यूपी में फैमिली कोर्ट का संकट: 4 लाख से अधिक पारिवारिक मामले पेंडिंग, RTI से हुआ बड़ा खुलासा

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आगरा। उत्तर प्रदेश के परिवार न्यायालयों में पारिवारिक विवादों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था गंभीर दबाव में है। पति-पत्नी के विवाद, बच्चों की अभिरक्षा, भरण-पोषण और अन्य पारिवारिक मामलों में न्याय पाने के लिए लाखों परिवार वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी ने इस गंभीर स्थिति को उजागर किया है। वर्ष 2025 के अंत तक प्रदेश के परिवार न्यायालयों में कुल 4,07,130 मामले लंबित हैं, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक संख्या है। आगरा सहित कई बड़े जिलों में भी मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जिससे दंपतियों, महिलाओं और बच्चों पर सीधा सामाजिक और मानसिक प्रभाव पड़ रहा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के संयुक्त रजिस्ट्रार (आरटीआई)/केंद्रीय सहायक जन सूचना अधिकारी द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन को आरटीआई आवेदन (पंजीयन क्रमांक HCALD/R/2026/60710, पत्रांक 1938/R.T.I./1042/2026/AHC, जून 2026) के उत्तर में उपलब्ध कराए गए वर्षवार समेकित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में प्रदेश की फैमिली कोर्टों में 4,01,553 मामले लंबित थे। उसी वर्ष 2,50,933 नए मामले दर्ज हुए तथा 2,45,836 मामलों का निस्तारण हुआ, जिसके बाद वर्षांत में लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 4,06,650 हो गई।

वर्ष 2022 में 4,06,650 लंबित मामलों के साथ शुरुआत हुई। इस दौरान 2,72,229 नए मामले दर्ज हुए जबकि 2,85,167 मामलों का निस्तारण हुआ और लंबित मामलों की संख्या घटकर 3,93,712 रह गई। वर्ष 2023 में 2,93,845 नए मामलों के मुकाबले 2,90,682 मामलों का निस्तारण हुआ, जिससे लंबित मामलों की संख्या फिर बढ़कर 3,96,875 हो गई। वर्ष 2024 में 2,77,997 नए मामले दर्ज हुए और 2,74,933 मामलों का निस्तारण हुआ, जिसके बाद लंबित मामले 3,99,939 तक पहुंच गए। वर्ष 2025 में 2,87,078 नए मामलों के मुकाबले केवल 2,79,890 मामलों का निस्तारण हो सका और वर्ष के अंत तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 4,07,130 हो गई।

आरटीआई के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में प्रत्येक वर्ष लगभग ढाई से तीन लाख नए पारिवारिक विवाद अदालतों तक पहुंच रहे हैं, जबकि निस्तारण की गति लगभग उसी स्तर पर रहने के कारण लंबित मामलों का बोझ लगातार बना हुआ है। वर्ष 2025 में नए दर्ज मामलों की संख्या निस्तारित मामलों से लगभग 7,200 अधिक रही, जिससे लंबित मामलों का अंतर और बढ़ गया।

बड़े जिलों की स्थिति और भी चिंताजनक है। लखनऊ, कानपुर नगर, प्रयागराज (इलाहाबाद), आगरा, बरेली और मेरठ की फैमिली कोर्टों पर सबसे अधिक बोझ है। इनमें लखनऊ की फैमिली कोर्ट प्रदेश में सर्वाधिक लंबित मामलों का सामना कर रही है, जबकि शहरी आबादी और पारिवारिक विवादों की संख्या अधिक होने के कारण अन्य बड़े जिलों में भी पेंडेंसी लगातार बढ़ रही है। इसके विपरीत शामली, सोनभद्र, चंदौली और कासगंज जैसे छोटे जिलों में मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई है।

आगरा की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। यहां पिछले पांच वर्षों से लंबित मामलों की संख्या लगभग 11 हजार के आसपास बनी हुई है। वर्ष 2021 में 11,489 लंबित मामलों के साथ शुरुआत हुई और वर्ष के अंत में यह संख्या 11,268 रही। वर्ष 2022 में 10,929, वर्ष 2023 में 10,985 तथा वर्ष 2024 में घटकर 10,727 तक पहुंची, लेकिन वर्ष 2025 में फिर बढ़कर 11,600 हो गई, जो वर्ष 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। वर्ष 2025 में आगरा में 12,746 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 11,873 मामलों का ही निस्तारण हो सका।

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन ने इन आंकड़ों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट का गठन पारिवारिक विवादों का त्वरित और संवेदनशील समाधान करने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन चार लाख से अधिक मामलों का लंबित होना इस व्यवस्था की गंभीर चुनौती को दर्शाता है। उनका कहना है कि इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर पड़ रहा है, जिन्हें भरण-पोषण, अभिरक्षा और अन्य मामलों में वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने उच्च न्यायालय और राज्य सरकार से अतिरिक्त फैमिली कोर्ट, पर्याप्त न्यायिक स्टाफ और प्रभावी मीडिएशन व्यवस्था लागू करने की मांग की ताकि लंबित मामलों का तेजी से निस्तारण हो सके।

के.सी. जैन ने बताया कि परिवार न्यायालयों में तकनीक के अधिक उपयोग और ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था लागू कराने के उद्देश्य से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (रिट पिटीशन सिविल संख्या 667/2024) दायर की है। इस याचिका पर सुनवाई के बाद 21 अक्टूबर 2024 को नोटिस जारी हो चुके हैं। उनका कहना है कि यदि परिवार न्यायालयों में ऑनलाइन सुनवाई शुरू होती है तो विभिन्न जिलों और राज्यों में रहने वाले पति-पत्नी या अन्य पक्षकारों की उपस्थिति संबंधी कठिनाइयां कम होंगी और मामलों का निस्तारण अधिक तेजी से हो सकेगा। इस याचिका पर अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को निर्धारित है।

एडवोकेट के.सी. जैन ने सुझाव दिया है कि अधिक लंबित मामलों वाले जिलों में अतिरिक्त फैमिली कोर्ट और न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाए, अनिवार्य मीडिएशन व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए, तीन वर्ष से अधिक पुराने मामलों के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं, भरण-पोषण एवं बाल हित से जुड़े मामलों की प्राथमिकता से सुनवाई हो, ई-फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी डिजिटल व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए तथा अनावश्यक स्थगन पर सख्ती से रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है।

Dr. Bhanu Pratap Singh