आगरा: न्याय की प्रक्रिया को आम जनता के करीब लाने के लिए आगरा कॉलेज के विधि संकाय में एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। ‘भारतीय भाषा अभियान’ के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि जब तक न्याय की भाषा जनता की अपनी भाषा (मातृभाषा) नहीं होगी, तब तक न्याय की सच्ची अनुभूति संभव नहीं है।
अंग्रेजी की जटिलता से मुक्ति की मांग
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य प्रोफेसर सी. के. गौतम और मुख्य वक्ता प्रोफेसर अरविंद मिश्रा ने कहा कि मातृभाषा में विधि शिक्षा से छात्र न केवल अधिक आत्मविश्वासी बनते हैं, बल्कि वे कानून की बारीकियों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। पूर्व जिला जज गोपाल कुलश्रेष्ठ ने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जिला न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग से न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ी है और पक्षकार अब अपने आदेशों को स्वयं समझ पा रहे हैं।
संविधान में संशोधन और व्यावहारिक बदलाव पर जोर
विशिष्ट अतिथि श्रीमती अंजलि वर्मा (ADGC Civil) ने भारतीय भाषा अभियान के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन की आवश्यकता बताई। उन्होंने आह्वान किया कि वादपत्र, हस्ताक्षर और यहाँ तक कि नेम प्लेट में भी अपनी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए। संगोष्ठी में वक्ताओं ने माना कि हिंदी में निर्णय आने से भ्रम और शोषण की संभावना कम होती है। कार्यक्रम का सफल संचालन छात्रा झील गौतम ने किया।
संगोष्ठी में प्रोफेसर डी. सी. मिश्रा, प्रोफेसर एम. एम. खान, प्रोफेसर रीता निगम, प्रोफेसर उमेश कुमार, प्रोफेसर गौरव कौशिक, प्रोफेसर संजीव शर्मा, प्रोफेसर रिजु निगम समेत बड़ी संख्या में शिक्षकगण मौजूद रहे।
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