डॉ. भानु प्रताप सिंह
अपनी बात तीन बातों के साथ शुरू कर रहा हूँ-
(1)
अकसर लोग कहते हैं- पैसा तो हाथ का मैल है।
जब मैं कहता हूँ कि हाथ का थोड़ा सा मैल मेरी तरफ भी आने दो तो वे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगते हैं।
(2)
गुरु गद्दी पर विराजमान मोटी तोंद वाले संतजन कहते हैं- धन के चक्कर में मत पड़ो।
पता चलता है कि यही गुरु महाराज एक सप्ताह की भागवत कथा के 10 लाख रुपये लेते हैं। खुद धन के चक्कर में और हमें अलग ही उपदेश।
(3)
कुछ लोग कहते हैं- पैसे से बड़ी चीज मन की शांति है। कुछ नहीं है पैसा।
इस तरह की कपोल-कल्पित बातें वही करते हैं जिनके पास अकूत संपत्ति है। इतनी सपंत्ति कि घर का नौकर एक करोड़ रुपये चुरा ले जाए तो भी पता न चले।
पैसा को हम लक्ष्मी, धन, द्रव्य, वित्त, दौलत, संपदा, संपत्ति, विभूति, माया, माल, अर्थ, ज़र, रुपया, रकम भी कहते हैं। संस्कृत की बात करें तो धन को धनम्, द्रव्यम्, वित्तम्, अर्थ:, रा:, रिक्थम्, वशु:, स्वापतेयम्, हिरण्यम्, द्रविणम्, ऋक्थम् कहा जाता है।
इस समय कोरोना काल है। हर दिन बंधु-बांधव मृत्यु के मुख में जा रहे हैं। अधिकांश इलाज के अभाव में जा रहे हैं। जिनके पास पैसा है, वे तो अच्छे अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं, जिससे उनके जीवन पर संकट कम है। जिनके पास पैसा नहीं है, वे सरकारी कोविड वार्ड में पल-पल मृत्यु का ग्रास बन रहे हैं। मतलब यहां भी पैसे की महत्ता है। कोई पैसे वाला स्वर्ग सिधार गया तो उसके बच्चों की देखभाल पैसा कर लेगा। दूसरी ओर किसी घर का धनहीन कमाऊ परिजन मर गया तो उसके परिवार की जिन्दगी नर्क है। कमाऊ परिजन स्वर्ग चला गया यानी साथ में आजीविका का साधन भी गया। किसी का कच्चा परिवार है तो कैसे चलेगा? कोरोना काल में एक संदेश सामाजिक मीडिया पर खूब प्रसारित हुआ- आपके पास पैसा है तो ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, रेमडेसिविर और बिस्तर लेकर दिखाओ। ऐसा संदेश प्रसारित करना वालों को बता दूँ कि किसी पैसे वाले को ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, रेमडेसिविर और बिस्तर की कोई समस्या नहीं आई। जो जुगाड़ वाले हैं, धनहीन हैं, वही भटकते रहे। ऐसे लोग ही संदेश प्रसारित करते रहे। मेरे कई बंधु इसलिए चले गए क्योंकि इलाज के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था। निजी अस्पताल में भर्ती होने के लिए एक लाख रुपया नहीं था।
पैसे से ही रोटी, कपड़ा और मकान आता है। पैसे से ही समाजसेवा की जा सकती है। फटी जेब वाला क्या खाक सेवा करेगा? सुदामा की महत्ता तभी बढ़ी जब पैसे वाले भगवान श्रीकृष्ण ने गले लगाया। आप किसी महफिल में चले जाइए। अगर आप श्रीहीन यानी धनहीन हैं तो लोग उचटती दृष्टि भी नहीं डालते हैं। अगर कोई पैसा वाला आ जाए तो सब उसी के आसपास सिमट जाते हैं। आखिर क्यों?
संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने पैसा सच्ची राह पर चलकर कमाया है। हर पैसे वाला छल-प्रपंच करता है। हां, वह न माने तो अलग बात है। हर पैसे वाला अपनी सफलता की झूठी कहानियां गढ़ता है और अपने चेलों से प्रचारित कराता है। लोग समझते हैं कि बड़ा भला मानुष है। हकीकत यह है कि अगर कोई व्यापारी सही राह पर अग्रसर रहेगा तो बिजली का बीजक भी नहीं भर पाएगा। मुझे भलीभांति याद है कि समाजवादी पार्टी की सरकार में तमाम लोगों ने अनीति के मार्ग पर चलकर खूब पैसा कमाया। यही ‘पैसा कमाऊ लोग’ उसी पैसे के बल पर धुरविरोधी भाजपा सरकार में ‘वरिष्ठ नेता’ हैं। उनकी खूब जय-जयकार होती है। सरकार बनी तो भाजपा कार्यकर्ताओं को लगा कि अब खूब पैसा कमाएंगे। पार्टी ने कार्यकर्ता भाड़ में डाल दिए। अब वे हाय-हाय करते घूम रहे हैं। करते रहो हाय-हाय, जिसे पैसा कमाना है, वह जमकर कमा रहा है।
मेरा तो कहना है कि इतना पैसा तो कमाओ कि परिवार, रिश्तेदारों, मित्रों और समाज के लिए कुछ कर सको। इसके लिए भ्रष्टाचार की सलाह कतई नहीं दूँगा, फिर भी कहूँगा कि पैसा कमाओ। कोरोना काल में मैंने महसूस किया है कि अपने परिजनों को पैसे की जरूरत है, कोरी बातों की नहीं। इलाज पैसे से होता है, प्रार्थना से नहीं। सब्जी पैसे से आती है, दयाभाव से नहीं। धर्मसेवा भी पैसे से होती है। यहां तक कि राम मंदिर भी पैसे ही बन रहा है। जब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर तक बिना पैसे के नहीं बन सकते हैं तो कुछ भी नहीं हो सकता है। यही पैसे की महत्ता है। पैसे की महत्ता को वही कमतर बताते हैं जिनके पास पैसा है।
पैसे की महत्ता उससे पूछो जिनके पास पैसा नहीं है, जो पाई-पाई की तरस रहे हैं, जो अपने परिजनों को इलाज के अभाव में मरते देख रहे हैं, जो अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा नहीं पा रहे हैं, जो सरकारी एम्बुलेंस के इंतजार में घंटों गुजार रहे हैं, जो प्रियजनों का अंतिम संस्कार तक नहीं करा पा रहे हैं, जो अपने स्वाभिमान की ऐसी-तैसी कर मदद की गुहार लगा रहे हैं। इनके लिए तो पैसा ही खुदा है।
अगर आपके पास पैसा नहीं है तो आप ‘दो कौड़ी’ के इंसान हैं। आप चूरन-चटनी हैं। आप खजैला कुत्ता हैं। आप फोकटी हैं। आप सिड़ी हैं। आप नंगे हैं। आप भिखमंगे हैं। आप गधे हैं। आप उल्लू हैं। आप बंदर हैं। आप धरा पर बोझ है। नंगा क्या नहाएगा और क्या निचोड़ेगा?
दुनियाभर को ज्ञान देने वाले अधिकांश पत्रकारों की भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। कोरोना में उन्हें यह तो ज्ञात हो ही गया होगा कि सिफारिश काम नहीं आती है, काम आता है तो पैसा। पत्रकार अस्पताल में बिस्तर के लिए फोन पर बतियाता रह गया और उसे ले गया कोई पैसे वाला। अब खींसें निपोरते रहो। लपसी सी चाटते रहो। ‘अंटे में चढ़ गया तो बढ़िया सी खबर लगाऊंगा’, यह कहकर खुद को सांत्वना देते रहो। वैसे पत्रकारों को यह तो पता चल ही गया होगा कि खबर अब खबर नहीं, बल्कि पैसा है। पैसे वाला विज्ञापन के रूप में पैसा फेंकेगा और आपकी बढ़िया सी खबर कूड़ेदान में चली जाएगी। हां, अगर आप पत्रकार रहते हुए जमीन पर रहे हैं तो हो सकता है एक-दो संबंध काम आ जाएं पर ऐसा होता नहीं है। ‘प्रभुता पाहि काहि मद नाहीं’ की तर्ज पर पत्रकार उड़ते रहते हैं और जब धड़ाम से गिरते हैं तो ऐसे कि कोई उठाने वाला पैदा नहीं होता है। जब नौकरी छूट जाती है तो मारे-मारे फिरते हैं और खासमखास ही फोन नहीं उठाते हैं। फिर चटकाते रहो चप्पलें। कुछ पैसे कमा लिए होते तो ‘बेरोजगारी’ ठीक से काट लेते और ‘आधी सैलरी’ में भी काम चला लिया होता।
मैंने बचपन में पैसे की महत्ता के बारे में एक कविता पढ़ी थी। कुछ पंक्तियां आपकी खिदमत में प्रस्तुत हैं-
पोती पत्रा गाते सब पैसे का तराना,
पैसे ही की दुनिया पैसे का जमाना।
पैसा आया पास में तो सबकुछ पा गए
पैसा नहीं पास है तो आप सठिया गए
पैसा जानता है रूठे गालों को मनाना
पैसे ही की दुनिया पैसे का जमाना।
डॉ. भानु प्रताप सिंह, आगरा
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