अदालती गलियारों में ये कहावत आम है कि “कानून सबके लिए बराबर होता है,” लेकिन आगरा में नगर निगम ने शायद इसे एक नया अर्थ दे दिया है। अब तक शहर में बुलडोजर का डर दिखाकर अवैध कब्जों को हटाने वाली संस्था, आज खुद ही एक विवादित कब्जे का कारण बन गई है। यह कोई साधारण विवाद नहीं है, यह राम मंदिर के मॉडल और भारतीय सेना की जमीन के बीच की अजीब सी कहानी है।
क्या नगर निगम अब अतिक्रमण करने वाला बन गया है?
आगरा शहर में इन दिनों एक बड़ा ही अजीब-सा नजारा देखने को मिल रहा है। सर्किट हाउस चौराहा पर, जहां कभी विदेशी मेहमानों के लिए G-20 की शान में ग्लोब और लोगो लगाए गए थे, आज उसी जमीन पर राम मंदिर का एक मॉडल खड़ा है। लेकिन यह मॉडल किसी आस्था की निशानी से ज्यादा, आगरा नगर निगम की हठधर्मिता और बेपरवाही का प्रतीक बन गया है।
आप सोच रहे होंगे कि इसमें गलत क्या है? राम मंदिर का मॉडल है, तो क्या हुआ? गलत यह है कि यह मॉडल भारतीय सेना की जमीन पर बिना उसकी अनुमति के रखा गया है। जी हाँ, जिस नगर निगम के पास अवैध निर्माणों को ढहाने के लिए बुलडोजर रहता है, उसी ने देश की सुरक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण संस्था की जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया है।
यह कोई छोटी बात नहीं है। क्या नगर निगम को यह नहीं पता कि सरकारी जमीन पर, खासकर रक्षा मंत्रालय की जमीन पर, बिना अनुमति कोई काम नहीं किया जा सकता? या फिर यह मान लिया गया है कि अगर काम राम मंदिर के नाम पर हो, तो सारे नियम-कानून बेमानी हो जाते हैं? सवाल तो यही है, और इसका जवाब सिर्फ नगर निगम के पास है।

सीएम के दौरे का दबाव, और कबाड़ का मॉडल
इस पूरे मामले की शुरुआत अगस्त में हुई, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आगरा दौरा तय हुआ था। शायद मुख्यमंत्री को खुश करने की होड़ में, या फिर खुद को ‘कर्मठ’ साबित करने के लिए, नगर निगम ने एक नया खेल शुरू कर दिया। पिछले डेढ़ साल से इधर-उधर भटक रहे, कबाड़ से बने 30 फीट ऊँचे और 40 फीट लंबे राम मंदिर के मॉडल को रातों-रात सेना की जमीन पर रख दिया गया।
यह मॉडल, जैसा कि बताया जा रहा है, लोहे की चादरों और पुराने बैनर-पोस्टर के फ्रेम से बना है। इसे रखने के लिए पिछले काफी समय से जगह नहीं मिल रही थी। लेकिन सीएम के आने की खबर ने नगर निगम को एक ‘अवसर’ दे दिया। क्या अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए या अपनी वाहवाही करवाने के लिए, आप किसी भी हद तक चले जाएंगे? क्या नगर निगम के लिए अपनी जमीन की कमी को छुपाने का एकमात्र तरीका सेना की जमीन पर कब्जा करना है?
सेना की चेतावनी, और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का बोर्ड
जब नगर निगम ने इस मॉडल को पक्का करने के लिए चबूतरा बनाना शुरू किया, तो सेना के जवान मौके पर पहुँचे और काम रुकवा दिया। उन्होंने साफ शब्दों में नगर निगम को जमीन खाली करने का निर्देश दिया। लेकिन नगर निगम ने इसे अनदेखा कर दिया। शायद उन्हें लगा कि ‘राम मंदिर’ के नाम पर कोई उनसे उलझेगा नहीं। लेकिन सेना नियमों और अनुशासन से चलती है, और उसके लिए राष्ट्र से ऊपर कुछ भी नहीं।
जब सारी बातें और सिफारिशें नाकाम हो गईं, तो सेना ने भी अपना मोर्चा खोल दिया। पहले उन्होंने मॉडल को ग्रीन नेट से ढका और फिर पैराशूट के कपड़े से पूरा ढक दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने वहाँ एक बोर्ड भी लगा दिया जिस पर लिखा है, “ऑपरेशन सिंदूर- इंडियन आर्मी”। यह कोई आम चेतावनी नहीं है। यह साफ-साफ संदेश है कि नगर निगम अपनी हद में रहे।
नगर निगम के अधिकारियों ने लखनऊ और दिल्ली तक सिफारिशें लगवाईं, ताकि इस मामले को दबाया जा सके। लेकिन सेना ने इन सिफारिशों को भी नजरअंदाज कर दिया। यह दिखाता है कि सेना अपने नियमों पर कितनी अडिग है, जबकि नगर निगम कितनी लचर और लापरवाही से काम करता है।
क्या यह वही नगर निगम है जो सालों से शहर को साफ-सुथरा बनाने के वादे करता रहा है? क्या यह वही संस्था है जो जनता को नियमों का पाठ पढ़ाती है? क्या यह वही बुलडोजर वाला नगर निगम है जो अपनी ही जमीन पर अवैध कब्जा करा चुका है? ये सवाल सिर्फ सवाल नहीं हैं, ये आगरा की जनता के मन में उठ रहे हैं। इसका जवाब तो शायद वक्त ही देगा।
-मोहम्मद शाहिद की कलम से
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