रीलपुर ने आखिरकार मान लिया कि भविष्य वही है जो 30 सेकंड में समझ आ जाए और 15 सेकंड में स्किप भी किया जा सके। इसलिए इस बार रीलपुर के बजट में राष्ट्र निर्माण का नया फार्मूला आया है: पहले रील बनाओ, फिर रियलिटी अपने आप बन जाएगी।
स्कूलों में अब कंटेंट क्रिएशन लैब्स खुलेंगी। बच्चे पहले जहाँ साइंस लैब में मेंढक का डिसेक्शन करते थे, अब एल्गोरिदम का करेंगे। फर्क बस इतना होगा कि मेंढक कभी-कभी कट भी जाता था, एल्गोरिदम सिर्फ व्यूज़ काटेगा।
होमवर्क भी अपग्रेड होगा:
“पानी का महत्व समझाइए” की जगह
“पानी बचाने पर एक वायरल रील बनाइए, बैकग्राउंड में मोटिवेशनल म्यूज़िक हो।”
माता-पिता भी खुश हैं। अब उन्हें यह नहीं पूछना पड़ेगा कि “बड़े होकर क्या बनोगे?”
जवाब तय है: “कंटेंट क्रिएटर।”
डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक जैसे पुराने सपने अब वैसे ही लगेंगे जैसे ब्लैक एंड व्हाइट टीवी।
रीलपुर महाराज का लक्ष्य है 20 लाख प्रोफेशनल्स तैयार करना। प्रोफेशनल कौन? जो कैमरा ऑन करते ही गंभीर और कैमरा ऑफ होते ही बेरोज़गार हो जाए।
रीलपुर में पहली बार “रोज़गार” और “रिंग लाइट” का सीधा संबंध स्थापित हुआ है।
वैसे नीति बनाने वालों ने संतुलन की बात भी की है। एक तरफ एआई, डीप-टेक, रिसर्च; दूसरी तरफ रील, व्लॉग, शॉर्ट्स। यानी एक हाथ में माइक्रोचिप, दूसरे में ट्राइपॉड।
बस दिक्कत यह है कि माइक्रोचिप बनाने में सालों लगते हैं और ट्रेंड बदलने में हफ्ता।
शिक्षा का नया दर्शन साफ है:
गणित से दिमाग मत लगाओ, एनालिटिक्स से लगाओ।
भाषा में निबंध मत लिखो, स्क्रिप्ट लिखो।
नागरिक शास्त्र मत पढ़ो, “माय ओपिनियन ऑन नेशनल इश्यू” नाम से वीडियो डालो।
और अगर कभी कोई बच्चा सच में रिसर्च करना चाहे, तो उसे समझाया जाएगा कि “बेटा, रिसर्च में टाइम लगता है, रील में टाइमिंग।”
रीलपुर आगे बढ़ रहा है। अब तरक्की का पैमाना यह नहीं होगा कि आपने क्या बनाया, बल्कि यह कि कितनों ने देखा।
ज्ञान की गहराई से ज्यादा अब थंबनेल की चमक मायने रखेगी।
अंत में यही कहा जा सकता है: अगर भविष्य रील से बनना है, तो भगवान करे नेटवर्क स्ट्रॉन्ग रहे।
क्योंकि रीलपुर निर्माण अब 5G पर निर्भर है।
सब माया है
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