शंकराचार्य विवाद पर गौरीशंकर सिंह सिकरवार का ये आलेख आपने पढ़ा क्या

लेख

 

धर्म, न्याय और जनविश्वास का संतुलन

शासन और आस्था का संवेदनशील संगम

उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन केवल शासन की प्रक्रिया नहीं है, यह आस्था, विश्वास और जनभावनाओं के साथ चलने वाली संवेदनशील जिम्मेदारी भी है। जब बात सनातन परंपरा और शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धार्मिक पद की हो, तब यह संवेदनशीलता और भी अधिक आवश्यक हो जाती है।

शंकराचार्य की परंपरा का महत्व

शंकराचार्य कोई साधारण उपाधि नहीं है। यह उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जिसकी जड़ें आदि गुरु शंकराचार्य की वैचारिक विरासत में हैं—एक ऐसी विरासत जिसने इस राष्ट्र को दार्शनिक आधार, आध्यात्मिक दिशा और सांस्कृतिक एकता प्रदान की। इसलिए जब इस परंपरा से जुड़े किसी संत के विरुद्ध कार्रवाई की चर्चा होती है या आरोपों का वातावरण बनता है, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में प्रश्न, पीड़ा और असुरक्षा की भावना पैदा करता है।

न्याय की प्रक्रिया और विश्वसनीयता

लोकतंत्र में कानून सर्वोपरि है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन कानून का संचालन किन तथ्यों, किन स्रोतों और किन व्यक्तियों के आधार पर हो रहा है—यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि किसी ऐसी रिपोर्ट या ऐसे व्यक्ति के आधार पर वातावरण निर्मित हो, जिसकी विश्वसनीयता स्वयं प्रश्नों के घेरे में रही हो, तो स्वाभाविक है कि जनता के मन में संशय उत्पन्न होगा। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए—और वह भी निष्पक्षता के साथ।

जनता की पीड़ा और जनविश्वास

जनता कानून से भयभीत नहीं होती; वह अन्याय, अपमान और असंतुलित व्यवहार से आहत होती है। धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में यदि निर्णय असावधानी, अधूरी जानकारी या पूर्वाग्रह से प्रभावित प्रतीत हों, तो उसका असर प्रशासनिक दायरे से बाहर जाकर सामाजिक विश्वास पर पड़ता है। विश्वास का क्षरण धीरे-धीरे होता है, पर उसका परिणाम व्यापक असंतोष के रूप में सामने आता है।

संतुलित निर्णय की आवश्यकता

आज आवश्यकता है कि हर तथ्य की गहराई से जाँच हो, हर स्रोत की विश्वसनीयता परख ली जाए और हर निर्णय पारदर्शिता के साथ लिया जाए। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य से यही अपेक्षा की जाती है कि वह धर्म की गरिमा और न्याय की मर्यादा—दोनों की रक्षा करे। संतुलन ही सुशासन की असली पहचान है।

समय, इतिहास और उत्तरदायित्व

समय गवाह है, जनता साक्षी है और इतिहास अंतिम मूल्यांकन करता है। इसलिए हर कदम ऐसा हो जो आने वाले वर्षों में भी न्यायसंगत और विवेकपूर्ण माना जाए। यही धर्म की भी विजय है और राष्ट्र की भी।

गौरीशकर सिंह सिकरवार, आगरा 

(लेखक कवि, विचारक और राजनीतिज्ञ हैं)

संपादकीय

धर्म और शासन का संबंध सदैव मर्यादा और संतुलन पर आधारित रहा है। जब भी इन दोनों के बीच संवाद की जगह टकराव का आभास उत्पन्न होता है, तो समाज में अनावश्यक तनाव पैदा होता है। प्रशासन को चाहिए कि वह निष्पक्षता की ऐसी मिसाल प्रस्तुत करे, जिससे श्रद्धा और संविधान दोनों सशक्त हों। न्याय की प्रतिष्ठा ही राज्य की वास्तविक शक्ति है। यदि निर्णय पारदर्शी और तथ्यपरक होंगे, तो जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।

डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक