आगरा। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर राधास्वामी मत के मुख्यालय दयालबाग में वर्ष 2026 का बसंत महोत्सव श्रद्धा, अनुशासन और निष्काम सेवा की भावना के साथ भव्य रूप से मनाया गया। दयालबाग ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में फैले सतसंग समुदाय ने भी इस पर्व को आध्यात्मिक उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया। इस आयोजन में दयालबाग जीवनशैली के मूल सिद्धांतों, जैसे कर्तव्यपालन, श्रम-साधना और फल की आसक्ति से मुक्त कर्म का संदेश प्रमुख रूप से दिखाई दिया।
दयालबाग में हर दिन की शुरुआत भगवद्गीता के संदेश “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” के भाव के साथ होती है। इसी अनुशासित परंपरा के अनुसार यहां सुबह तीन बजे सायरन की ध्वनि के साथ दिनचर्या प्रारंभ होती है और निवासी सूर्योदय से पहले ही निर्धारित स्थानों पर पहुंचकर एग्रो-इकोलॉजी फील्ड्स में सेवा कार्यों में जुट जाते हैं। आध्यात्मिक साधना और रचनात्मक श्रम का यही संगम बसंत उत्सव को विशेष गरिमा देता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास की बसंत पंचमी को दया, मेहर और परमानंद का अग्रदूत माना जाता है। शीत ऋतु के बाद बसंत के आगमन से प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है। संतों की दृष्टि में यह वही ऋतु है जब परम पुरुष का प्राकट्य संसार के लिए अत्यंत शुभ और उपयुक्त माना गया है।
दयालबाग के लिए बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत विशेष है। 15 फरवरी 1861 को बसंत पंचमी के दिन ही राधास्वामी मत के प्रथम आचार्य परम पुरुष पूरन धनी स्वामीजी महाराज ने जगत उद्धार का संदेश दिया और आम सतसंग का आरंभ हुआ। इसके बाद 20 जनवरी 1915 को बसंत पंचमी के अवसर पर पंचम आचार्य परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज ने शहतूत का पौधा रोपित कर दयालबाग की स्थापना की नींव रखी। वहीं 1 जनवरी 1916 को राधास्वामी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई, जो आज दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (DEI) के रूप में विश्व स्तर पर पहचान बना चुका है।
बसंत महोत्सव से पहले परम पूज्य वर्तमान संत सतगुरु प्रो. प्रेम सरन सतसंगी साहब ने दयालबाग की कॉलोनियों, सरन आश्रम अस्पताल, स्कूल, डेरी और स्वामीबाग स्थित पावन समाध स्थल का दौरा कर अपनी उपस्थिति से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। उनकी पावन उपस्थिति में ही बसंत-2026 समारोह का शुभारंभ हुआ।
उत्सव के दौरान खेतों में विभिन्न सत्रों के माध्यम से तीन सप्ताह से 12 वर्ष तक के बच्चों ने सामूहिक जाप, शारीरिक व्यायाम, आत्मरक्षा प्रदर्शन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। बच्चों की भागीदारी “इवॉल्यूशनरी, री-इवॉल्यूशनरी और जेंडर-फ्री सुपरह्यूमेन स्कीम” के अंतर्गत रही। इस दौरान “ब्रावो सुप्रीमल ऑक्टेवो” जैसे प्रेरक नारों से दयालबाग परिसर गूंज उठा और वातावरण में आध्यात्मिक उमंग की लहर दौड़ गई।
बसंत पंचमी के अवसर पर बेबी शो, फैंसी ड्रेस शो, जिम्नास्टिक्स प्रदर्शन और खेलकूद प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं, जिसमें बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक ने उत्साहपूर्वक सहभागिता निभाई। रात के समय देश-विदेश की सतसंग कॉलोनियों को आकर्षक रोशनी से सजाया गया। खास बात यह रही कि पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए दीपक और मोमबत्तियों के बजाय सौर एवं नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित लाइट्स का उपयोग किया गया।
कुल मिलाकर दयालबाग में बसंत-2026 का यह महोत्सव आध्यात्मिकता, अनुशासित जीवन, पर्यावरण चेतना और सांस्कृतिक उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। यह पर्व निष्काम सेवा, सादा जीवन और मानव-भ्रातृत्व के भाव को मजबूती से दर्शाता रहा।
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