नई दिल्ली: भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर राजनीतिक घमासान बढ़ता जा रहा है। विपक्षी दल इस समझौते को किसानों के हितों के खिलाफ बता रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार इसे घरेलू उद्योग, MSMEs और कृषि क्षेत्र के लिए नए मौके पैदा करने वाला कदम मान रही है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने डील पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे किसानों के साथ धोखा बताया। उनका कहना है कि भारतीय बाजार को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोलना उस बड़ी आबादी के हितों पर चोट है, जिसकी आजीविका खेती पर टिकी है। उन्होंने आशंका जताई कि इससे किसानों की आय पर असर पड़ेगा और खाद्यान्न बाजार में बिचौलियों की भूमिका बढ़ सकती है।
अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि ऐसी नीतियां महंगाई को बढ़ावा दे सकती हैं और छोटे किसानों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। उन्होंने भाजपा से साफ जवाब मांगते हुए सवाल उठाया कि आखिर इस तरह के फैसलों के पीछे क्या मजबूरी है।
कांग्रेस ने भी इस समझौते पर चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि कृषि क्षेत्र को विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना आर्थिक ही नहीं, सामरिक दृष्टि से भी गंभीर मामला है। कांग्रेस ने सरकार से डील का पूरा मसौदा सार्वजनिक करने की मांग की है, ताकि उसकी शर्तें स्पष्ट हो सकें।
दूसरी ओर, कुछ निर्यातक संगठनों ने इस समझौते का स्वागत किया है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) का कहना है कि अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करना चावल निर्यातकों के लिए फायदेमंद होगा। इससे भारतीय चावल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बढ़त मिल सकती है, खासकर थाईलैंड और पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले।
कुल मिलाकर, यह ट्रेड डील अब आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक बहस का विषय बनती जा रही है, जहां फायदे और नुकसान को लेकर अलग-अलग दावे सामने हैं।
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