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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.
उत्तर प्रदेशीय जूनियर हाईस्कूल (पूर्व माध्यमिक) शिक्षक संघ ने अपने मण्डल अध्यक्ष श्री ज्ञानेंद्र सिंह चौहान के कुशल नेतृत्व में शिक्षकों की वर्षों से लंबित समस्याओं को लेकर निर्णायक कदम उठाया।
संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने मण्डलीय सहायक शिक्षा निदेशक, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, और वित्त एवं लेखा अधिकारी को एक मांगपत्र सौंपा, जिसमें शिक्षकों की प्रमुख समस्याओं के त्वरित समाधान की गुहार लगाई गई।
वेतन समय से मिले — यही तो बुनियादी हक है
संगठन ने सबसे पहले जुलाई माह का वेतन शीघ्र आहरित करने की मांग की। यह भी आग्रह किया गया कि हर माह की पहली तारीख को वेतन अनिवार्य रूप से मिले, ताकि शिक्षकों को आर्थिक अस्थिरता से न जूझना पड़े।
वित्त एवं लेखा अधिकारी ने आश्वासन दिया कि मंगलवार को वेतन आहरित कर दिया जाएगा।
सम्मान मिले उन्हें, जो विद्यालय की बागडोर थामे हैं
प्रभारी प्रधानाध्यापकों को अब तक उनके परिश्रम और ज़िम्मेदारी के अनुरूप वेतन नहीं मिल रहा था। शिक्षक संघ ने माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश का हवाला देते हुए यह मांग रखी कि उन्हें भी प्रधानाध्यापक के समान वेतन मिलना चाहिए।
यह एक ऐसी मांग है जो सिर्फ तनख्वाह नहीं, सम्मान और गरिमा का सवाल है।
समायोजन का जाल न बने शिक्षकों की मुश्किल
पोर्टल की तकनीकी अड़चनों ने समायोजन प्रक्रिया को अव्यवस्थित कर दिया है। संगठन ने यह मांग रखी कि समायोजन पारदर्शी हो —
- रिक्त पदों का स्पष्ट प्रकाशन किया जाए,
- विषयवार पदों की जानकारी हो,
- पहले चरण में समायोजित लोगों को इस बार न जोड़ा जाए,
- वरिष्ठता का सम्मान हो,
- नियुक्ति वर्ग का पूरा ध्यान रखा जाए।
यह मांगें सिर्फ प्रक्रिया की बात नहीं करतीं, बल्कि न्याय और योग्यता के सम्मान की पुकार हैं।
संगठन की एकजुटता: भरोसे की बुनियाद
मांगपत्र सौंपने वालों में मण्डल उपाध्यक्ष श्री हरेश चौहान, वरिष्ठ मण्डल उपाध्यक्ष श्री अजय सिकरवार, मण्डल मंत्री श्री मानवेन्द्र सिंह तोमर, और नीरज वरुण जी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
उनकी उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि शिक्षक समाज अब मौन नहीं रहेगा।
✍️ संपादकीय टिप्पणी
“शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते, वे भविष्य की रचना करते हैं।”
यदि वही शिक्षक अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए दर-दर की ठोकरें खाएं, तो यह व्यवस्था पर एक करारी टिप्पणी है।
वेतन हो, पदोन्नति हो, या समायोजन — शिक्षक की गरिमा से बड़ा कुछ नहीं होना चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों की आवाज़ को उपेक्षा से नहीं, सम्मान और संवेदना से सुने।
आज के मांगपत्र के साथ केवल मांगे नहीं सौंपीं गईं, एक प्रशासनिक आत्मा को जगाने की दस्तक दी गई है।
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