व्यंग: रीलपुर का उज्ज्वल भविष्य…जब होमवर्क में ‘निबंध’ की जगह मिलेगी ‘स्क्रिप्ट’

रीलपुर ने आखिरकार मान लिया कि भविष्य वही है जो 30 सेकंड में समझ आ जाए और 15 सेकंड में स्किप भी किया जा सके। इसलिए इस बार रीलपुर के बजट में राष्ट्र निर्माण का नया फार्मूला आया है: पहले रील बनाओ, फिर रियलिटी अपने आप बन जाएगी। स्कूलों में अब कंटेंट क्रिएशन लैब्स खुलेंगी। […]

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​नारा या हकीकत? क्या 2047 की राजनीति भारत को दिला पाएगी वैश्विक गुरु का दर्जा?

जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफ़र का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ़ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक़्क़ी की, कितनी सड़कें बनीं […]

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बंद दरवाजों के पीछे सिसकती बुजुर्गियत! रिश्तों की दूरी या बदलता समाज? भीड़ में अकेले पड़ते बुजुर्गों की बढ़ती दुनिया

आगरा में एक फ्लैट के भीतर कई दिनों तक सन्नाटा रहा। दरवाज़ा बंद, अंदर कोई हलचल नहीं। फिर अचानक उठती दुर्गंध ने पड़ोसियों को चौंकाया। दरवाज़ा खुला तो भीतर 78 वर्षीय रिटायर्ड इंजीनियर शैलेंद्र कुमार का शव मिला। पास ही दवाइयां, खाने के पैकेट और रोज़मर्रा का सामान रखा था। ज़िंदगी जैसे धीरे-धीरे चल रही […]

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भावनात्मक शोषण की सामाजिक हकीकत: क्यों रिश्तों में मौन रहने वाला ही सबसे अधिक आहत होता है?

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार मनुष्य का जीवन रिश्तों के ताने-बाने से ही आकार लेता है। परिवार, मित्रता, प्रेम, सहयोग और सामाजिक संबंध—ये सभी हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करते हैं। किंतु आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रिश्तों में संवेदनशीलता की जगह स्वार्थ ने ले ली है और […]

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समानता या नया विवाद? यूजीसी के प्रस्तावित भेदभाव विरोधी नियमों पर क्यों छिड़ी है बहस, जानें मुख्य बिंदु

बृजेश सिंह तोमर(वरिष्ठ पत्रकार एवं आध्यात्मिक चिंतक) उच्च शिक्षा केवल डिग्री देने की व्यवस्था नहीं, बल्कि समाज के बौद्धिक और नैतिक निर्माण का आधार है। ऐसे में विश्वविद्यालयों से जुड़े किसी भी नियमन का असर कक्षा से आगे बढ़कर समाज की संरचना और रिश्तों तक जाता है। यूजीसी के प्रस्तावित नए नियमों को लेकर उठ […]

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एमपी विधानसभा चुनाव 2028: क्या ‘लाड़ली बहना’ और ‘किसान कल्याण’ फिर बनेंगे भाजपा का कवच?

भारतीय राजनीति इस समय लाभार्थी योजनाओं और गारंटी आधारित राजनीति के दौर से गुजर रही है। चुनावी विमर्श अब केवल विचारधारा, संगठन या भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे-सीधे इस सवाल पर टिक गया है कि आम नागरिक के जीवन में कौन-सी योजना कितना ठोस, निरंतर और भरोसेमंद लाभ पहुंचा रही है। मध्य प्रदेश […]

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वेनेज़ुएला पर अमेरिका के सैन्य हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी सही या गलत : एक वैश्विक विवाद

इंदौर: वैश्विक राजनीति में एक नया, बेहद विवादास्पद तथा इतिहास बनाने वाला अध्याय जुड़ गया है। 3 जनवरी 2026 की रात अमेरिका ने दक्षिण अमेरिकी देश वेनेज़ुएला की राजधानी कराकास पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया और मात्र आधे घंटे के भीतर वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ़्तार […]

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मोबाइल की दुनिया और रिश्तों का एकांत: क्यों अब घर से ज्यादा वृद्धाश्रमों में सुकून ढूंढ रहे हैं बुजुर्ग?

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के दुर्गापुर स्थित आवास में सेवानिवृत्त जिला विकलांग अधिकारी जावेद फारुकी (65) का शव बिस्तर पर मिलना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के भीतर पल रहे गहरे अकेलेपन की भयावह तस्वीर पेश करता है। यह घटना उस सामाजिक ढांचे पर सवाल खड़े करती है, जहां लोग भीड़ […]

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118 साल बाद भी ज़िंदा है ‘पूस की रात’, खेत से निकलकर फुटपाथ तक पहुंची ठंड की कहानी

आगरा। यह 17 साल का सोनू है—जिसकी उम्र से कहीं ज़्यादा भारी उसकी ज़िंदगी है। तीन साल पहले एक सड़क हादसे ने उससे मां-बाप दोनों छीन लिए। आज न घर है, न छत और न कोई स्थायी सहारा। महात्मा गांधी मार्ग के फुटपाथ पर लगभग बुझ चुकी आग के पास बैठा सोनू अपने बदन में […]

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व्यंग्य: ​अंधेर नगरी का नया ‘प्रदूषण’ अध्याय; जहाँ तंदूर गुनहगार है और धुआं कारोबार!

न्याय पालिका ने हाल ही में राज सभा और संबंधित अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करते हुए एक बड़ा ही ‘अजीब’ सवाल पूछ लिया। कोर्ट ने पूछा कि जब इंद्रप्रस्थ की हवा ‘इमरजेंसी’ के दौर से गुजर रही है और लोग सांस के बदले जहर फांक रहे हैं, तो एयर प्यूरीफायर जैसी जीवनरक्षक मशीन पर […]

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