राष्ट्र, राम और राणा सांगा: सचिन दीक्षित की कविता ने भर दिया देशभक्ति का ज्वार
मंच से गूँजी ललकार: महापौर हेमलता दिवाकर बोलीं— साहित्य शोभा नहीं, शौर्य है
राष्ट्र, राम और राणा सांगा: सचिन दीक्षित की कविता ने भर दिया देशभक्ति का ज्वार
सरस्वती पूजन, कवि सम्मेलन, साहित्यकार सम्मान के साथ सारंग फाउंडेशन का शुभारंभ
शायर दीपांशु शम्स को सारंग युवा सम्मान-2026, 12 साहित्यकारों को मिला सारंग सम्मान
डॉ. भानु प्रताप सिंह
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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat. साहित्यिक, सामाजिक व सांस्कृतिक प्रकल्पों को समर्पित सारंग फाउंडेशन ने 23 जनवरी को अपने प्रथम कार्यक्रम में इतिहास ही रच दिया। कवि सम्मेलन में देशभक्ति की ऐसा तूफान उठा कि लोग कविगण और श्रोता भारत माता की जाय, वंदे मातरम, जय श्रीराम की गूंज करते रहे। तन पर 80 घाव होने के बाद भी युद्धरत रहे महान वीर राणा सांगा पर सचिन दीक्षित की कविता ने रोंगटे खड़े कर दिए। राणा सांगा पर अनर्गल टिप्पणी करने वाले सांसद को बद्तमीज करार दिया गया।
अशोक चौबे एडवोकेट का अवतरण कवि रूप में
कवि सम्मेलन में आगरा के जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) अशोक चौबे एडवोकेट का अवतरण एक कवि के रूप में हुआ। उन्होंने माइक पकड़ा और सामाजिक सरोकारों को सार्थक करती कविताएं सुनाईं। मां की महिमा बताई। बीच में कुछ भूले तो बड़ी होशियारी से दोष सामने बैठी पत्नी रंजना चौबे के मत्थे मढ़ दिया। इस बात ने सबको गुदगुदाया।
सचिन दीक्षित का नाम सचिन सारंग
श्री मनःकामेश्वर मंदिर के महंतश्री योगेश पुरी महाराज ने सारंग का अर्थ बताया। उन्होंने सारंग फाउंडेशन के लोगो की व्याख्या की, नारायण का धनुष है सारंग और कलम तीर के रूप में है। सनातन की रक्षा के लिए सारंग नहीं उठाया तो क्या हश्र होगा? उन्होंने सारंग फाउंडेशन के संस्थापक और कवि सम्मेलन के आयोजक सचिन दीक्षित का नामकरण सचिन सारंग कर दिया। कहा कि जीवन में सभी कामनाओं का अंत ही वसंत है।
हिंदू सम्मेलनों में भीड़ कम होने पर चिंता
उन्होँने कहा, जय श्रीराम नारे से मंदिर बन गया। अब नारा बदलो- जय श्री राधे। यह भी कहा कि अभी भी हिंदू जगा नहीं है और जगना नहीं चाहता। हिंदू सम्मेलनों में भीड़ बहुत कम हो रही है। योगी मोदी हमारे पास हैं, ये सौभाग्य है। देश को बदलना है तो खुद को बदलना होगा।
योगेश पुरी महाराज ने कविता सुनाई
बदलते हुए दौर में मैने सबको बदलते देखा है
इंसानों की क्या कहें फरिश्तों को बदलते देखा है

महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाहा का काव्यमय भाषण
मुख्य अतिथि महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाहा ने काव्यमय भाषण देकर सबको प्रभावित कर दिया। उनकी हर पंक्ति पर कविगण भी वाह-वाह करते रहे। हम महापौर के भाषण के कुछ अंश यहां दे रहे हैं-
यह मंच केवल माइक और माला का नहीं है, यह मंच विचारों की ज्वाला है, यह मंच कविता का रणक्षेत्र है— जहाँ शब्द तलवार बनते हैं और भावनाएँ क्रांति करती हैं!
आज जब दुनिया शोर सुनती है, तब कवि सच बोलने का साहस करता है। आज जब भीड़ बहती है, तब कवि दिशा दिखाने का जोखिम उठाता है। कवि सत्ता से नहीं डरता, कवि समय से लड़ता है!
सारंग फाउंडेशन— मैं पूरे विश्वास से कहती हूँ— आप कोई संस्था नहीं, आप संस्कृति का आंदोलन हैं! आपने यह साबित कर दिया है कि साहित्य किताबों में नहीं मरता, वह मंच पर जीवित रहता है, वह कवि के कंठ में धड़कता है!
आज यहाँ बैठे कविगण, आप तुक नहीं मिलाते— आप समाज की नब्ज़ पकड़ते हैं। आप मनोरंजन नहीं करते— आप चेतना जगाते हैं! जिस देश में कवि चुप हो जाए, समझ लीजिए वहाँ लोकतंत्र बीमार है! आज जिनका यहाँ सम्मान हो रहा है, वह केवल व्यक्ति नहीं— वह विचार हैं, मूल्य हैं, भविष्य हैं!
आगरा की महापौर होने के नाते नहीं, एक भारत माता की संतान होने के नाते मैं गर्व से कहती हूँ— जब तक ऐसे कवि, और ऐसे मंच जीवित हैं, भारत को कोई झुका नहीं सकता! सारंग फाउंडेशन ने आज यह संदेश दे दिया है— कि साहित्य शोभा की चीज़ नहीं, साहित्य शौर्य है! मैं चाहती हूँ कि यह मंच और ऊँचा उठे, यह आवाज़ और तेज़ हो, यह मशाल हर गली, हर पीढ़ी तक पहुँचे! और अंत में मैं बस इतना कहूँगी— शब्द अगर सच बोलें, तो इतिहास बदल देते हैं! कवि अगर जाग जाए, तो समाज सो नहीं सकता!

इन्होंने किया आगाज
मुख्य अतिथि महापौर श्रीमती हेमलता दिवाकर, समारोह अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि सोम ठाकुर, संस्कार भारती के केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य बाँकेलाल गौड़, दीनदयाल धाम के निदेशक सोनपाल जी, सारंग फाउंडेशन के संरक्षक शिवराज शर्मा शास्त्री, तपन ग्रुप के चेयरमैन समाजसेवी सुरेश चंद्र गर्ग, सरस्वती विद्या मंदिर दीनदयाल धाम के प्रबंधक नरेंद्र पाठक और सारंग फाउंडेशन के अध्यक्ष ओज के सशक्त कवि सचिन दीक्षित ने माँ शारदे की छवि के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके समारोह का शुभारंभ किया। विशिष्ट अतिथि श्री मनकामेश्वर मंदिर के महंत योगेश पुरी विलंब से आए।
इनका हुआ सम्मान
समारोह में मंच पर मौजूद अतिथियों ने शायर दीपांशु शम्स को सारंग युवा सम्मान-2026 के साथ-साथ सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा, रामेंद्र शर्मा रवि, संजय गुप्त, राकेश निर्मल, नूतन अग्रवाल, अलका अग्रवाल, बैंक अधिकारी और साहित्यवेत्ता सागर गुजराती, दीक्षा रिसाल, हरेंद्र शर्मा, मुकुल, रंजन मिश्र और प्रिया शुक्ला सहित 12 कवि- साहित्यकारों को सारंग सम्मान प्रदान किया। संचालन कवि पदम गौतम ने किया।
उल्लेखीय उपस्थिति
जितेंद्र फौजदार, ब्रजकिशोर, पूर्व पार्षद अमित ग्वाला, पूर्व विधायक महेश गोयल, पार्षद गौरव शर्मा और प्रतिभा जिंदल सहित तमाम महनीय लोग इस दौरान मौजूद रहे।

कवि सम्मेलन
इससे पूर्व सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने इन पंक्तियों से माँ शारदे की वंदना कर कवि सम्मेलन का आगाज किया- “कमलासिनी सुनो यह मनभावना हमारी, स्वीकार आज कर लो नीराजना हमारी..”
कार्यक्रम संयोजक ओज के सशक्त कवि सचिन दीक्षित की इन पंक्तियों ने श्रोताओं में जोश भर दिया-
” कैसे लिख दूँ आज जवानी अल्हड़ मस्ती रातों को।
सत्ताओं की चरण वंदना, मीठी-मीठी बातों को।
मेरी कविता चीख रही है बस इतनी मजबूरी है।
भारत माता घायल है, पहले उपचार जरूरी है.. ”

सारंग युवा सम्मान से सम्मानित शायर दीपांशु शम्स के इस शेर पर लोग देर तक वाह वाह करते रहे –
” हमेशा झुकने से कद ओहदे का और बढ़ता है
बड़ों के पाँव छूने से कभी इज्जत नहीं जाती.. “
सुप्रसिद्ध हास्य कवि पवन आगरी के इस व्यंग्य को सबकी सराहना मिली-
“भैया! यह स्वतंत्र भारत है। यहाँ खाने की सबमें आदत है..”

मंच पर पहली बार काव्य पाठ करने वाले एडवोकेट अशोक चौबे ने सबकी चेतना को झंकृत कर दिया-
” देवी हैं, देवी हैं, नारियाँ.. खिलौना नहीं.. “
मंच संचालन कर रहे प्रतिभाशाली कवि पदम गौतम की इन पंक्तियों ने सबका दिल छू लिया-
“प्रेम का किरदार बौना हो नहीं सकता।
प्रीत सा बहुमूल्य सोना हो नहीं सकता।
कीमती से कीमती बिस्तर पे सो लेना।
माँ के आँचल सा बिछौना हो नहीं सकता..”
सुप्रसिद्ध कवि शशांक प्रभाकर की इन पंक्तियों को भी तालियाँ मिलीं-
“बीते कल की थी जो सूरत, नकार डाली है।
कत्ल खुद हाथों से करके बहार डाली है।
खुशबुओं के लिए मैंने सुना है राजा ने,
कुछ गुलाबों की भी गर्दन उतार डाली है.. “
एटा से आए कवि आर्य राजेश यादव ने इन पंक्तियों से समाँ बाँध दिया-
” राम जी का घर तो बन गया अवध में,
श्याम जी के घर की हो रही तैयारी है।
हर हर महादेव काशी में गूँज रहा,
अब तो हमारे ब्रज धाम की बारी है.. “
गीत ऋषि सोम ठाकुर ने कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सबको आशीर्वाद दिया।

संपादकीय: जब साहित्य आयोजन नहीं, आंदोलन बन जाए
आगरा की साहित्यिक धरती ने 23 जनवरी को केवल एक और कवि सम्मेलन नहीं देखा—उसने संस्कृति का पुनर्जागरण महसूस किया। सारंग फाउंडेशन का शुभारंभ एक संस्था की शुरुआत नहीं, बल्कि उस विचार का उद्घोष था जिसमें कविता केवल सौंदर्य नहीं, साहस है; शब्द केवल मनोरंजन नहीं, प्रतिरोध हैं।
इस ऐतिहासिक क्षण के केंद्र में रहे सचिन दीक्षित—जिन्होंने सिद्ध कर दिया कि आयोजक होना प्रबंधन नहीं, तपस्या है। जिस तरह उन्होंने साहित्य, सनातन और राष्ट्रभाव को एक सूत्र में पिरोया, वह उन्हें साधारण आयोजक से ऊपर उठाकर संस्कृति-योद्धा बनाता है। राणा सांगा पर उनकी कविता केवल पंक्तियाँ नहीं थीं, वह इतिहास के साथ खड़े होने का साहस था।
यही कारण है कि श्री मनःकामेश्वर मंदिर के महंत योगेश पुरी महाराज ने उन्हें “सचिन सारंग” नाम देकर एक प्रतीक गढ़ दिया—कलम को तीर और विचार को धनुष बना दिया। यह नामकरण किसी व्यक्ति का नहीं, एक भूमिका का अभिषेक था।
अशोक चौबे एडवोकेट का मंच पर कवि के रूप में अवतरण इस आयोजन की आत्मा को और गहरा करता है। न्यायपालिका से कविता तक का उनका यह सफर बताता है कि संवेदनशीलता किसी पेशे की बपौती नहीं। नारी सम्मान, माँ की महिमा और सामाजिक सरोकारों को जिस सहजता और विनोद के साथ उन्होंने प्रस्तुत किया, वह साबित करता है कि जब विचार सच्चे हों, तो मंच अपने आप श्रोता बन जाता है।
और फिर आईं महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाहा—जिन्होंने मुख्य अतिथि की औपचारिकता को तोड़कर मंच को वैचारिक रणक्षेत्र में बदल दिया। उनका भाषण भाषण नहीं था, वह कविता का घोषणापत्र था। “साहित्य शौर्य है”—यह वाक्य नहीं, आने वाले समय की परिभाषा है।
उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता जब संवेदना के साथ खड़ी होती है, तब संस्कृति सुरक्षित रहती है। एक महापौर के रूप में नहीं, बल्कि भारत माता की संतान के रूप में उनकी उपस्थिति ने आयोजन को नैतिक बल दिया।
सारंग फाउंडेशन ने अपने पहले ही आयोजन में यह साबित कर दिया कि सम्मान केवल प्रशस्ति-पत्र नहीं, विचारों की मान्यता है।
शायर दीपांशु शम्स को सारंग युवा सम्मान-2026 और अन्य 12 कवि-साहित्यकारों का सम्मान दरअसल उस भविष्य का स्वागत है, जिसमें कविता डरती नहीं, बोलती है। मंच पर एक से बढ़कर एक स्वर—देशभक्ति, व्यंग्य, करुणा, प्रेम और चेतना—सबने मिलकर यह कहा कि जिस समाज में कवि जागता है, वहाँ पतन नहीं होता।
यह आयोजन याद दिलाता है कि आज जब भीड़ शोर करती है, तब कवि सच बोलता है। और जब सच को मंच मिल जाए, तो इतिहास दिशा बदलता है। सारंग फाउंडेशन ने यह संदेश दे दिया है कि साहित्य शोभा की वस्तु नहीं, संस्कृति की रीढ़ है। यह केवल आगाज है। और अगर आगाज इतना प्रखर हो, तो तय है—यात्रा ऐतिहासिक होगी।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
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