“जियो और जीने दो” का जीवंत संदेश: नन्हें बच्चों ने भगवान महावीर के सिद्धांतों को बना दिया सजीव अनुभव
पक्षी सेवा की मिसाल पंकज का सम्मान, पक्षियों को गिटार पर नमोकार मंत्र सुनाया
भगवान महावीर जन्म कल्याणक पर भावनाओं का अद्भुत संगम
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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.
आगरा। भगवान महावीर के 2625वें जन्म कल्याणक के पावन अवसर पर आगरा विकास मंच द्वारा संचालित पक्षी घर एवं घायल पक्षी चिकित्सालय में एक अत्यंत भावपूर्ण और प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। वातावरण श्रद्धा, संवेदना और जीव दया की भावना से ओतप्रोत था, मानो हर कोना भगवान महावीर के उपदेशों की गूंज से जीवंत हो उठा हो।
नन्हें कलाकारों ने मंच पर उतारी महावीर की जीवन यात्रा
आगरा विकास मंच द्वारा संचालित संस्था ब्रह्म शिक्षा केंद्र, के बच्चों ने भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांत “जियो और जीने दो” तथा “जीव दया” पर आधारित एक मार्मिक नाट्य प्रस्तुति दी। प्रस्तुति से पूर्व मंगलाचरण के माध्यम से वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया गया। यह बच्चे विभिन्न पक्षियों और वन्यजीवों का स्वरूप धारण करके आए थे। शिक्षिका मनीषा ने गिटार पर पक्षियों को णमोकार मंत्र सुनकर उनके मंगल की कामना की।
बच्चों ने भगवान महावीर के जन्म से लेकर उनके समाधि मरण तक की संपूर्ण जीवन यात्रा को अभिनय के माध्यम से सजीव कर दिया। विशेष रूप से भगवान की माता द्वारा गर्भावस्था में देखे गए 14 स्वप्नों का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया, जिससे उनके महत्व को सहज और भावपूर्ण तरीके से समझाया गया।
जीव दया का संदेश बना सजीव अनुभव
नाटक के माध्यम से बच्चों ने यह संदेश दिया कि भगवान महावीर के उपदेश केवल कहने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में अपनाने के लिए हैं। “जियो और जीने दो” का सिद्धांत बच्चों के अभिनय में इतनी गहराई से झलका कि उपस्थित सभी लोग भावविभोर हो उठे।
कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण वह रहा, जब स्वस्थ हो चुके पक्षियों को बच्चों ने अपने हाथों से खुले आसमान में उड़ाया। यह दृश्य मानो भगवान महावीर के सिद्धांतों का प्रत्यक्ष रूप था—स्वतंत्रता, करुणा और सह-अस्तित्व का अद्भुत संगम।

दीप प्रज्वलन और सम्मान समारोह ने बढ़ाई गरिमा
कार्यक्रम की शुरुआत भगवान महावीर स्वामी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुई। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. अनिल अग्रवाल (डेंटिस्ट) उपस्थित रहे। उनके साथ डॉ. अरुण जैन, अध्यक्ष राजकुमार जैन, संयोजक सुनील कुमार जैन, मंत्री संदेश जैन, दादाबाड़ी ट्रस्ट के महामंत्री शरद चौरडिया सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
इस अवसर पर आशीष जैन, अशोक कोठारी, अनूप अग्रवाल, ध्रुव जैन, कमलचंद जैन, अजीत जैन, आदित्य जैन, अमन जैन, पीयूष जैन, ममता जैन एवं कविता जैन ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। ब्रह्म शिक्षा केंद्र की शिक्षिकाएं मनीषा और पल्लवी ने कार्यक्रम का कुशल संयोजन किया।
अध्यक्ष और संयोजक का भावपूर्ण संदेश
इस अवसर पर आगरा विकास मंच के अध्यक्ष राजकुमार जैन और संयोजक सुनील कुमार जैन ने संयुक्त रूप से कहा—
“भगवान महावीर का ‘जियो और जीने दो’ केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन जीने की दिशा है। जब छोटे-छोटे बच्चे इन मूल्यों को अपनाकर समाज को संदेश देते हैं, तो यह विश्वास और मजबूत होता है कि आने वाली पीढ़ी संवेदनशील और जिम्मेदार बनेगी।”
पक्षी प्रेम की मिसाल बने पंकज का सम्मान
कार्यक्रम में पंकज का विशेष रूप से अभिनंदन किया गया, जो 24 घंटे घायल पक्षियों की सेवा में समर्पित रहते हैं। मेडिकल शॉप संचालित करने के साथ-साथ उनका पक्षी प्रेम अद्भुत है। चाहे रात के 12 बजे ही क्यों न हों, यदि कोई घायल पक्षी मिलता है तो वे तुरंत उसका उपचार करते हैं।
उनकी सेवा भावना इतनी गहरी है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पक्षियों की सेवा नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के किसी सदस्य की देखभाल कर रहे हों। उनका यह समर्पण सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।
संपादकीय
भगवान महावीर के सिद्धांत आज के दौर में केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें जीवन के व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। आगरा विकास मंच द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम इसी दिशा में एक सशक्त कदम है, जहाँ बच्चों के माध्यम से समाज को करुणा, अहिंसा और सह-अस्तित्व का संदेश दिया गया।
आज जब दुनिया प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ की दौड़ में उलझी हुई है, ऐसे में “जियो और जीने दो” का संदेश एक प्रकाश स्तंभ की तरह है। विशेष रूप से बच्चों द्वारा इस संदेश को अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करना यह दर्शाता है कि यदि सही दिशा दी जाए तो नई पीढ़ी समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
पंकज जैसे व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण हैं कि सेवा और संवेदना आज भी जीवित हैं। उनका समर्पण हमें यह सिखाता है कि सच्ची मानवता वही है, जिसमें हम हर जीव के प्रति करुणा रखें।
यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक जागरण था—मानवता के लिए, संवेदना के लिए, और उस मूल भावना के लिए, जिसे भगवान महावीर ने सदियों पहले हमें सिखाया था।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
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