नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को निर्वाचन आयोग के मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि यह प्रक्रिया ”स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाती है।” उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण करने का अधिकार है।
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्यवस्था दी कि यह नहीं कहा जा सकता कि निर्वाचन आयोग ने एसआईआर का प्रयोग करके अपने वैधानिक अधिकारों की सीमा से बाहर जाकर काम किया है।
अदालत का रुख: प्रशासनिक सुविधा नहीं, संवैधानिक आवश्यकता
पीठ ने कहा, ”हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते कि विवादित प्रक्रिया केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए अपनाई गई थी। इसके विपरीत, हम मानते हैं कि चुनावी एसआईआर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक आवश्यकता को बल देता है।”
एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उससे संबंधित नियमों के तहत निर्वाचन आयोग को इतने व्यापक स्तर पर एसआईआर कराने का अधिकार नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
शीर्ष न्यायालय ने 29 जनवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। इन याचिकाओं में गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की याचिका भी शामिल थी। बिहार में एसआईआर अभियान का पहला चरण चलाया गया था। पिछले वर्ष 12 अगस्त को न्यायालय ने मामले में अंतिम बहस शुरू की थी और तब कहा था कि मतदाता सूची में नाम शामिल करना या हटाना निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
एनआरसी से तुलना पर स्पष्टीकरण
निर्वाचन आयोग ने एसआईआर अभियान के तहत प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख लोगों के नाम सार्वजनिक किए थे। एसआईआर अधिसूचना के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें उस समय सूची में शामिल किसी व्यक्ति से अपना पैतृक संबंध साबित करना था।
एसआईआर प्रक्रिया का बचाव करते हुए निर्वाचन आयोग ने कहा था कि आधार और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण ”राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) जैसी प्रक्रिया” है, जिसमें निर्वाचन आयोग नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि यह अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
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