शब्दो के जाल से नस्लवादी राजनीति…नीली जींस में यूजेनिक्स के अवशेष….

कल्पना पांडे कपड़े बेचने वाली ‘अमेरिकन ईगल’ नामक आर्थिक घाटे में चल रही कंपनी ने 23 जुलाई 2025 को गोरी त्वचा, सुनहरे बाल और नीली आँखों वाली अभिनेत्री सिडनी स्वीनी को बतौर मॉडेल लेते हुए एक विज्ञापन जारी किया। इस विज्ञापन में ‘सिडनी स्वीनी हैज ग्रेट जींस’ नामक कैचलाइन का उपयोग किया गया। अंग्रेजी के […]

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 43 बार टाली जमानत: सीजेआई का कड़ा वार और लोकतंत्र से जुड़ा असहज सवाल

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट पर एक टिप्पणी की है, जिसकी गूंज अदालतों की दीवारों से बाहर, लोकतंत्र की आत्मा तक सुनाई देनी चाहिए। मामला किसी साधारण बहस का नहीं था, बल्कि एक इंसान की ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का था। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे […]

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शिक्षा, संस्कार और समाज की जिम्मेदारी : बदलते छात्र-शिक्षक संबंध और सही दिशा की तलाश

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार आज शिक्षा केवल अंक और नौकरी तक सीमित हो गई है। नैतिक मूल्य और संस्कार बच्चों की प्राथमिकता से गायब होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप शिक्षक-छात्र संबंधों में खटास बढ़ रही है और अनुशासनहीनता सामने आ रही है। यदि परिवार, समाज, शिक्षक और प्रशासन मिलकर सही कदम नहीं […]

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परंपरा से प्रौद्योगिकी की ओर: प्राचीन ज्ञान और भविष्य की तकनीक का सेतु है संस्कृत

डॉ सत्यवान सौरभ संस्कृत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। इसकी वैज्ञानिक व्याकरणिक संरचना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डिजिटल तकनीकों के लिए आदर्श है। संस्कृत का पुनर्जीवन भारत को ज्ञान और तकनीक की दिशा में विश्व का नेतृत्वकर्ता बना सकता है। यह भाषा हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए […]

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क्या भारत की नई ‘राजनीतिक डिक्शनरी’ में बापू का स्थान अब सावरकर से नीचे है?

आगरा — सत्ता का रंग ऐसा होता है कि वह हर चीज़ को अपनी सुविधा के अनुसार ढाल लेता है। इतिहास, भूगोल, यहाँ तक कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें भी। और जब सत्ता के पास ‘प्रशासनिक’ और ‘वैचारिक’ दोनों तरह की बैसाखियाँ हों, तो फिर क्या कहने! पेट्रोलियम मंत्रालय के एक ताज़ा पोस्टर ने […]

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सोचिए! आप किसे फॉलो कर रहे हैं…लोकप्रियता नहीं, आदर्श ही जीवन की दिशा तय करते हैं

डॉ सत्यवान सौरभ फॉलो करना केवल सोशल मीडिया पर बटन दबाना नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन की दिशा तय करता है। करोड़ों लोग किसी को फॉलो करें, इसका अर्थ यह नहीं कि वह सच्चा आदर्श है। पान–गुटखा बेचने वाला खुद गुटखा नहीं खाता, यही दिखावे और सच्चाई का अंतर है। असली प्रेरणा हमें शहीदों, […]

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लोकतंत्र को बीमार कर रही प्रेस पर पाबंदी…क्या पत्रकारों की कलम बंद करने से देश आगे बढ़ेगा?

दुनिया के कई देशों में इन दिनों प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है. खासकर भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, जहां सरकार की नीतियों की आलोचना करने और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाने पर पत्रकारों पर बड़े पैमाने पर मुक़दमे दर्ज किए जा रहे हैं. इसका सीधा असर विश्व […]

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झूठे मुकदमों का कारोबार और वकीलों की जवाबदेही: जब न्याय के प्रहरी ही अपराधी बन जाएँ, तो कानून की आस्था कैसे बचे?

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार झूठे मुकदमे केवल निर्दोषों को पीड़ा नहीं देते, बल्कि न्याय तंत्र की नींव को भी हिला देते हैं। जब वकील ही इस व्यापार में शामिल होते हैं तो वकालत की गरिमा और न्यायपालिका की विश्वसनीयता दोनों पर गहरा आघात होता है। ऐसे वकीलों पर आपराधिक मुकदमे चलना अनिवार्य […]

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घुमन्तु समाज को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए जरुरी है केंद्र व राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति

भारत की सांस्कृतिक विविधता में घुमंतू समाज एक अनमोल रत्न की तरह है, जो अपनी अनूठी जीवनशैली और परंपराओं के साथ देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहा है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह समाज, दशकों से अपनी खानाबदोश प्रकृति के कारण मुख्यधारा से कटा हुआ है और आज भी मूलभूत सुविधाओं व अधिकारों […]

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टिकटॉक की ‘वापसी’: क्या यह सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी है या चीन से ‘बदला’ हुआ प्रेम?

दिल्ली: तो जनाब, एक बार फिर वही पुरानी कहानी। चीन से आया था एक तूफ़ान, नाम था टिकटॉक। 2020 में गलवान में कुछ हुआ और हमारे देश की सरकार ने एक झटके में 59 चीनी ऐप्स को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देकर बैन कर दिया। वाह! क्या दिन थे वो भी। देश की संप्रभुता और […]

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