Lucknow, Uttar Pradesh, India. ऋषभदेव निर्वाण दिवस पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन 31 जनवरी, 2022 को शुभचिंतक फाउन्डेशन एवं श्री आदिनाथ मेमोरियल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। वेबिनार का विषय था- भगवान ऋषभदेव की तीर्थंकर परंपरा इतिहास एवं पुरातत्व के आलोक में। विद्वानों ने भगवान जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के विषय में उपयोगी जानकारी दी। पुराणों का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान ऋषभदेव का संबंध भगवान शिव से है। आगरा के वरिष्ठ पत्रकार फतेहपुर सीकरी और जैन धर्म पर शोधपत्र प्रस्तुत किया, जिसकी खासी चर्चा रही। प्रसिद्ध जैन विद्वान प्रो. फूलचंद जैन ‘प्रेमी’ ने कहा- मेरे वश में होता तो डॉ. भानु प्रताप सिंह को पद्मश्री दे देता।
सारस्वत वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. भानु प्रताप सिंह ने कहा– फतेहपुर सीकरी के बारे में कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर ने 1569 में बसाया। हकीकत तो यह है कि फतेहपुर सीकरी जिन टीलों पर बसी है, उनमें एक ऐसा इतिहास छिपा हुआ है, जिसे खोजा जाना आवश्यक है। वर्ष 1999-2000 में हुए उत्खनन के दौरान इस विलुप्त इतिहास की झलक मिल चुकी है। मैंने एक रिपोर्टर के रूप में अमर उजाला अखबार में रिपोर्टिंग की। फतेहपुर सीकरी वास्तव में जैन धर्म और हिन्दू धर्मावलंबियों की नगरी थी। आततायियों ने जैन और हिन्दू धर्म के मंदिर ध्वंस कर दिए। मंदिरों की मूर्तियों को टीलों में दबा दिया। हो सकता है ये मूर्तियां सीकरी के किले में विराजित रही हों। उत्खनन में जैन मंदिर के अवशेष मिलने शुरू हुए थे लेकिन विरोध के चलते काम बंद करना पड़ा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. धर्मवीर शर्मा का स्थनांतरण हो गया। मैं भी असहाय हो गया। जैन तीर्थंकरों की सिरविहीन प्रतिमाएं मिली हैं। सबसे बड़ी खोज जैन सरस्वती है, जो सदी की सबसे बड़ी खोज मानी गई। तथ्यों सिद्ध होता है कि फतेहपुर सीकरी जैन धर्म का प्रमुख केन्द्र थी। इस पुस्तक के आधार पर कई लोगों ने एमफिल और पीएचडी कर ली। आगरा विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. सुगम आनंद के सुझाव पर पुस्तक छपवाने का विचार बना। स्वरूपचंद जैन मार्संस का अप्रतिम सहयोग रहा। मेरा सम्मान भी हुआ लेकिन जैन समाज ने फतेहपुर सीकरी में अग्रिम खोज की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने बताया कि फतेहपुर सीकरी की असली कहानी सबके सामने लाने के लिए मैंने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के समझ शोध परियोजना प्रस्तुत की ताकि धन मिल सके। यह परियोजना अस्वीकृत कर दी गई क्योंकि मुगलकालीन इतिहास के असत्य का खुलासा होने वाला था। खेद है कि जैन समाज ने भी कोई रुचि नहीं ली। इसलिए हम आज भी यही पढ़ रहे हैं कि फतेहपुर सीकरी को अकबर ने बसाया था और सुमन शैय्या न त्यागी तो भविष्य में भी यही पढ़ते रहेंगे।
डॉ. भानु प्रताप सिंह ने कहा- फतेहपुर सीकरी में व्यापक उत्खनन की आवश्यकता है। फतेहपुर सीकरी आसपास के गांवों में भी जैन मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं, जिन्हें सहेजा जाए। फतेहपुर सीकरी पर शोध के लिए बजट की व्यवस्था हो क्योंकि कठिन कार्य है। अशोक जैन सीए के निधन के बाद आगरा के जैन समाज ने इस संबंध में कोई कार्य नहीं किया। जैन समाज आगे आए। मेरा मानना है कि फतेहपुर सीकरी अकबर से पहले जैन नगरी थी। बाद में सिकरवारों का राज रहा। राणा सांगा और बाबर के बीच खानवा युद्ध में फतेहपुर सीकरी के शासक बाबा धामदेव ने राणा सांगा का साथ दिया। राणा सांगा की पराजय के बाद बाबर ने कब्जा कर लिया। इसके प्रमाण बाबरनामा में इसलिए नहीं मिलते हैं कि उसके कई पन्ने गायब हैं। निश्चित रूप से यह काम अकबर ने किया होगा ताकि वह फतेहपुर सीकरी को स्वयं निर्मित बता सके।
सिंधुघाटी अध्येता डॉ. करुणा शंकर शुक्ला ने ऋषभदेव भारतीय कला एवं पुरातत्व के परिप्रेक्ष्य में विषय पर व्याख्य़ान में कहा- भागवत पुराण के अनुसार ऋषभदेव की माता का नाम मेरु देवी था। भगवान ने उनकी माता की कामना पूर्ति के लिए स्वयं पुत्र के रूप में धरती पर ऋषभदेव के रूप में अवतरण किया। ऋषभदेव ब्रह्मा जी की पांचवीं पीढ़ी के रूप में अवतरित हुए। भगवान ऋषभदेव भारतीय प्राचीन परंपरा के शिखरस्थ पुरुष थे। उनका विवाह इन्द्र की पुत्री जयंती से हुई। उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर हमारे महान देश का नाम भारत विश्वविख्यात हुआ। ऋषभदेव ने “स्वयं को जानो” का प्रतिपादन किया। शांति, मैत्री, करुणा, दया की भावना को महत्व देते थे। सिंधुघाटी की सभ्यता में प्राप्त मुद्राओं पर पुराणों के नाम लिखे हुए हैं। ऋषभदेव ने शिक्षा दी कि शरीर को विषय-भोग के लिए नहीं, ब्रह्मानंद प्राप्त करने के लिए लगाना चाहिए। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र पर बल दिया। हर धर्म के लिए यह महत्वपूर्ण है।

जैन विद्वान एवं मुख्य अतिथि प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी ने कहा- पहली बार सुना है डॉ. भानु प्रताप सिंह को। उन्होंने उजागर कर दिया है सबकुछ। विश्व की सबसे सुंदर जैन सरस्वती की मूर्ति है जो फतेहपुर सीकरी में खोदाई में निकली है। मेरी क्षमता होती और बल चलता तो आज उन्हें पद्मश्री से नवाज देता। आगरा, फतेहपुर सीकरी, मथुरा ब्रज मंडल जैन धर्म का गढ़ था। जैन कला का केन्द्र रहा है। मथुरा का कंकाली टीला में ऋषभदेव की प्राचीन मूर्ति प्राप्त हुई है। डॉ. भानु प्रताप सिंह ने ऋषभ देव की मस्तकविहीन प्रतिमा दिखाकर हमें द्रवित कर दिया है। आततायियों ने जैन मंदिरों को नष्ट करके मुगलों ने किले और मस्जिदें बना दिए। जमुनालाल हफावत से आग्रह किया कि डॉ. भानु प्रताप सिंह की पुस्तक को प्रकाशित करें। जैन संस्कृति पर कार्य करने के लिए विद्वानों को प्रोत्साहित करें।
प्रो.प्रेमी ने कहा- उपाध्याय ज्ञानसागर ने जब मथुरा में चातुर्मास किया तो कहा कि कंकाली टीला छोटा स्थान नहीं है। जितनी मूर्तियां मथुरा संग्रहालय में हैं, उतनी ही दबी हुई हैं। चारों तरफ मकान बना लिए हैं, उनकी नींव में जैन मूर्तियां दबी हुई हैं। ईसापूर्व की मूर्तियां विदेश में बेची जा रही हैं। अयोध्या जैन समाज का है। सच्चाई के लिए आगे आएं। हाथ पर हाथ रखकर न बैठे रहें। अपनी संस्कृति को आगे लाएं। ऋषभदेव प्रतिष्ठान ने बहुत काम किया है।
उन्होंने कहा- श्रमण संस्कृति ने इस देश का नाम भारत दिया। भगवान आदिनाथ ने अपनी ज्येष्ठ पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या सिखाई, उसी के नाम पर ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी से सभी लिपियों की जननी हैं। भारतीय ज्ञान पीठ से प्रकाशित पुस्तक श्रमण संस्कृति एवं वैदिक एरा में अपने 15 वर्ष के अध्ययन का निचोड़ प्रस्तुत किया है। जैन मंदिरों को तोड़कर कुतुबमीनार बनाई गई। आज भी खंबों पर जैन मूर्तियां हैं। उल्लेखनीय है कि प्रो. फूलचंद जैन प्रमी जैन धर्म में श्रमणसंघ, संस्कृत वांग्मय का वृहद् इतिहास (जैन-बौद्ध-चार्वाक दर्शन) जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं। प्राकृत, पाली, अपभ्रंश, संस्कृत, जैन, बौद्ध दर्शन और प्राचीन साहित्य के जानकार हैं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के जैन दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर एवं प्रमुख हैं। अनुसंधान कार्यों के मार्गदर्शन के लिए व्यापक रूप से प्रशंसित हैं। कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों की अकादमिक परिषदों के सदस्य हैं। बी.एल. इंडोलॉजी संस्थान, दिल्ली के निदेशक हैं।
ग्लोबल महासभा के संस्थापक अध्यक्ष जमुनालाल जैन हपावत ने कहा- हमारे प्रिय तीर्थ जीर्ण-शीर्ण हो रहे हैं। मेरे मन में इन तीर्थों के जीर्णोद्धार की भावना है। समाज साथ दे। आश्वासन देता हूँ कि इन चीजों में आगे बढ़ूंगा। डॉ. भानु प्रताप सिंह का वक्तव्य सुनकर दुख हुआ कि कुछ लोगों ने फतेहपुर सीकरी में खोदाई रुकवा दी।
अंतरराष्ट्रीय जैन विदुषी डॉ. नीलम जैन ने अध्यक्षता की। उन्होंने कहा- ऋषभदेव के संबंध में कुरुक्षेत्र और मेरठ विश्वविद्यालय में अनेक संगोष्ठियां की हैं। पूरे विश्व में गूंज है। वेद और पुराणों में व्यापक चर्चा है। अथर्ववेद में वर्णन है कि इक्ष्वाकु वंश के ऱाजा इक्ष्वाकु का प्रयोग किया करते थे। कौन सी ऐसी विधा, विज्ञान, कला है जिसका व्यापक ज्ञान नहीं दिया। उन्होंने 81 मंजिल के महल में जन्म लिया, जिसकी आंतरिक संरचना आश्चर्य का विषय है। जब भी विज्ञान ने कला को छोड़ा, अभिशाप हो गई। मथुरा के कंकाली टीले का जिक्र किया।
उन्होंने कहा- डॉ. भानु प्रताप सिंह में जैनत्व नहीं होता तो इतना कष्ट सहकर काम करते क्या। उनका यह कहना कि जैन समाज सहयोग नहीं दे रहा है, निश्चित रूप से उनकी यह पीड़ा है। पुरातत्वप्रेमी आपके साथ हैं, सब सहयोग देंगे। मैं नहीं मेरी पुस्तकें अलख जगाएंगी। विद्वानों की आवाज गर्जना करती है, अंदर तक भेदती है। जिनके हृदय में पुस्तकों का प्रेम है, मार्गदर्शन मिलता रहेगा। आपकी पुस्तक जीवंत होगी। घर-घर पहुंचेगी आपकी बात। अपनी आवाज उठाओ क्योंकि यह धर्म जातिवाद में नहीं चला। जैन जीने की कला है। दुनिया जैन बनेगी। जहां सशक्तता के साथ बात रखी जाती है तो विरोध होता है। अंतरंग खोलकर रख दिया है आपने।
डॉ. जैन ने कहा- पूरी भारतीय संस्कृति प्रतीकात्क है। हर चीज मरती है लेकिन प्रतीक कभी मरते नहीं हैं क्योंकि ये प्रकृति के माध्यम से बनते हैं। उस समय केवल ज्ञान था, केवल ज्ञान यानी कुछ भी शेष नहीं रह जाना। हमने सबके कल्याण की बात कही है। सर्वे भवन्तु सुखिनः की बात कही है। उन्होंने शैलेन्द्र जैन के प्रयास की सराहना की। उल्लेखनीय है कि डॉ. नीलम जैन ने 80 से अधिक देशों की यात्रा की है। अमेरिका में प्रोफेसर रही हैं। 1000 से अधिक मंचों पर सम्मान हो चुका है। अखिल भारतीय महिला महासभा की संस्थापक हैं। जैन समाज की प्रथम महिला जिन्होंने राजभवनों में भी जैन धर्म को गुंजायमान किया है।
डॉ. भानु प्रताप सिंह ने एक सवाल किया- क्या ऋषभदेव शिव के अवतार थे? इसके जवाब में करुणा शंकर शुक्ला ने कहा कि ऋषभदेव, विष्णु के अवतार माने गए हैं, ऐसा भागवत पुराण में उल्लिखित है। प्रोफेसर फूलचंद जैन प्रेमी और शैलेन्द्र जैन ने कहा- ऋषभदेव का संबंध शंकर से है। शिव ही ऋषभदेव के रूप में आए।
प्रारंभ में संगोष्ठी के संयोजक, अनेक पुरस्करों से सम्मानित, श्री आदिनाथ मेमोरियल ट्रस्ट के अध्यक्ष और संपादक शैलेन्द्र जैन (लखनऊ) ने गोष्ठी की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बृज प्रदेश में मथुरा, फतेहपुर सीकरी, शौरीपुर बहुत प्राचीन क्षेत्र हैं। सभी का आभार जताया। दिल्ली के ऋषभदेव प्रतिष्ठान ने 80-90 के दशक में बहुत अच्छे काम किए थे। तीर्थंकर परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सेमिनार किए। 20 साल से यह कार्य बंद हो गया। फिर मैं स्वरूपचंद जैन से आगरा जाकर मिला। आगरा में संगोष्ठी भी की। सरस संचालन डॉ. ममता जैन (पुणे) ने किया। अभिषेक जैन, डॉ. यतीश जैन जबलपुर, प्रभाकिरन जैन, रेनू जैन, संदीप जैन आदि की सहभागिता उल्लेखनीय रही।
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