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Agra, Uttar Pradesh, India. राष्ट्र संत नेपाल केसरी डॉ. मणिभद्र महाराज ने कहा है कि मन को यदि नियंत्रण में कर लिया तो कोई दुख नहीं रहेगा। मन ही जीवन को विचलित और बाधित करता है। इसके लिए मन को निर्मल बनाना होगा।
वर्षावास के तहत महावीर भवन, न्यू राजामंडी में गुरुवार को प्रवचन देते हुए जैन मुनि ने कहा कि लोग मन के अनुसार चलते हैं। कहते हैं मन बहुत बेईमान है, मन बहुत चंचल है, मानता ही नहीं है। अपनी गलतियों के लिए मन को दोषी बताते रहते हैं। जबकि मन बहुत कोमल है, इसे यदि हम समझाएंगे, समझ जाएगा। मन को जैसा बनाएंगे, बन जाएगा। मन को स्थिर करना सीखो, यह एक बड़ी साधना है। जो मन को निर्मल बना लेता है, उसे कोई दिक्कत नहीं होती। मन में जिस प्रकार कुविचार आते हैं, उसी प्रकार सुविचार भी पनपते हैं। लेकिन हम कुविचारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं और वहीं हमारे मन पर हावी होकर जीवन चक्र ही बदल डालते हैं।
जैन संत ने कहा कि जब मन जाग जाता है, या फिर मन वश में हो जाता है तो फिर जीवन का उद्देश्य ही बदल जाता है। उसका ढंग भी अलग होता है। बस, केवल एक बार संकल्प की जरूरत होती है। उसके बाद तो सत्कर्म ही बढ़ते जाएंगे। जीवन की दिशा बदल जाएगी।
आत्महत्या पर चर्चा करते हुए जैन संत ने कहा कि आत्महत्या सबसे बड़ा पाप है, सबसे बड़ी हिंसा है। इसका संबंध में मन और प्रतिकूल परिस्थितियों से होता है। व्यक्ति ही नहीं, संसार का कोई प्राणी मरना नहीं चाहता। लेकिन जब हर ओर से विपदा आती है तो लोग अपनी जान भी दे देते हैं। इसे भी मऩ को नियंत्रण करने से रोका जा सकता है।
जीवन में दुख क्या है, इस पर चर्चा करते हुए राष्ट्र संत ने कहा कि जो मेरे पास जो है, उसका कोई सुख नहीं, जो नहीं है, उसका व्यक्ति दुख मनाता है। बल्कि यह मानिये कि लोग दुखी होने के लिए बहाना ढूंढते हैं। ऐसा बहुत कम होता है, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे की वजह से दुखी हो, दूसरा व्यक्ति निमित्त तो हो सकता है,लेकिन प्रमुख कारण व्यक्ति खुद ही होता है। इसलिए मन को निर्मल बनाओ, सकारात्मक सोच रखो, तभी जीवन सुखी और सानंद रह सकता है।
गुरुवार की धर्मसभा में जम्मू, दिल्ली, चेन्नई, कानपुर, महाराष्ट्र से आए श्रद्धालुओं ने प्रवचनों का लाभ लिया। इस अवसर पर राजेश सकलेचा, नरेश जैन, राजीव चपलावत, वैभव जैन, सुलेखा सुराना, सुमित्रा सुराना,पूजा जैन,अनिता जैन, नीतू जैन,अंजली जैन आदि उपस्थित थे।
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