आगरा; पिछले तीन दशकों में, वाइल्डलाइफ एसओएस एक छोटे से जमीनी स्तर के प्रयास से बढ़कर भारत में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी संस्थाओं में से एक बन गया है। क्रूर ‘डांसिंग’ भालू प्रथा को समाप्त करने से लेकर बचाव और पुनर्वास परियोजनाओं तक, संस्था अब पूरे भारत में 17 रेस्क्यू सेंटर संचालित करती है। इनमें आगरा में दुनिया का सबसे बड़ा स्लॉथ भालू बचाव केंद्र और बेंगलुरु, भोपाल और पुरुलिया में स्लॉथ भालुओं के तीन अन्य केंद्र शामिल हैं, एवं मथुरा में भारत का पहला हाथी अस्पताल और हाथी देखभाल केंद्र भी स्थापित किया गया है।
वाइल्डलाइफ एसओएस ने भारत में हाथी कल्याण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई है, देश का पहला हाथी अस्पताल और कई ऐसी सुविधाएं स्थापित की हैं जो बचाए गए हाथियों के लिए चिकित्सा उपचार, पुनर्वास और एनरिच्मेंट प्रदान करती हैं। इसी आधार पर आगे बढ़ते हुए, हाथी सेवा जैसी महत्वपूर्ण पहल, जो भारत का पहला मोबाइल हाथी क्लिनिक है, हाथियों को मौके पर जा कर वहीँ ही पशु चिकित्सा सहायता प्रदान करती है, और बैगिंग एलीफैंट अभियान, जो भारत की सड़कों पर भीख मांगने, सवारी कराने और जुलूस निकालने के लिए शोषित हाथियों को बचाता और उनका पुनर्वास करता है, संस्था के समग्र दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। ये सभी प्रयास मिलकर वाइल्डलाइफ एसओएस के मिशन को साकार करते हैं: शिक्षा, करुणा, जागरूकता और विज्ञान को मिलाकर लोगों और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करती है।
भालू संरक्षण के क्षेत्र में, वाइल्डलाइफ एसओएस पूरे देश में छह बचाव केंद्रों में 150 से अधिक भालुओं (जिनमें स्लॉथ भालू, एशियाई ब्लैक भालू और हिमालयन ब्राउन भालू शामिल हैं) की देखभाल कर रही है। उदाहरण के लिए, आगरा भालू संरक्षण केंद्र में, वाइल्डलाइफ एसओएस बचाए गए स्लॉथ भालुओं को पूर्ण पशु चिकित्सा सहायता के साथ दीर्घकालिक वृद्धावस्था और शिशु देखभाल प्रदान करती है। अपने कार्यक्रमों के माध्यम से, वाइल्डलाइफ एसओएस ने स्लॉथ भालुओं और हिमालयन ब्राउन भालुओं को रेडियो कॉलर कर के उनकी गतिविधियों और व्यवहार का अध्ययन किया है, जिससे संघर्ष कम करने की रणनीतियों को दिशा देने में मदद मिली है।
संरक्षण के संदर्भ में, वाइल्डलाइफ एसओएस पर्यावरण को बचाने की पहलों का नेतृत्व भी करती आई है, जैसे कि रामदुर्गा वैली इकोलॉजिकल रिस्टोरेशन और रीवाइल्ड फॉर वाइल्डलाइफ परियोजनाएं, जो देशी पेड़ों को लगाने और खराब हो चुके परिदृश्यों को सुधारने पर केंद्रित हैं।
तेंदुओं की बात करें तो, महाराष्ट्र में वाइल्डलाइफ एसओएस का मानिकदोह तेंदुआ संरक्षण केंद्र (महाराष्ट्र वन विभाग के सहयोग से संचालित) संघर्ष या अनाथ परिस्थितियों से बचाए गए 50 से अधिक तेंदुओं की दीर्घकालिक देखभाल करता है। वाइल्डलाइफ एसओएस भविष्य में होने वाले संघर्षों को रोकने के लिए वन विभाग के कर्मचारियों और स्थानीय लोगों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और तकनीकी प्रशिक्षण भी आयोजित करता है।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण ने कहा “शुरुआती दौर भले ही छोटा था, लेकिन पिछले 30 वर्षों ने हमें सिखाया है, कि सफलता, संरक्षण के हर पहलू को एकीकृत करने में निहित है l हमारे पुनर्वास परियोजनाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, और जानवरों और मनुष्यों दोनों की समग्र देखभाल सुनिश्चित हुई है। हमें गर्व है कि जमीनी स्तर के प्रयासों के रूप में शुरू हुआ यह सफर अब भविष्य की पहलों के लिए एक आदर्श बन गया है।”
वाइल्डलाइफ एसओएस की सह-संस्थापक और सचिव, गीता शेषमणि ने बताया “इन 30 वर्षों में एक बात स्पष्ट हो गई है: संरक्षण केवल जानवरों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पर निर्भर जीवन को बचाने से भी जुड़ा है। कलंदर समुदाय के लिए हमारे ट्राइबल पुनर्वास कार्यक्रम ने लोगों के जीवन को बदल दिया है। छोटे व्यवसाय, शिक्षा, महिलाओं का सशक्तिकरण और शिकारियों से रक्षकों की ओर बदलाव यह दर्शाता है कि जब संरक्षण को गरिमा से जोड़ा जाता है तो लोगों के जीवन में कितना गहरा परिवर्तन आ सकता है।”
वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स, बैजूराज एम.वी. ने कहा “विभिन्न प्रदेशो के वन विभागों के साथ हमारी साझेदारी हमारी सबसे बड़ी ताकत रही है। इसने हमारी पहुंच को कई गुना बढ़ाया है, हमारे प्रभाव को गहरा किया है जिससे कई बदलाव आए है। साथ मिलकर, हमने भारत भर में सुविधाएं बनाई की हैं, बचाव प्रक्रियाओं में नई नीतियाँ स्थापित की हैं और वन्यजीव कल्याण को मजबूत किया है, जो अकेले संभव नहीं हो सकता था।”
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