संस्कृति भवन में चार घंटे चले कवि सम्मेलन में ‘जीवन जीने की कला’

संस्कृति भवन में चार घंटे चले कवि सम्मेलन में ‘जीवन जीने की कला’

साहित्य

आजादी का अमृत महोत्सव में हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित किया जाए

संस्थान संगम की हिंदी पखवाड़े में हुई काव्य गोष्ठी और पुस्तक विमोचन

Agra, Uttar Pradesh, India. “नेह निमंत्रण मिल जाता तो सांसों में सरगम पी लेते” : रमा वर्मा श्याम के गीत को मिली सराहना आगरा । संस्थान संगम मासिक पत्रिका के तत्वावधान में आयोजित कवि सम्मेलन में वरिष्ठ गीतकार रमा वर्मा श्याम के प्रणय गीत “नेह निमंत्रण मिल जाता तो सांसों में सरगम पी लेते” और दुर्ग विजय सिंह दीप की कविता “दीप कैसे रूबरू होगा परवरदिगार से, जी रहा है जो खुदा के बंदों को मार के” को श्रोताओं ने काफी सराहा ।

राजभाषा हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के संस्कृति भवन में संस्थान संगम का वृहद कवि सम्मेलन एवं विजया तिवारी की पुस्तक “जीवन जीने की कला” का उद्योतन (विमोचन) संपन्न हुआ। काव्य पाठ का अनोखा दौर लगभग 4 घंटे तक अविरल गति से चला।

प्रथम सत्र में समारोह के मुख्य अतिथि प्रोफेसर लवकुश मिश्रा ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की अनुशंसा की। अध्यक्षता करते हुए डॉ. राजेंद्र मिलन ने हिन्दी को विश्व भाषा स्वीकृत किए जाने को लेकर सार्थक कविता का पाठ किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. शशि गोयल ने कहा कि हिन्दी को अमृत महोत्सव में राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए।

 स्वागताध्यक्ष प्रेम सिंह राजावत ने सभी आमंत्रित अतिथियों का स्वागत करते हुए हिन्दी वंदना प्रस्तुत की। पुस्तक की समीक्षा डॉ. रेखा कक्कड़ द्वारा की गई। प्रथम सत्र का संचालन सुशील सरित के द्वारा किया गया। पुस्तक रचयिता विजया तिवारी ने कहा कि अपनी पुस्तक के माध्यम से समाज के एक आदमी को भी जीवन जीने की राह दिखा पाई तो मैं अपने सृजन को सफल मानूंगी।

kavi sammelan
पुस्तक का लोकार्पण करते अतिथि

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डॉ. कमलेश नागर ने की। मुख्य अतिथि रहीं ग्वालियर से पधारी डॉ. मधुलिका सिंह तथा विशिष्ट अतिथि डॉ.शशि गोयल एवं डॉ. सुषमा सिंह रहीं। कार्यक्रम में 42 कवि एवं कवयित्रियों द्वारा कविता पाठ किया गया। विशिष्ट अतिथि डॉ. सुषमा सिंह द्वारा इस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि पर आए कुछ मैसेज को पढ़ा जिनमें हिन्दी के प्रति वेदना छिपी हुई थी। डॉ.शशि गोयल द्वारा सात फेरों को अपनी कविता का विषय बनाया।

मुख्य अतिथि डॉ. मधुलिका द्वारा शकुंतला के हृदय भावों को अपनी कविता में पिरोया। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. कमलेश नागर ने कहा कि पहले कही गई बात की पुनरावृत्ति करना सही नहीं है। कुछ नया कहना चाहिए। कवि का यह धर्म होना चाहिए कि वह श्रोता के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ संदेश अवश्य दे। द्वितीय सत्र का संचालन अशोक अश्रु द्वारा किया गया।

उपस्थित कवियों में डॉ. मधु भारद्वाज, रमा वर्मा श्याम, मीरा परिहार, संजय गुप्त, विनय बंसल, दुर्ग विजय सिंह दीप, डॉ. रमेश आनंद, शरद गुप्त, डॉ.सुनीता चौहान, हरीश अग्रवाल, वंदना चौहान, इंदल सिंह इन्दु, प्रणब कुमार, डॉ.आभा चतुर्वेदी, डॉ. शशि सिंह, डॉ. भावना, डॉ. रेखा गोतम, नीता दानी, सुधा कक्कड़, निधि गुप्ता, निकिता, निशा सिंह, डॉ. अनिल कुमार, ममता मिश्रा, दिनेश आगरिया, प्रकाश गुप्ता बेबाक, डॉ. अल्केश चौहान, रजनी सिंह, यशोधरा यशो, मानसिंह मनहर, वीरेन्द्र सिंह, कमलेश चन्द्र सेन, गौरव सिंह, मोहित सक्सेना, प्रेमलता मिश्रा, माया अशोक, रचना मिश्रा आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। धन्यवाद विजया तिवारी ने ज्ञापित किया ।

Dr. Bhanu Pratap Singh

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