सुप्रीम कोर्ट ने एक युगांतरकारी निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षित, सुव्यवस्थित और बाधा रहित फुटपाथों पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और 21 के दायरे में आते हुए, न्यायालय ने यह स्थापित किया है कि सड़कों पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, बल्कि पैदल चलने वालों का है। आगरा जैसे ऐतिहासिक और पर्यटन नगरी के लिए, जहां पैदल चलना अब ‘साहसिक एडवेंचर’ बन चुका है, यह निर्णय एक बड़ी संवैधानिक ताकत बनकर उभरा है।
आगरा: जहाँ फुटपाथ बने ‘अतिक्रमण’ के शिकार
प्रेम की नगरी आगरा दशकों से वाहनों की बढ़ती संख्या के हिसाब से तो विस्तृत हुई, लेकिन यहाँ के पैदल यात्रियों की अनदेखी ही की गई। चाहे एम.जी. रोड हो, फतेहाबाद रोड हो या यमुना किनारा मार्ग—हर जगह फुटपाथ या तो बने ही नहीं या फिर अवैध पार्किंग, दुकानों के अतिक्रमण, बिजली के खंभों और खुले मैनहोल की भेंट चढ़ गए हैं। इसका खामियाजा शहर के बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को अपनी जान जोखिम में डालकर भुगतना पड़ रहा है। यहाँ तक कि लाखों की संख्या में आने वाले पर्यटक भी खुद को सड़कों पर असुरक्षित महसूस करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि पैदल चलने के अधिकार का उल्लंघन होने पर नागरिक मोटर वाहन अधिनियम से स्वतंत्र, मुआवजे और कानूनी राहत पाने के हकदार हैं। यह फैसला पिछले वर्ष (मई 2025) न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ द्वारा दिए गए उस आदेश की अगली कड़ी है, जिसमें केंद्र को राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनाने और फुटपाथ के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा गया था। न्यायालय ने 1985 के ‘ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन’ मामले का हवाला देकर फुटपाथ तक पहुँच को गरिमा से जीने के अधिकार का अभिन्न अंग माना है।
प्रशासन की बढ़ती कानूनी जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी हो गई है। अब हर नई सड़क परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, साइकिल ट्रैक, सुगम क्रॉसिंग और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएं अनिवार्य होंगी। पुराने मार्गों का पुनर्विकास करना और अतिक्रमण के खिलाफ निरंतर सख्त कार्रवाई करना अब प्रशासन की संवैधानिक बाध्यता है।
नागरिकों की उम्मीद और संघर्ष
आगरा के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से इस संकट को उठाते रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उनकी मांगों को ‘संवैधानिक ताकत’ प्रदान कर दी है। अब असली चुनौती इस आदेश को धरातल पर उतारने की है। स्थानीय नागरिक संगठनों, मीडिया और निकायों का यह दायित्व है कि वे प्राधिकरणों से स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही की मांग करें, ताकि यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ फाइलों में दफन होकर न रह जाए। समय आ गया है कि आगरा ‘मशीनों की गति’ से आगे बढ़कर ‘इंसानों की सुरक्षा’ को प्राथमिकता दे।
-बृज खंडेलवाल
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