सरकारी तंत्र पर सवाल: टैक्स देने के बाद भी क्यों नहीं मिल रहीं बुनियादी सुविधाएँ?

लेख

देश का आम नागरिक हर साल अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देता है, ताकि उसे सुरक्षित जीवन, बेहतर स्वास्थ्य-सेवाएँ, स्वच्छ हवा-पानी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और मजबूत बुनियादी ढाँचा मिल सके। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। लोगों के सामने आज भी वही समस्याएँ खड़ी हैं, जिन पर नियंत्रण रखना सरकार की जिम्मेदारी है।

आज हालात यह हैं कि—

सड़क दुर्घटनाएँ और गड्ढों में गिरकर होने वाली मौतें आम हो चुकी हैं।

शहरों की जहरीली हवा लोगों को बीमार कर रही है।

खुले में और पैकेटों में मिल रहा मिलावटी खाना स्वास्थ्य के लिए खतरा बना हुआ है।

सरकारी अस्पतालों की कमजोर व्यवस्थाएँ लोगों को मजबूर करती हैं कि वे महंगे निजी अस्पतालों का रुख करें।

फर्जी और घटिया दवाइयों का कारोबार रुकने का नाम नहीं ले रहा।

शिक्षा में फीस की लूट आम बात हो चुकी है।

विडंबना यह है कि जिन सरकारी विभागों, एजेंसियों और आयोगों को इन समस्याओं की निगरानी व सुधार के लिए बनाया गया था, उनमें से कई पर सवाल उठते हैं कि वे जनता के हितों की रक्षा करने के बजाय बड़े व्यवसायियों, ठेकेदारों और विभिन्न लॉबी की तरफ झुक गए हैं।

नागरिक बेहतर जीवन के लिए टैक्स देता है, लेकिन साफ पानी के लिए RO खरीदना पड़ता है, स्वच्छ हवा के लिए एयर प्यूरीफायर लगाना पड़ता है, अच्छी शिक्षा व इलाज के लिए निजी संस्थानों का सहारा लेना पड़ता है—और इन सब पर भी अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ता है।

ऐसे में आम आदमी का यह सवाल वाजिब है कि उसके टैक्स का बड़ा हिस्सा आखिर जाता कहाँ है? जनसुविधाओं पर होने वाला खर्च सीमित है, जबकि नेताओं की सुरक्षा, उनसे जुड़ी सुविधाएँ, लग्जरी वाहन और सरकारी बंगलों के रखरखाव पर भारी राशियाँ खर्च होती रहती हैं।

यह स्थिति बताती है कि केवल टैक्स देना ही काफी नहीं, नागरिकों को यह भी पूछना होगा कि उनके पैसे का सही उपयोग हो रहा है या नहीं। तभी किसी भी लोकतंत्र में जनहित के कार्य सही दिशा में आगे बढ़ पाएंगे।

-सब माया है-

Dr. Bhanu Pratap Singh