या फिर स्थानीय संगठन के साथ चल रही अंदरूनी खींचतान?
यदि शिकायतें सीधे तौर पर विधायक की कार्यशैली और जनता से कटे होने से जुड़ी हैं, तो वहां नए चेहरे को मौका देना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। लेकिन यदि विवाद की जड़ स्थानीय संगठन की गुटबाजी या जटिल सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों में है, तो उम्मीदवार बदलने के बावजूद पार्टी की मुश्किलें कम नहीं होंगी।
नए चेहरों की सुगबुगाहट और पुराने दावेदारों की चिंता
भाजपा में युवाओं, महिलाओं और पार्टी संगठन के लिए समर्पित सक्रिय कार्यकर्ताओं को आगे लाने की संभावनाओं पर भी गांभीर्य से विचार चल रहा है। हालांकि, किसी नए चेहरे को टिकट थमाना केवल मौजूदा विधायक का विकल्प तलाशने भर का मामला नहीं है। नए उम्मीदवार की जनता के बीच व्यक्तिगत पकड़, संगठन में उसकी स्वीकार्यता और क्षेत्र के जातीय व सामाजिक समीकरण भी चुनावी जीत-हार में अहम भूमिका निभाएंगे।
इसके विपरीत, लंबे समय से चुनाव जीतते आ रहे वरिष्ठ विधायकों के लंबे प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को भी आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता। ऐसे में कई महत्वपूर्ण सीटों पर टिकट की दौड़ पुराने और नए दावेदारों के बीच बेहद दिलचस्प होने के पूरे आसार हैं।
403 सीटों की अलग-अलग चुनौतियां
उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर भाजपा की रणनीतिक चुनौतियां अलग-अलग हैं। जहां पार्टी के मौजूदा विधायक हैं, वहां उनके कामकाज और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का आकलन किया जा रहा है; वहीं जिन सीटों पर पिछले चुनाव में पार्टी को सफलता नहीं मिली थी, वहां नए और मजबूत विकल्पों की तलाश की जा रही है। इसके अलावा, एनडीए के सहयोगी दलों के साथ सीटों का तालमेल और सटीक सामाजिक प्रतिनिधित्व भी उम्मीदवारों के अंतिम चयन को काफी हद तक प्रभावित करेगा।
फिलहाल, 124 विधायकों की रिपोर्ट और 100 से अधिक टिकट कटने की चर्चाओं को पार्टी की संभावित रणनीति और अंदरूनी फीडबैक के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। अभी तक न तो टिकट कटने की कोई आधिकारिक सूची सामने आई है और न ही उम्मीदवार चयन के सभी मानदंडों पर अंतिम मुहर लगी है। ऐसे में भाजपा की असली और अंतिम चुनावी रणनीति का खुलासा पार्टी नेतृत्व के फाइनल फैसलों से ही हो सकेगा। फिलहाल पार्टी के सामने केवल यह तय करने की चुनौती नहीं है कि किसका टिकट काटा जाए, बल्कि यह भी बड़ा सवाल है कि किसे बनाए रखने और किसे नया अवसर देने का आधार क्या तय किया जाए।
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