नई दिल्ली। भारत ने चीन के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि इस वर्ष की शुरुआत में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव के दौरान बीजिंग ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुआ सीजफायर पूरी तरह भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय प्रक्रिया का परिणाम था, इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं रही।
मीडिया रिपोर्ट्स में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि नई दिल्ली चीन के इस दावे को “पूरी तरह अस्वीकार” करती है। भारत का दो टूक कहना है कि दुश्मनी समाप्त करने या संघर्ष विराम कराने में किसी बाहरी देश ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। भारत लंबे समय से यह रुख अपनाता आया है कि पाकिस्तान से जुड़े सभी मुद्दे द्विपक्षीय हैं और उनमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की कोई गुंजाइश नहीं है।
सीजफायर सीधी सैन्य बातचीत का नतीजा
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि सीजफायर का फैसला भारतीय और पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत के बाद हुआ था। मंत्रालय के मुताबिक 10 मई 2025 को दोनों पक्षों के बीच हुई फोन कॉल के दौरान संघर्ष विराम पर सहमति बनी थी।
भारत की ओर से यह खंडन चीन के विदेश मंत्री वांग यी के हालिया बयान के बाद सामने आया है। वांग यी ने बीजिंग में ‘अंतरराष्ट्रीय स्थिति और चीन के विदेश संबंध’ विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में दावा किया था कि चीन ने वैश्विक संघर्ष क्षेत्रों में अपनी कूटनीतिक सक्रियता के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम कराने में भूमिका निभाई।
कांग्रेस ने उठाए सवाल
इस मुद्दे पर कांग्रेस ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने 10 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया था।
जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन दावों पर अब तक सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। उन्होंने यह भी कहा कि अब चीन के विदेश मंत्री द्वारा मध्यस्थता का दावा किया जाना और भी चिंताजनक है, क्योंकि चीन खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है।
कांग्रेस के अनुसार, ऐसे बयानों से भारत की कूटनीतिक स्थिति और राष्ट्रीय हितों पर सवाल खड़े होते हैं, इसलिए सरकार को इस पूरे मामले पर संसद और देश के सामने स्पष्ट रुख रखना चाहिए।
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