एक तरफ वो विशेषाधिकार प्राप्त सत्ता है जो महज आशंकाओं के घेरे में संसद से दूरी बना लेती है, और दूसरी तरफ वो आम नागरिक है जो अपनी रोजी-रोटी के लिए उन सड़कों पर उतरने को मजबूर है जो उसकी ‘कब्र’ तैयार बैठी हैं। दिल्ली के जनकपुरी में 26 वर्षीय कमल ध्यानी की मौत कोई इत्तेफाक नहीं थी; यह हमारे सड़ते हुए सिस्टम द्वारा की गई एक ‘प्रायोजित हत्या’ थी।
अंधेरे में दफन हुआ भविष्य
रोज की तरह दफ्तर से घर लौटते कमल को क्या पता था कि जिस सड़क का हर मोड़ उसकी यादों में बसा है, वहीं मौत उसका इंतजार कर रही है। दिल्ली जल बोर्ड ने सड़क के बीचों-बीच एक गहरी खाई खोद दी, लेकिन वहां न कोई बैरिकेड था, न रिफ्लेक्टर और न ही कोई चेतावनी बोर्ड। कमल उस अंधेरे में गिरा और सिस्टम की उदासीनता के बीच घंटों तड़पकर दम तोड़ दिया।
संवेदनहीनता की इंतहा
त्रासदी सिर्फ गड्ढे में गिरना नहीं थी, त्रासदी वो आठ घंटे थे जब कमल का परिवार एक थाने से दूसरे थाने भटकता रहा और पुलिसिया तंत्र ‘कंधे उचकाकर’ औपचारिकताएं पूरी करता रहा। सुबह जब एक महिला ने उसका शव देखा, तब जाकर कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन जागा। इसके बाद वही पुरानी रस्म निभाई गई जांच का भरोसा, कुछ निलंबन और कुछ लाख का मुआवजा। जैसे चंद नोटों की गड्डियां एक मां की कोख और एक पिता के सहारे को वापस ला सकती हों।
दिल्ली से आगरा तक एक सा मंजर
यह दर्द सिर्फ दिल्ली का नहीं है। ताजनगरी आगरा की सड़कें भी विकास के नाम पर ‘खुदाई की प्रयोगशाला’ बन चुकी हैं। कभी जल निगम तो कभी मेट्रो सड़कें खोदी जाती हैं और महीनों तक उन्हें मौत के खुले जाल की तरह छोड़ दिया जाता है। अभी हाल ही में मेट्रो लाइन से स्लीपर गिरने की घटना ने दिल दहला दिया था, लेकिन जवाबदेही आज भी शून्य है.
कुल मिलाकर सड़कें अब सफर के लिए नहीं, विभागों की मनमर्जी के लिए रह गई हैं। कमल ध्यानी उन हजारों नामों में से एक है जो सरकारी फाइलों में सिर्फ एक ‘संख्या’ बनकर रह जाते हैं। जब तक लापरवाही को अपराध नहीं माना जाएगा और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक न जाने कितने और ‘कमल’ इन अंधेरे गड्ढों में अपनी सांसें खोते रहेंगे।
साभार- विशाल सर
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