आगरा। उत्तर भारत की प्रमुख श्रीरामलीला में शुक्रवार को सुग्रीव मिलन, बाली वध और वर्षा ऋतु वर्णन की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। प्रभु श्रीराम और सुग्रीव की पहली भेंट, हनुमानजी का अपने आराध्य को पहचानकर भावविभोर हो उठना और अन्याय से पीड़ित सुग्रीव को न्याय का भरोसा मिलना, इन प्रसंगों ने रामलीला मैदान में उपस्थित श्रद्धालुओं को भावनाओं से भर दिया। लीला ने संदेश दिया कि सच्ची मित्रता विश्वास पर टिकी होती है और धर्म के मार्ग पर चलने वाले को अंततः न्याय का साथ मिलता है।
रामलीला मैदान में बुधवार को दर्शकों की भारी भीड़ रही। आधुनिक संसाधनों, प्रभावशाली प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि संयोजन के बीच मंचित लीलाओं को देखने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया।
हनुमानजी को मिला अपने आराध्य का सान्निध्य
लीला का आरंभ उस भावुक प्रसंग से हुआ, जब माता सीता की खोज में वन-वन भटकते प्रभु श्रीराम और अनुज लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। उधर, अपने भाई बाली के भय से पर्वत पर शरण लिए बैठे सुग्रीव ने दो तेजस्वी राजकुमारों को अपनी ओर आते देखा तो उनके मन में आशंका उत्पन्न हुई। उन्हें भय था कि कहीं बाली ने उन्हें मारने के लिए इन योद्धाओं को तो नहीं भेजा है।
सुग्रीव ने अपने परम विश्वासपात्र हनुमानजी को दोनों राजकुमारों की वास्तविकता जानने के लिए भेजा। हनुमानजी ब्राह्मण का वेश धारण कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के समीप पहुंचे। उनके तेज, सौम्यता और दिव्य व्यक्तित्व को देखकर हनुमानजी ने विनम्रतापूर्वक परिचय पूछा। प्रभु श्रीराम ने उन्हें अपने वन आगमन, माता सीता के हरण और उनकी खोज में भटकने का उद्देश्य बताया।
प्रभु के मुख से उनकी व्यथा सुनते ही हनुमानजी के हृदय में भक्ति का भाव उमड़ पड़ा। जैसे ही उन्हें अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ, वे स्वयं को रोक नहीं सके। भावविभोर होकर उनके चरणों में गिर पड़े। यह दृश्य मंच पर भक्ति, समर्पण और प्रभु से मिलन की ऐसी अनुभूति लेकर आया कि दर्शक भी भावविभोर हो उठे। हनुमानजी के लिए यह केवल दो राजकुमारों से परिचय नहीं, बल्कि अपने जीवन के परम उद्देश्य और आराध्य से मिलन का क्षण था।
हनुमानजी ने कराई राम-सुग्रीव की मित्रता
इसके बाद हनुमानजी प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ लेकर सुग्रीव के पास पहुंचे। दोनों की भेंट ने कथा को एक नया मोड़ दिया। एक ओर माता सीता के वियोग से व्याकुल प्रभु श्रीराम थे, तो दूसरी ओर अपने ही भाई के अन्याय और भय से पीड़ित सुग्रीव। दोनों की पीड़ा अलग थी, लेकिन उनके मन में न्याय की आकांक्षा समान थी।
सुग्रीव ने प्रभु श्रीराम को अपने जीवन की व्यथा सुनाई और बताया कि किस प्रकार बाली ने उनके साथ अन्याय किया तथा उनकी पत्नी को अपने अधिकार में कर लिया। प्रभु श्रीराम ने सुग्रीव की पीड़ा को समझते हुए उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। दोनों के बीच मित्रता स्थापित हुई। यह मिलन इस बात का प्रतीक बना कि सच्चा मित्र वही है, जो संकट के समय साथ खड़ा हो और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाए।
बाली वध से स्थापित हुई न्याय और मर्यादा की सीख
रामलीला का अगला दृश्य सुग्रीव और बाली के बीच हुए भीषण गदा युद्ध का रहा। सुग्रीव की ललकार सुनकर बाली युद्धभूमि में पहुंचा और दोनों भाइयों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। युद्ध के दौरान प्रभु श्रीराम ने अपने धनुष से बाली का वध कर दिया। बाली के पतन के साथ ही अन्याय के अंत और धर्म की स्थापना का संदेश मंच पर साकार हुआ। इसके बाद सुग्रीव का राजतिलक किया गया।
इसके पश्चात वर्षा ऋतु वर्णन की लीला का मंचन किया गया। वर्षा से सजी प्रकृति के बीच माता सीता के वियोग में प्रभु श्रीराम की व्याकुलता ने वातावरण को करुणामय बना दिया। इस प्रसंग ने आगामी घटनाक्रम की भूमिका तैयार की और दर्शकों को हनुमानजी की अद्भुत सेवा, साहस और भक्ति से जुड़ी लीलाओं की प्रतीक्षा में छोड़ दिया।
इन्होंने उतारी स्वरूपों की आरती
महादेवी भजन क्लब, महिला विकास मंडल खंदारी, पदम् प्राइड रेजिडेंशल सोसाइटी, अर्पित गुप्ता द्वारा स्वरूपों की आरती उतारी गई।
ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर रामलीला कमेटी महामंत्री राजीव अग्रवाल, ताराचंद, भगवानदास बंसल, विजय प्रकाश गोयल, विष्णु दयाल, मुकेश जौहरी, मनोज अग्रवाल, संजय तिवारी, आनंद मंगल, महेश चंद्र अग्रवाल, अजय अग्रवाल, रमांशु शर्मा, प्रकाश अग्रवाल, दिलीप अग्रवाल, शैलेश अग्रवाल, राहुल गौतम, आयुष अग्रवाल, नितिन अग्रवाल, अशोक गोयल, विकास अग्रवाल, राजीव गुप्ता, राघव शर्मा आदि उपस्थित रहे।
श्रीरामलीला में आज
मीडिया प्रभारी राहुल गौतम ने बताया कि 15 अक्टूबर को हनुमानजी के समुद्र लांघने, माता सीता की खोज एवं लंका दहन की लीला का मंचन शाम सात बजे से किया जाएगा।
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