आठ किलो देसी घी और सवा सौ रुपये की लूट के मामले में दो आरोपी 41 साल बाद बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट कोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शिनाख्त परेड में हुई लंबी देरी की ठोस वजह न बता पाना अभियोजन पक्ष की एक बड़ी विफलता है और आरोपी इससे उत्पन्न होने वाले संदेह का लाभ पाने का पूरा अधिकारी होता है। न्यायमूर्ति संतोष राय की अदालत ने इसी टिप्पणी के साथ बदायूं में 41 साल पहले आठ किलो देसी घी और सवा सौ रुपये की लूट के मामले में सजा काट रहे कन्हई और कल्लू को पूरी तरह बेगुनाह मानते हुए बरी कर दिया है।

​वहीं, इस मामले के सह-आरोपी हरपाल और दलचंद की अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो जाने के कारण उनकी अपील पहले ही उपशमित (abated) हो चुकी है। बदायूं की विशेष अदालत ने 15 मई 1987 को इन सभी को पांच-पाँच साल की कैद की सजा सुनाई थी।

क्या था पूरा मामला?

मामला बदायूं जिले के बिसौली थाना क्षेत्र का है। 21 फरवरी 1985 को राधेश्याम शर्मा ने अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप लगाया कि वह साइकिल से बिसाउली से अपने गांव पालिया जा रहे थे। कोट और बिसाउली के बीच सड़क किनारे चार बदमाशों ने उन्हें घेर लिया।

उन्होंने चाकू उनकी छाती पर रखकर उनसे चार किलो देसी घी के दो डिब्बे और 126.50 रुपये और कुछ किराने का सामान लूट लिया। मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जेल भेजने के 42 दिन बाद शिनाख्त परेड कराई।

इसके बाद कन्हई, कल्लू, हरपाल और दलचंद के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया। 1987 में ट्रायल कोर्ट ने चारों आरोपियों को दोषी पाते हुए सजा सुना दी। इसके खिलाफ चारों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। कोर्ट ने पाया कि आरोपियों की शिनाख्त परेड जेल भेजे जाने के लगभग 42 दिन बाद और घटना के ढाई महीने बाद कराई गई थी।

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शिनाख्त परेड में हुई लंबी देरी की ठोस वजह नहीं बता सकना अभियोजन की बड़ी विफलता है। आरोपी इससे उपजे संदेह का लाभ पाने का अधिकारी होता है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संतोष राय की अदालत ने बदायूं में 41 साल पहले आठ किलो देसी घी और सवा सौ रुपये की लूट में सजा पाए कन्हई और कल्लू को बेगुनाह बताते हुए बरी कर दिया।

Dr. Bhanu Pratap Singh