आगरा के महाराजा सूरजमल इंटर कॉलेज जाट हाउस की सच्चाई जानकार हैरान रह जाएंगे, आंख बंद किए बैठे हैं जाट नेता

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आगरा का सबसे बड़ा शैक्षिक विरोधाभास: 17 शिक्षक-कर्मचारी, शून्य छात्र; हर महीने लाखों का वेतन, फिर भी बंद पड़ी पढ़ाई!

महाराजा सूरजमल इंटर कॉलेज की बदहाली ने खड़े किए गंभीर सवाल, शिक्षा व्यवस्था, प्रबंध तंत्र और विभागीय निगरानी पर उठे प्रश्न
आगरा का चौंकाने वाला सच

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आगरा। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालयों की दुर्दशा का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिले। शहर के प्रतिष्ठित महाराजा सूरजमल इंटर कॉलेज, राजा मंडी (जाट हाउस) की स्थिति आज ऐसी हो चुकी है कि यहां शिक्षक और कर्मचारी तो मौजूद हैं, लेकिन पढ़ने के लिए एक भी छात्र नहीं है। इसके बावजूद शिक्षकों एवं कर्मचारियों का वेतन नियमित रूप से सरकारी खजाने से जारी हो रहा है। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि सरकारी धन के उपयोग और विभागीय जवाबदेही पर भी गंभीर बहस की मांग करती है।
17 कर्मचारी, लेकिन एक भी विद्यार्थी नहीं
महाराजा सूरजमल इंटर कॉलेज एक अशासकीय सहायता प्राप्त विद्यालय है। हाईस्कूल स्तर तक शिक्षकों का वेतन सरकार द्वारा दिया जाता है, जबकि इंटरमीडिएट (कक्षा 11 एवं 12) वित्तविहीन मान्यता के अंतर्गत संचालित है। इसी परिसर में एक प्राथमिक विद्यालय भी संचालित है।
जानकारी के अनुसार इंटर कॉलेज में सात शिक्षक, प्राथमिक विद्यालय में पांच शिक्षक तथा पांच चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यरत हैं। कुल मिलाकर 17 कर्मचारी हैं, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या शून्य बताई जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब विद्यालय में छात्र ही नहीं हैं तो शिक्षण कार्य किसका हो रहा है और सरकारी धन किस उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है?
प्राथमिक विद्यालय की हाजिरी पर भी उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों की वर्षों से नियमित उपस्थिति तक दर्ज नहीं हो रही है। यदि यह तथ्य सही है तो यह भी जांच का विषय है कि बिना नियमित उपस्थिति के वेतन भुगतान किस आधार पर किया जा रहा है। इस पूरे मामले में विभागीय निगरानी और वित्तीय अनुशासन दोनों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
कभी एक हजार छात्रों से गुलजार था परिसर
यह वही संस्थान है जिसके प्रधानाचार्य रहे पूर्व विधायक विजय सिंह राणा के कार्यकाल में लगभग एक हजार छात्र अध्ययन करते थे। इसी विद्यालय में उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री चौधरी उदयभान सिंह तथा राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश के संस्थापक सदस्य डॉ. देवी सिंह नरवर शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
समय के साथ छात्र संख्या लगातार घटती गई और आज स्थिति यह है कि विद्यालय पूरी तरह छात्रविहीन हो चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रबंध समिति विद्यालय को पुनर्जीवित करने के बजाय निष्क्रिय बनी हुई है। कुछ लोगों को आशंका है कि भविष्य में इस बहुमूल्य भूमि का व्यावसायिक उपयोग करने की मंशा से विद्यालय को धीरे-धीरे समाप्त होने दिया जा रहा है। हालांकि इस संबंध में किसी सक्षम प्राधिकारी की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
शिक्षिका के समायोजन पर भी विवाद
जानकारी के अनुसार शांति निकेतन इंटर कॉलेज, महरौली (ललितपुर) से गीता हीराचंदानी का इस विद्यालय में समायोजन किया गया था। इस समायोजन को लेकर शिकायतें हुईं और इसे नियमों के विपरीत बताते हुए वापस भेजे जाने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई है।
प्रधानाचार्य बोलीं—बिजली और पानी तक नहीं
विद्यालय की प्रधानाचार्या सीमा सिंह ने बताया कि कई वर्षों से विद्यालय में बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पिछले सत्र में प्रधानाचार्य सहित शिक्षकों की ड्यूटी बीएलओ और एसएआर जैसे कार्यों में लगी रही, जिससे पढ़ाई प्रभावित हुई।
जब उनसे पूछा गया कि विद्यालय में छात्र ही नहीं हैं तो पढ़ाई किसकी प्रभावित हुई, तो बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी।
पूर्व मंत्री उदयभान सिंह ने जताया अफसोस
पूर्व मंत्री चौधरी उदयभान सिंह ने कहा कि उन्हें इस बात का गहरा दुख है कि सरकार में रहते हुए भी वह जाट हाउस विद्यालय की अपेक्षित मदद नहीं कर सके। उनका कहना था कि यदि समाज उन्हें अवसर दे तो वे आज भी इस विद्यालय के पुनर्जीवन के लिए कार्य करना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि विद्यालय लंबे समय तक पूर्व विधायक विजय सिंह राणा के प्रभाव में रहा और उनके निधन के बाद भी प्रबंधन संबंधी विवाद बने रहे। ऐसे माहौल में विद्यालय का विकास प्रभावित हुआ।
अन्य विद्यालयों की दुर्दशा पर भी चिंता
चौधरी उदयभान सिंह ने कहा कि दूदाधारी इंटर कॉलेज, जनता इंटर कॉलेज, दुलारा इंटर कॉलेज, विक्टोरिया इंटर कॉलेज, नेशनल इंटर कॉलेज, बाबूलाल इंटर कॉलेज तथा हुब्बलाल इंटर कॉलेज जैसे अनेक संस्थान भी समय के साथ अपनी पहचान खोते चले गए। उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह कॉलेज, अकोला से भी उनका जुड़ाव रहा, लेकिन उसकी स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। उन्होंने कहा कि अब वे अपने जीवन का शेष समय शिक्षा के उत्थान के लिए समर्पित करना चाहते हैं।
डॉ. देवी सिंह नरवर की भावुक अपील
महाराजा सूरजमल इंटर कॉलेज के पूर्व शिक्षक डॉ. देवी सिंह नरवर ने कहा कि जिस विद्यालय में उन्होंने वर्षों तक अध्यापन किया, उसकी वर्तमान स्थिति देखकर मन अत्यंत व्यथित होता है। उन्होंने कहा कि जाट हाउस कभी समाज की शान हुआ करता था, लेकिन आज उसकी दुर्दशा दुखद है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग विद्यालय को शिक्षा संस्थान के रूप में नहीं, बल्कि व्यावसायिक परिसर के रूप में देखना चाहते हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते समाज और प्रशासन नहीं जागा तो शिक्षा की यह ऐतिहासिक धरोहर हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जाट हाउस का संबंध पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और किसान नेता सर छोटूराम जैसी विभूतियों की विरासत से भी जुड़ा रहा है।
संपादकीय
विद्यालय नहीं बचेंगे तो समाज का भविष्य कौन बचाएगा?
महाराजा सूरजमल इंटर कॉलेज की कहानी केवल एक विद्यालय की कहानी नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के अनेक सहायता प्राप्त विद्यालयों की वास्तविकता का आईना है। जब प्रबंध समितियां आपसी विवादों में उलझ जाती हैं, विभाग केवल फाइलों तक सीमित रह जाता है और समाज अपने विद्यालयों से दूरी बना लेता है, तब परिणाम यही होता है—भवन बच जाते हैं, शिक्षक रह जाते हैं, वेतन चलता रहता है, लेकिन विद्यार्थी गायब हो जाते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी विद्यालय में वर्षों से छात्र नहीं हैं तो उसकी नियमित समीक्षा क्यों नहीं हुई? छात्र संख्या बढ़ाने के लिए विशेष अभियान क्यों नहीं चलाया गया? जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई? सरकारी धन का उद्देश्य शिक्षा देना है, न कि केवल वेतन वितरण करना।
आगरा जैसे ऐतिहासिक शहर में एक के बाद एक सहायता प्राप्त विद्यालयों का कमजोर होना चिंता का विषय है। दूदाधारी इंटर कॉलेज, जनता इंटर कॉलेज, दुलारा इंटर कॉलेज, विक्टोरिया इंटर कॉलेज, नेशनल इंटर कॉलेज, बाबूलाल इंटर कॉलेज, हुब्बलाल इंटर कॉलेज और अन्य संस्थानों की स्थिति भी समय-समय पर चर्चा का विषय रही है। यदि यही क्रम चलता रहा तो आने वाले वर्षों में अनेक ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान केवल स्मृतियों में रह जाएंगे।
समय की मांग है कि सरकार, शिक्षा विभाग, प्रबंध समितियां, पूर्व छात्र, समाज और जनप्रतिनिधि मिलकर इन विद्यालयों के पुनर्जीवन का रोडमैप तैयार करें। प्रत्येक छात्रविहीन विद्यालय की उच्चस्तरीय जांच हो, वित्तीय एवं प्रशासनिक ऑडिट कराया जाए, जवाबदेही तय हो और प्रवेश अभियान चलाकर विद्यालयों को फिर से विद्यार्थियों से आबाद किया जाए।
विद्यालय किसी भवन का नाम नहीं होता, वह समाज की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य होता है। यदि शिक्षा के मंदिर उजड़ गए तो सबसे बड़ी हानि किसी व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज की होगी।

डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक

Dr. Bhanu Pratap Singh