विष को कौन पचाएगा? हमारी ज़िद, हमारी राजनीति… और हमारे फेफड़े…

लेख

भारत के शहर आज धुएँ की चादर में लिपटे हुए हैं। हर सुबह AQI के आँकड़े देखते ही दिल बैठने लगता है। यह वही देश है, जहाँ हम अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं को सही साबित करने में इतने तल्लीन हो चुके हैं कि साँसें बोझिल होने लगी हैं। हवा जहरीली हो रही है, फेफड़े भर रहे हैं, गला सूजता जा रहा है—लेकिन हम ज़िद नहीं छोड़ते। भाजपा–कांग्रेस, हिन्दू–मुस्लिम की लड़ाई में इतना खो गए हैं कि जीवन से जुड़ी मूल समस्या हमारे लिए मनोरंजन से अधिक कुछ नहीं रही।

देश के हर शहर में लाखों लोग सिर्फ साँस लेने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे घरों के बुज़ुर्ग जिनके लिए साँसें अब आश्वासन नहीं, संघर्ष बन चुकी हैं… हमारी अपनी गोद के मासूम बच्चे जिनके फेफड़ों में ज़हर उसी हवा के साथ जा रहा है जो उन्हें खिलखिलाने का अधिकार देती है—सब जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। पर हम राजनीति के नशे में इतने चूर हैं कि सवाल असल मुद्दों से मुड़कर केवल नेताओं की प्रतिष्ठा पर जाकर टिक जाते हैं।

हम चर्चा नहीं करना चाहते, क्योंकि चर्चा होगी तो जवाबदेही भी होगी और जवाबदेही हमारे नेताओं की… किसी को बर्दाश्त नहीं। इसलिए हम दम घुटने को तैयार हैं, पर सच्चाई पर बहस करने को नहीं।

हिचकी, खांसी, जलन, धुआँ—सबके बीच हम अपनी सांप्रदायिक जीत में व्यस्त हैं। हिन्दू खुश है कि दिवाली के पटाखों का स्वर्गीय शोर अभी भी कायम है। मुसलमान को संतोष है कि शब-ए-बारात की आतिशबाज़ी पर रोक नहीं लगी। अपने-अपने धर्म, अपनी-अपनी परंपराओं की रक्षा में हम विसर्जित होते फेफड़ों पर ध्यान देना भूल गए।

राजनीतिक तकरार भी ऐसे ही चल रही है। जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी, भाजपा को यमुना का पानी ज़हरीला दिखता था। अब भाजपा सत्ता में है तो आम आदमी पार्टी को वही यमुना बदबूदार लगती है। नदी नहीं बदली… बस नज़रें बदल गईं।

देश की जनसंख्या बढ़ रही है, संसाधन घट रहे हैं, और योजनाएँ दम तोड़ रही हैं। लेकिन हम अपनी धार्मिक धारणाओं को मजबूत करने के लिए अपने-अपने समुदायों को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह देने में जुटे हैं। पर कोई नहीं सोचता कि जब अस्तित्व ही खतरे में है तो वर्चस्व की लड़ाई का क्या मतलब? धुएं से भरी इस हवा में अगर साँसें ही न बचीं, तो अज़ान और आरती में हिस्सा लेने वाले लोग कहाँ से आएंगे?

आज एयर प्यूरीफायर का अरबों का बाज़ार बन चुका है। अमीरों ने अपने घरों में साफ हवा के किले बना लिए हैं। मध्यमवर्ग अपनी बचत से बच्चों के लिए साँसें खरीदने लगा है। कंपनियाँ ‘सस्ता-प्यूरीफायर’ बेचकर संवेदनशीलता का व्यापार कर रही हैं। और गरीब? वे पोस्टरों पर चमकते ‘आत्मनिर्भर भारत’ को देखकर बस इतना गुनगुनाते हैं—
“मेरा गंगा का देश, मेरा यमुना का देश…”

हवा में तैरते इस ज़हर को आखिर कौन पचाएगा?

हम, जो हर सांस से अपनी मौत को थोड़ा और करीब ला रहे हैं? या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ, जिनको हम एक जहरीली विरासत सौंप रहे हैं?

-सब माया है

Dr. Bhanu Pratap Singh