​डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का मामला: कुलपति और कुलसचिव समेत 11 के खिलाफ अदालत में परिवाद दर्ज

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आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, अभिलेखों में हेरफेर और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने के आरोपों ने गंभीर मोड़ ले लिया है। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर आशु रानी, कुलसचिव अजय मिश्रा, परीक्षा नियंत्रक ओमप्रकाश समेत 11 अधिकारियों और प्रोफेसरों के खिलाफ विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मृदुल दुबे की अदालत ने परिवाद दर्ज कर लिया है। अधिवक्ता डॉ. अरुण कुमार दीक्षित की ओर से प्रस्तुत प्रार्थना पत्र में लगाए गए आरोपों के आधार पर परिवाद दर्ज होने के बाद संबंधित सभी लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

अधिवक्ता डॉ. अरुण कुमार दीक्षित ने न्यायालय में दिए प्रार्थना पत्र में बताया कि वह वर्ष 2011 से डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में विधिक सलाहकार के रूप में कार्यरत थे और उनकी नियुक्ति कार्य परिषद के माध्यम से हुई थी। आरोप है कि कुलपति प्रोफेसर आशु रानी के कार्यकाल में उनके लंबित बिलों का भुगतान नहीं किया गया। डॉ. दीक्षित का आरोप है कि भुगतान के लिए उनसे 50 प्रतिशत कमीशन की मांग की गई और मना करने पर 30 प्रतिशत कमीशन देने की बात कही गई। कमीशन नहीं देने पर बिलों का भुगतान नहीं किया गया।

प्रार्थना पत्र के मुताबिक, उन्हें यह भी कहा गया कि शिकायत करने पर भी कुछ नहीं होगा और भुगतान के लिए कमीशन देना ही पड़ेगा। डॉ. दीक्षित का आरोप है कि मामले की खानापूर्ति के लिए एक कमेटी गठित की गई, लेकिन कमेटी ने करीब दो वर्ष तक कोई बैठक नहीं की और न ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जबकि उसे 15 दिन में आख्या देनी थी। भुगतान के लिए उन्होंने कुलपति को कई पत्र भी लिखे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

शासन और राजभवन में शिकायत का आरोप

डॉ. दीक्षित ने विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार को लेकर शासन और राजभवन में शिकायत करने की बात भी न्यायालय के समक्ष कही। उनका आरोप है कि शिकायत के बाद उनके खिलाफ कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए और अभिलेखों में हेरफेर कर उन्हें कार्यविरत कर दिया गया।

प्रार्थना पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि उनके भुगतान के मामले में कुलपति की ओर से दोबारा जांच के लिए एक कमेटी गठित की गई। इस कमेटी में प्रोफेसर विपन कुमार, प्रोफेसर बीके सिंह और प्रोफेसर संजय चौधरी को शामिल किया गया था। आरोप के मुताबिक कमेटी का गठन 19 मई 2025 को हुआ और अगले ही दिन 20 मई 2025 को उसकी रिपोर्ट भी तैयार हो गई। डॉ. दीक्षित ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में सामान्य तौर पर कमेटियों की रिपोर्ट आने में वर्षों लग जाते हैं, जबकि इस मामले में कुछ ही घंटों में रिपोर्ट तैयार कर दी गई।

कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई का आरोप

प्रार्थना पत्र के अनुसार, इसी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर डॉ. दीक्षित को कार्यविरत किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षियों की ओर से भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता की गई तथा बिलों के भुगतान से संबंधित फाइलों में रिकॉर्ड को नष्ट करने, गायब करने और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने जैसे कृत्य किए गए।

इन लोगों को बनाया गया पक्षकार

अधिवक्ता डॉ. अरुण कुमार दीक्षित की ओर से प्रस्तुत प्रार्थना पत्र में कुलपति प्रोफेसर आशु रानी, कुलसचिव अजय मिश्रा, परीक्षा नियंत्रक ओमप्रकाश, प्रोफेसर संजय चौधरी, प्रोफेसर मनु प्रताप सिंह, आरबीएस कॉलेज के प्रोफेसर विपन कुमार, एनडी कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर बीके सिंह, समाज विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर राजीव वर्मा, उप कुलसचिव पवन कुमार, सहायक कुलसचिव अनूप कुमार और वरिष्ठ सहायक राधिका प्रसाद को पक्षकार बनाया गया है।

विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मृदुल दुबे की अदालत ने मामले में परिवाद दर्ज कर लिया है। परिवाद दर्ज होना आरोपों की न्यायिक पुष्टि या संबंधित व्यक्तियों को दोषी ठहराया जाना नहीं है, आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया में होगा। मामले में आगे की कार्यवाही के बाद आरोपों और संबंधित पक्षों के रुख की स्थिति स्पष्ट होगी।

Dr. Bhanu Pratap Singh