आगरा: हमारे समाज में शादियों का भव्य तमाशा जितना बड़ा होता जा रहा है, उस तमाशे के पीछे बेटियों की जान उतनी ही सस्ती होती जा रही है। आगरा कमिश्नरेट के थाना एकता क्षेत्र के ग्राम बरौली अहीर से एक ऐसी घटना सामने आई है जो यह बताती है की दहेज का दानव अब छुपकर वार नही करता, बल्कि हत्या करने के बाद बाकायदा फोन करके अपनी उपलब्धि की सूचना भी देता है। महज बीस महीने पहले जिस बेटी की शादी में पिता ने पच्चीस लाख रुपये खर्च किए थे, उसी बेटी को एक ब्रेजा कार की खातिर ससुराल वालों ने कमरे में बंद करके पीट-पीटकर मार डाला। सबसे भयावह और रूह कंपा देने वाली बात यह है कि अपनी मौत से कुछ मिनट पहले बेटी अपने भाई को फोन करके जिंदगी की भीख मांगती रही और कुछ ही देर बाद उसके पति ने खुद फोन करके मायके वालों को इत्तिला दी कि हमने पूनम को मार दिया है।
आगरा के थाना मलपुरा क्षेत्र के ग्राम बमरौली अहीर के रहने वाले कप्तान सिंह ने अपनी बेटी पूनम की शादी 6 मार्च 2025 को बड़ी धूमधाम और हिंदू रीति-रिवाज के साथ ग्राम बरौली अहीर निवासी जीतू पुत्र स्वर्गीय रामवीर सिंह के साथ की थी। पिता ने अपनी हैसियत से बढ़कर शादी में कुल 25 लाख रुपये खर्च किए थे कि बेटी अपने घर में खुश रहेगी। लेकिन बरौली अहीर के उस मकान में रिश्तों की जगह लालच ने ले रखी थी। शादी के बाद से ही पति जीतू, जेठ बबलू, दूसरा जेठ करन उर्फ करुआ पुत्रगण स्वर्गीय रामवीर सिंह, करुआ की पत्नी वर्षा और बबलू की पत्नी (नाम अज्ञात) इस पच्चीस लाख के दहेज से संतुष्ट नही थे। ससुराल के इन पांचों लोगों की आंखों में चार पहियों वाली एक ब्रेजा कार तैर रही थी आरोप है कि इसी अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर पूनम को लगातार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा, उसके साथ मारपीट की जाती रही।
शुक्रवार 6 तारीख की सुबह इस यातना की आखिरी सुबह साबित हुई। पूनम ने सुबह करीब 8 बजकर 45 मिनट पर और फिर 9 बजकर 57 मिनट पर अपने छोटे भाई दुर्गेश को फोन किया। फोन पर पूनम की घबराई हुई आवाज थी, उसने अपने भाई से कहा की मेरे ससुराल वालों को कार आज ही लेकर दे दो नहीं तो ये लोग आज ही मुझे जान से मार देंगे। पूनम ने फोन पर अपनी बेबसी बयां करते हुए बताया कि ये सभी लोग मुझे कमरे में बंद करके मारपीट कर रहे है,
मायके वाले कुछ समझ पाते या वहां पहुंच पाते, उससे पहले ही सुबह 10 बजकर 27 मिनट पर पति जीतू का फोन आता है। जीतू बिना किसी खौफ के फोन पर कहता है कि हमने पूनम को मार दिया है। जब बदहवास पिता कप्तान सिंह और परिजन भागते हुए ग्राम बरौली अहीर पहुंचे तो ससुराल के मकान पर सन्नाटा पसरा था। हत्यारोपी पति, दोनों जेठ और दोनों जिठानियां घर छोड़कर फरार हो चुके थे। पता चला की पड़ोसी पूनम को जी.आर. हॉस्पिटल लेकर गए थे और अब उनकी बेटी की लाश मोर्चरी में ठंडी पड़ी है। अस्पताल और पोस्टमार्टम हाउस के बाहर खड़े परिजनों की आंखों में अब सिर्फ आंसू और इंसाफ की गुहार बाकी है।
कप्तान सिंह की लिखित तहरीर पर थाना एकता में FIR दर्ज की गई है। इस मुकदमे में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की धारा 85 व 80(2) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धारा 3 व 4 लगाई गई हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच एसीपी ताज सुरक्षा आगरा को सौंपी गई है।
इस पूरी घटना का विश्लेषण करें तो यह सिर्फ एक परिवार का अपराध नही है, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे के सड़ चुके हिस्से का पोस्टमार्टम है। जिस घर में सुबह पौने नौ बजे से सावा दस बजे के बीच एक विवाहिता को कमरे में बंद करके पीट-पीटकर मार डाला जाता है। पड़ोसी तब सामने आते हैं जब उसे अस्पताल ले जाना होता है, लेकिन जब वह चीख रही थी तब किसी दरवाजे की कुंडी क्यों नही खुली। पच्चीस लाख रुपये खर्च करने के बाद भी एक पिता अपनी बेटी के लिए सम्मान और सुरक्षा नही खरीद सका।
ब्रेजा कार के शोरूम से मोर्चरी तक जाता हमारे समाज का रास्ता
यह घटना हम सबके सामने कई तीखे और असहज करने वाले सवाल खड़े करती है। हमने आईपीसी को बदलकर भारतीय न्याय संहिता तो बना लिया, लेकिन क्या कानून का नाम बदल देने से उस मानसिकता में एक इंच भी बदलाव आया जो बहू को इंसान नही बल्कि एटीएम मशीन और कार की चाबी समझती है? जब जीतू ने सुबह 10 बजकर 27 मिनट पर फोन करके कहा कि हमने पूनम को मार दिया है, तो उसकी आवाज में यह आत्मविश्वास कहां से आया था? क्या यह आत्मविश्वास हमारी उस सुस्त न्यायिक प्रक्रिया की देन है जहां दहेज हत्या के मुकदमों में सालों-साल तारीखें पड़ती रहती हैं?
सवाल उस पितृसत्तात्मक समाज की महिलाओं से भी है। अक्सर कहा जाता है कि औरत ही औरत का दर्द समझती है, लेकिन बरौली अहीर के उस कमरे में जब वर्षा और बबलू की पत्नी ने पूनम के दोनों हाथ पकड़े थे, तब उनके भीतर की संवेदना किस शोरूम में गिरवी रखी हुई थी? क्या उन्हें भी उस ब्रेजा कार में बैठकर घूमने का इतना ही शौक था कि किसी की बेटी की सांसें घोंटने में वे बराबर की हिस्सेदार बन गईं? और सबसे बड़ा सवाल उन माता-पिताओं से भी है जो समाज में नाक ऊंची रखने के लिए शादी में पच्चीस लाख रुपये तो फूंक देते हैं, मगर जब बेटी पिटती है तो उसे लोकलाज के नाम पर उसी नर्क में समझौता करके रहने की नसीहत देते रहते हैं।
पूनम की लाश अब मोर्चरी में है और आरोपी ससुराल वाले फरार हैं। पुलिस अपनी तफ्तीश करेगी, एसीपी ताज सुरक्षा बयान दर्ज करेंगे, कॉल डिटेल निकाली जाएंगी और शायद कुछ दिनों में गिरफ्तारियां भी हो जाएं। लेकिन जब तक शादियों के मंडप में रिश्तों से ज्यादा रुपयों की गड्डियों और गाड़ियों के मॉडल का मोलभाव होता रहेगा, तब तक किसी न किसी दुर्गेश के फोन पर किसी पूनम की आखिरी चीख गूंजती रहेगी। कानून की किताब में धाराएं बदल गई हैं, मगर मोर्चरी के बाहर खड़े एक पिता के आंसुओं का रंग आज भी वही है जो दशकों पहले था।
रिपोर्टर- मो0 शाहिद
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