7वें दिन पर्यूषण पर्व में जिग्नेश भाई की आध्यात्मिक अनुगूंज और दादाबाड़ी में भजन संध्या की मधुर लहरियाँ

RELIGION/ CULTURE

पर्यूषण पर्व की आध्यात्मिक अनुगूंज और भजन संध्या की मधुर लहरियाँ

आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण

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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.

आगरा। जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक श्री संघ द्वारा श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर, रोशन मोहल्ला में पर्यूषण पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस आध्यात्मिक पर्व ने नगर में भक्ति, संयम और तपस्या का वातावरण निर्मित कर दिया है।

तीर्थंकरों के जीवन का आलोक

मंदिर स्थित हीर विजय सूरी उपाश्रय में सातवें दिन आयोजित प्रवचन में जैन विद्वान श्री जिग्नेश भाई ने चौबीसों तीर्थंकरों के जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे इन महापुरुषों ने त्याग, तप और संयम के बल पर आत्मकल्याण के साथ लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के उनके संदेश आज भी समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हुए हैं।

भजन संध्या की गूंज

शाम को जैन दादाबाड़ी परिसर भक्ति और श्रद्धा से गुंजायमान हो उठा। श्री दादा गुरुदेव भक्त मंडल द्वारा श्री कालीकुंड पारसनाथ परमात्मा 24 जिनालय मंदिर दादाबाड़ी में भजन संध्या का आयोजन किया गया। सुप्रसिद्ध भजन गायक कलाकारों ने अपनी मधुर वाणी से ऐसा वातावरण रचा कि श्रद्धालु भावविभोर होकर “परमात्मा की जय-जयकार” में लीन हो गए।

संघ का आगामी कार्यक्रम

श्री संघ के निवर्तमान अध्यक्ष राजकुमार जैन ने जानकारी दी कि आगामी 27 अगस्त को नव संवत्सरी क्षमा याचना पर्व मनाया जाएगा। यह दिन आत्मशुद्धि और परस्पर क्षमायाचना का प्रतीक होगा।

उपस्थित गणमान्यजनों की गरिमा

कार्यक्रम में निम्न गणमान्यजनों की विशेष उपस्थिति रही, जिन्होंने पर्व की गरिमा को और बढ़ाया:

विनय वागचर
दुष्यंत जैन
अशोक कोठारी
रॉबिन जैन
शैलेंद्र (मोंटू) चपलावत
रोहित बोहरा
अंकित पाटनी
दिनेश चौरडिया
प्रकाश वेद
पंकज लोढ़ा
चिराग बरडिया

संपादकीय दृष्टि

पर्यूषण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह आत्मसंयम, आत्मशुद्धि और आत्मसुधार का अद्वितीय पर्व है। इस अवसर पर जब तीर्थंकरों की शिक्षाओं को स्मरण किया जाता है और भजन संध्या में आत्मा संगीत से झूम उठती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार में परिलक्षित होना चाहिए।

आज के युग में जब जीवन भागमभाग और तनाव से भरा है, ऐसे में पर्यूषण का यह संदेश कि “जीवन का सच्चा उत्सव आत्मसंयम और क्षमा में निहित है” हमें आत्ममंथन और आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।

Dr. Bhanu Pratap Singh