पनवारी गांव, आगरा। यह सिर्फ एक जगह का नाम नहीं है, बल्कि उस समाज की एक कड़वी सच्चाई का प्रतीक है, जहाँ घोड़ी चढ़ने का अधिकार भी जाति देखकर तय होता है। 1990 में हुई एक घटना पर 34 साल बाद कोर्ट का फैसला आता है और फिर कुछ ही दिनों में 35 दोषियों को जमानत मिल जाती है। यह खबर नहीं, बल्कि हमारे न्यायिक सिस्टम और सामाजिक विसंगतियों पर एक गहरा सवाल है। यह कहानी सिर्फ एक घटना की नहीं, बल्कि एक लंबे इंतजार की है, एक न्याय की जंग की है और फिर उस न्याय को मिली एक नई चुनौती की है।
एक बारात, एक घोड़ी और जातीय दंगे का काला अध्याय
यह सब शुरू हुआ 1990 में, जब पनवारी गांव में चोखेलाल जाटव की बेटी मुंद्रा की शादी थी। 21 जून को बारात आई, लेकिन दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोक दिया गया। आरोप लगा जाट समाज के लोगों पर। क्या आज भी हमारे देश में दूल्हा घोड़ी पर चढ़ेगा या नहीं, यह उसकी जाति देखकर तय होता है? यह सवाल 1990 में जितना प्रासंगिक था, आज भी उतना ही है। इस मामूली सी बात पर विवाद इतना बढ़ा कि अगले दिन कई थानों की पुलिस की मौजूदगी में भी हिंसा भड़क गई। 5-6 हजार लोगों की भीड़ ने बारात को घेर लिया और दुल्हा सहित तमाम बरातियों को पीटा गया, पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और फिर शुरू हुआ एक ऐसा सिलसिला जो 10 दिन के कर्फ्यू और दो मौतों के बाद ही थम सका। सोनी राम जाट और एक अन्य महिला की जान गई, 150 से ज्यादा लोग घायल हुए। क्या यह सिर्फ एक दंगा था या फिर सदियों से दबा हुआ जातीय विद्वेष जो मौका मिलते ही फट पड़ा?
न्याय की धीमी चाल का बेबस सच
सिकंदरा और कागारौल थानों में मामले दर्ज हुए। तत्कालीन थाना प्रभारी ने 6 हजार अज्ञात लोगों के खिलाफ बलवा और एससी/एसटी एक्ट जैसी गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया। कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि शुरू होती है न्याय की धीमी, बहुत धीमी चाल की।
1990: घटना हुई।
1994: मुकदमा ट्रायल पर आया।
2017: एससी/एसटी कोर्ट बनने के बाद केस वहां ट्रांसफर हुआ।
2025: 35 साल बाद, 28 मई को 32 लोगों को दोषी ठहराया गया।
2025: 35 लोगों को 5 साल की सज़ा सुनाई गई।
2025: कुछ ही दिनों बाद, सभी को जमानत भी मिल गई।
80 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। इतने लंबे समय में 27 लोगों की मौत हो चुकी है। क्या हम उनसे पूछ सकते हैं कि न्याय क्या होता है? या क्या उन्हें यह जानने का मौका मिला कि उनके खिलाफ आरोप क्या थे? 53 लोग अभी भी जीवित हैं, लेकिन क्या यह न्याय है कि 34 साल बाद सज़ा हो और फिर तुरंत जमानत मिल जाए? ऐसा लगता है जैसे कानून खुद अपनी ही कहानी को अधूरा छोड़ रहा हो।
यह कैसी व्यवस्था है जहाँ एक राजनीतिक व्यक्ति (विधायक चौधरी बाबूलाल, जो खुद इस मामले में आरोपी थे) दोषियों की पैरवी कर रहा है और हाई कोर्ट से जमानत मिल जाती है? जब राजीव गांधी जैसे पूर्व प्रधानमंत्री और मुलायम सिंह यादव की सरकार को भी इस मामले को शांत करने में पसीना आ गया था, तब क्या यह नहीं सोचना चाहिए था कि यह सिर्फ एक कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक बीमारी है?
क्या 34 साल बाद मिला फैसला सिर्फ एक औपचारिकता थी? क्या यह सिर्फ एक मोहर लगाना था ताकि कहा जा सके कि न्याय हुआ? अगर न्याय हुआ तो 35 लोगों की सज़ा के बाद उन्हें तुरंत जमानत क्यों मिल गई? क्या यह सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि पैरवी करने वाला कोई और नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल का एक विधायक है? यह कैसा विरोधाभास है कि कानून एक तरफ 34 साल बाद न्याय देता है और दूसरी तरफ राजनीतिक दबाव में उसे बेअसर कर देता है।
क्या हम 1990 के बाद 2025 तक समाज में कोई बदलाव देख पाए हैं? क्या आज भी कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढ़ने के लिए हिचकिचाता होगा? यह घटना सिर्फ अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान का आईना है।
न्याय की लड़ाई अभी बाकी है
यह मामला हमें याद दिलाता है कि न्याय सिर्फ कोर्ट के फैसले से नहीं मिलता, बल्कि समाज में बदलाव से आता है। 34 साल का इंतजार, 27 लोगों की मौत, 150 से अधिक घायलों की गवाही और फिर तुरंत जमानत… यह सब हमें सोचने पर मजबूर करता है। क्या हम सिर्फ उन तारीखों को याद रखें जब दंगे हुए या फिर उन तारीखों को जब कानून बेबस नजर आया?
जब नेता खुद आरोपी होते हैं और फिर वही न्याय की पैरवी करते हैं, तब हमें अपने सिस्टम पर सवाल उठाना चाहिए। यह मामला सिर्फ एक दंगे की कहानी नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है कि अगर हम अपनी सामाजिक विसंगतियों को नहीं सुलझाते हैं, तो भविष्य में भी इसी तरह के सवाल खड़े होते रहेंगे। क्या यह न्याय सिर्फ कागजों पर लिखा एक फैसला बनकर रह जाएगा या फिर यह समाज को सबक सिखाएगा? इसका जवाब आने वाले समय में ही मिल पाएगा, लेकिन अभी के लिए, सवाल बहुत हैं और जवाब नदारद हैं।
-मोहम्मद शाहिद की कलम से
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