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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat. आगरा। भीम वाटिका, देवरी रोड, आगरा पर 22 जून को प्रस्तावित बहुजन समाज परिषद के एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन और आमसभा को अचानक प्रशासन ने रोक दिया। इसके बाद परिषद के नेताओं ने गोपनील रणनीति बनाई। बड़ी संख्या में एकत्रित होकर जिला मुख्यालय कलेक्ट्रेट पहुंच गए। नारेबाजी के बीच ज्ञापन दिया। इस ज्ञापन में कहा गया है कि हमारी बात मानी तो “सबका साथ सबका विकास” की परिकल्पना पूरी होगी, अन्यथा नहीं।
3 जून को मांगी थी अनुमति
पूर्व निर्धारित कार्यक्रम हेतु 3 जून 2025 को ही जिलाध्यक्ष श्याम सुन्दर द्वारा विधिवत अनुमति के लिए आवेदन पुलिस उपायुक्त (नगर) को प्रस्तुत कर दिया गया था। शहरभर में जन-जागरण, प्रचार-प्रसार हुआ। बहुजन समाज में कार्यक्रम को लेकर अपार उत्साह था।
21 जून को कार्यक्रम पर रोक
21 जून की रात्रि 8 बजे, शासन-प्रशासन के निर्देश पर पुलिस अधिकारियों ने इस कार्यक्रम की अनुमति रद्द कर दी और पूर्ण रूप से रोक लगा दी। इसके बाद परिषद ने तत्काल रणनीति में परिवर्तन करते हुए धरना-प्रदर्शन को स्थगित कर, एक बैठक आयोजित की।
बैठक में लिया ज्ञापन देने का निर्णय
22 जून 2025 को प्रातः 11 बजे बाबा साहब डॉ. बी.आर. आंबेडकर सामुदायिक भवन, नगला टेक चन्द, देवरी रोड, आगरा में प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह लोधी की अध्यक्षता में बैठक हुई। निर्णय लिया गया कि जो ज्ञापन जिलाधिकारी को धरना स्थल पर देना था, अब उसे 23 जून को जिला मुख्यालय (कलेक्ट्रेट), आगरा में सौंपा जाएगा।
ज्ञापन सौंपा गया: लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग
23 जून 2025, दोपहर 12 बजे, बहुजन समाज परिषद के नेतृत्व में बहुजन समाज के जागरूक पदाधिकारियों और प्रबुद्ध नागरिकों ने जिला प्रशासन को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा। इस दौरान अनेक वरिष्ठ नेता, अधिवक्ता व सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
उपस्थित महानुभावों की सूची:
1. दिनेश कुमार गौतम – राष्ट्रीय अध्यक्ष
2. कमल सिंह लोधी – प्रदेश अध्यक्ष
3. सुनील कुमार चौधरी – प्रदेश महासचिव
4. भगवान सिंह – प्रदेश कोषाध्यक्ष
5. श्याम सुन्दर – जिला अध्यक्ष, आगरा
6. राजाराम सागर – शहर अध्यक्ष
7. सुनील बहुजन – पूर्व जिला अध्यक्ष
8. राधेश्याम सत्संगी
9. राजीव सिंह
10. अमर सिंह
11. महेन्द्र बाबू
12. चरत सिंह
13. ताराचंद बौद्ध
14. हरी सिंह
15. बी०एस० चौधरी
16. संजय कुमार
17. मनोज कुमार
18. अनिल कुमार
19. सुभाष चन्द वित्तौलिया
20. देवेन्द्र सिंह
21. प्रमोद कुमार
22. सुरेश चन्द
23. रमेश चन्द
24. जगन सिंह
25. राजेश कुमार एडवोकेट
26. एडवोकेट अविचल प्रताप सिंह
27. एडवोकेट रोहित दिवाकर
28. एडवोकेट सुनील कुमार राही
29. एडवोकेट अभय प्रताप सिंह
30. एडवोकेट शैलेन्द्र कुमार सिंह
31. शिव कुमार राजौरिया
32. वेद प्रकाश
33. बच्चू सिंह
34. सतीश गौतम
35. दलवीर सिंह
36. नरेन्द्र गौतम
37. कुमार सिंह सोलंकी
38. दिवारी लाल
39. सुरेन्द्र सिंह बौद्ध
40. रिंकू सागर
41. प्रदीप कुमार
42. उमेश कुमार
43. सुरजन सिंह बौद्ध
44. लज्जाराम सावेदिया
45. विशम्बर सिंह
46. जितेन्द्र कुमार
47. तिलक सिंह
48. यतेन्द्र कुमार
49. अजय कुमार
50. अजीत पहलवान
51. धर्मवीर सिंह
52. जयवीर सिंह
53. नेकराम
54. प्रमोद गौतम
55. नित्य प्रकाश
56. रवि कुमार
57. बबलू कुमार
58. राजू सिंह
59. सनी कुमार
60. कमल सिंह
संपादकीय: संघर्ष की नई रेखाएं, नेतृत्व की नई ऊंचाइयां
जब एक संगठन, प्रशासनिक रुकावटों के बावजूद शांति, अनुशासन और संवैधानिक मर्यादा में रहकर जनहित की बात करता है, तो वह आंदोलन नहीं, आदर्श बन जाता है।
बहुजन समाज परिषद का यह उदाहरण ठीक वैसा ही है—न कोई अराजकता, न उत्तेजना; केवल संविधान का सहारा और समाज की चेतना का सहारा।
राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनेश कुमार गौतम केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक प्रतिबद्ध दृष्टि के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने जो मांगें रखीं—समान शिक्षा प्रणाली, निःशुल्क आवासीय शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, रोजगार—वे देश के हर उस नागरिक की आवाज़ हैं जो बराबरी के सपने देखता है।
आज जब ‘फ्री-राशन’ की राजनीति में लोगों को केवल जीने लायक बनाए रखने की नीतियाँ बनाई जा रही हैं, दिनेश गौतम शिक्षा और सम्मान से जीवन को ऊँचा उठाने की बात करते हैं। यह दृष्टिकोण ही इस देश को संविधान की असल आत्मा से जोड़ता है।
उनका यह कथन कि “हर नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और सुरक्षा मूल अधिकार के रूप में मिलने चाहिए”, केवल एक सामाजिक घोषणा नहीं बल्कि एक राष्ट्रनिर्माण की रूपरेखा है।।

ये हैं मांगें
1. निःशुल्क, आवासीय एवं समान शिक्षा प्रणाली
हमारे देश में भारत सरकार के द्वारा जनता को मुफ्त राशन मुहैया कराया जा रहा है जिसकी जनता को कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। बल्कि हमारे देशवासियों के बच्चों (नौनिहालों) के भविष्य निर्माण हेतु समान रूप से शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कर समान शिक्षा प्रणाली के आधार पर ‘एक देश-एक शिक्षा-एक पाठ्यक्रम’ के तहत बुनियादी शिक्षा से उच्चतम स्तर की शिक्षा तक निःशुल्क एवं अनिवार्य आवासीय शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। चूंकि भारतीय संविधान के संशोधन अधिनियम 2002 के तहत संविधान अनुच्छेद-21 (क) जोड़ा गया जिसके तहत देश के नौनिहाल बच्चों (6-14 वर्ष) आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई-2009) पारित किया गया। लेकिन उक्त कानून का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं किया गया। आज भी देश के ज्यादातर बच्चे शिक्षा का अधिकार होने के बावजूद भी शिक्षा पाने से वंचित हैं। ऐसी स्थिति में उक्त अधिनियम की समीक्षा करते हुए उसमें उचित संशोधन यथा-आयु सीमा को हटाकर प्रत्येक के लिए शिक्षा के अधिकार को प्रभावी एवं कारगर बनाया जा सके एवं जन-जन तक पहुँचाया जा सके।
राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में निहित अनुच्छेद-45 में शिक्षा सम्बन्धी प्रावधान के तहत 6 वर्ष से कम आयु के बालक/बालिकाओं के लिए बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा प्राप्ति का उपबंध किया गया लेकिन अधिकतर राज्यों द्वारा उक्त अनुच्छेद के तहत शिक्षा दिलाने के लिए किसी भी राज्य द्वारा कोई भी आदेश, दिशानिर्देश एवं विधि सम्बन्धित सक्षम एवं कारगर प्रावधान नहीं किए गए हैं। जिनके चलते देश में शिक्षा का स्तर गिरने के साथ ही बाल्यावस्था में बालक अपने अधिकारों को पाने से वंचित हैं।
सम्पूर्ण भारत देश में जबसे सरकार द्वारा बेसिक शिक्षा विभाग में मिड-डे-मील (मध्यान्ह भोजन) की व्यवस्था की गई है, तबसे शिक्षक शिक्षार्थियों के भोजन आदि की व्यवस्था में ही लगे रहते हैं, न तो शिक्षकों का पढ़ाई की ओर ध्यान है और न ही बच्चे ही पढ़ाई की ओर ध्यान लगा पाते हैं, जिससे शिक्षा का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है, यही कारण है कि बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों में बच्चों की संख्या नगण्य हो गई है एवं सरकार भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है बल्कि गलत तरीके से बेरि 3 शिक्षा विभाग के स्कूलों को बन्द करने हेतु प्रयासरत् है। जबकि यह कोई समाधान नहीं है, बल्कि वर्तमान स्थितियों को देखते हुए मध्यान्ह भोजन की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है, चूंकि किसी भी प्राइवेट स्कूल में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था नहीं है फिर भी उनके स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है किन्तु बेसिक शिक्षा विभाग के सरकारी स्कूलों की हालत खराब होती जा रही है, बच्चों एवं अभिभावकों का सरकारी स्कूलों से मोहभंग हो रहा है। जिसका महत्वपूर्ण कारण सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर गिरना है, जिस ओर सरकार को ध्यान देना है। साथ ही इस समस्या का मूल समाधान यह है कि सरकार को समान रूप से फ्री-आवासीय शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी, तभी सरकारी स्कूलों की तरफ पुनः बच्चे एवं उनके अभिभावक आकर्षित हो सकेंगे एवं पढ़-लिखकर देश के विकास में अपना योगदान कर सकेंगे।
इसी तरह हमारे देश एवं प्रदेश की सरकारों द्वारा बड़े पैमाने पर अनावश्यक रूप से महत्वहीन जनकल्याणकारी योजनाएँ संचालित की हुई हैं जबकि देशवासियों को उन योजनाओं की कोई आवश्यकता भी नहीं है। उन सारी योजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर किए जा रहे लाखों करोड़ के इस व्यय से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी क्षति हो रही है। इस धनराशि का सदुपयोग यदि आवासीय शिक्षा व्यवस्था पर खर्च किया जाता है तो हमारे देश की कई विकट समस्याओं का समाधान काफी हद तक हो सकता है, जो कि नहीं किया जा रहा है। इसलिए देश में पूर्ण रूप से शिक्षा का राष्ट्रीकरण किया जाए एवं सभी के लिए समान निःशुल्क एवं आवासीय शिक्षा की व्यवस्था की जाए तथा उम्र सीमा की बाध्यता को भी खत्म किया जाए।
2. सभी देशवासियों के लिए समान रूप से निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था
सभी देशवासियों को निर्विवाद, निःशुल्क, उच्चस्तरीय, अत्याधुनिक तकनीकी युक्त एवं एकसमान चिकित्सा व्यवस्था की विशेष आवश्यकता है। क्योंकि हमारे अपने इस भारत देश में बड़े पैमाने पर ‘चिकित्सा उद्योग’ स्थापित हो गया है। जिससे बड़े उद्योगपतियों ने नामी-गिरामी एवं आलीशान व्यावसायिक हॉस्पीटल स्थापित कर लिए हैं, जहाँ मात्र बड़े-बड़े रईसों का ही इलाज किया जाता है किन्तु एक आम आदमी आर्थिक रूप से कमजोर होने की स्थिति में इन अस्पतालों में अपना उचित इलाज नहीं करा पाता है। सरकारी योजना आयुष्मान कार्ड भी निजी अस्पताल मालिकों की जेब भरने का माध्यम बन गया है। साथ ही एक आम आदमी जो कि आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अत्याधुनिक तकनीकी युक्त अस्पतालों में अपना इलाज कराने में सक्षम नहीं है। क्योंकि वह आर्थिक रूप से कमजोर है। इसलिए यह सब अनैतिक एवं भेदभावपूर्ण है तथा देशवासियों के मौलिक हक-अधिकारों का दमन एवं हनन भी है, किन्तु सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। समय-समय पर विभिन्न राज्यों के मा० उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय द्वारा निःशुल्क चिकित्सा संबंधी केस (वाद) के निर्णय में उचित आदेश, दिशा-निर्देश राज्यों के लिए दिए गए हैं, लेकिन बावजूद इसके देश के प्रत्येक नागरिक के लिए आज तक निःशुल्क चिकित्सा उपलब्ध नहीं हो पा रही है। जबकि हमारे देश में गरीब एवं अमीर को अलग-अलग चिकित्सा सेवाऐं हैं, अमीर व्यक्ति तो उच्चस्तरीय अस्पतालों में साधन सम्पन्न होने के कारण अपना हर तरीके से इलाज कराते हैं, वहीं गरीब व्यक्ति केवल सरकारी अस्पतालों की अप्रचलित (काम चलाऊ) चिकित्सा पद्धति से ही अपना इलाज कराने को विवश है, इस तरह हमारे देश में अमीर-गरीब के बीच की खाई को और भी बढाया जा रहा है एवं जानबूझकर गरीब व्यक्ति को उसके मौलिक हक-अधिकारों से वंचित करने का षड़यंत्र किया जा रहा है। इसलिए यह आवश्यक है कि भारत देश के प्रत्येक नागरिक को निर्विवाद, निःशुल्क, उच्चस्तरीय, अत्याधुनिक तकनीकी युक्त एवं एकसमान चिकित्सा व्यवस्था प्रदान किए जाने हेतु देश एवं प्रदेश की सरकारें कोई समुचित एवं ठोस कदम उठाऐं जिससे देशवासियों को सरकार के द्वारा वास्तविक चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध हो सके एवं गरीब-अमीर के बीच की खाई को पाटा जा सके।
3 बगैर किसी भेदभाव के सभी के लिए सुरक्षा, न्याय व शांति व्यवस्था प्रदान कराने हेतु
देशवासियों को भारतीय संविधान में निहित मौलिक हक-अधिकारों के अनुरूप न्याय एवं सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। जबकि हमारे देशवासियों को दो तरीके से न्याय मिल पाता है यथा-यदि आप आर्थिक रूप से मजबूत हैं तो आपको जल्दी एवं सुगमतापूर्ण न्याय मिल सकता है, वहीं दूसरी तरफ हमारे भारत देश के आर्थिक रूप से कमजोर देशवासी को न्याय पाने के लिए भटकना पड़ता है एवं उसे कानूनी सहायता प्राप्त करने में काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है जिस कारण गरीब व्यक्ति न्याय पाने से वंचित होता जा रहा है, साथ ही साथ हमारे देश में जातिगत एवं धार्मिक भेदभाव बड़े पैमाने पर लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिसे कानून के माध्यम से ही रोका जा सकता है। शांति व्यवस्था (लॉ एण्ड ऑर्डर) की जिम्मेदारी शासन स्तर से देश एवं प्रदेश सरकार की ही है। जिसको कि सरकार आम नागरिकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था एवं व्यक्ति के आत्मसम्मान की रक्षा करने में असमर्थ दिख रही है। पूरे देश में जातिवाद चरम पर है, आए दिन अखबारों एवं मीडिया में जातिवाद की खबरें प्रसारित होती रहती हैं। अब तो ऐसा लगने लगा है कि अब हमारे अपने इस भारतदेश में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं है, जो कि एक गम्भीर मामला है एवं हमारे देश के विकास में बाधक बना हुआ है।
4. शराब पर पूर्णतः प्रतिबन्ध (नशामुक्त भारत) लगाया जाना-
इसी तरह हमारे भारत देश में आबकारी नियमों का भी खुला उल्लंघन किया जा रहा है। सरकार की नीति के अनुसार नशीले पदार्थों की बिक्री एवं बिक्री केन्द्र शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, पिछड़े एवं गरीब नागरिकों की घनी आबादी मलिन बस्ती (Slum Area) और समस्त धार्मिक स्थलों के इर्द-गिर्द लगभग 500 मीटर से कम दूरी पर कानूनी एवं संवैधानिक रूप से स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। किन्तु ऐसा नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसके विपरीत जितने भी नशीले पदार्थों की बिक्री अधिकतर शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों मलिन बस्तियों, धार्मिक स्थलों के आस-पास ही हैं। गरीबों एवं मजदूरों की रिहायश के आस-पास षड़यंत्र के तहत शराब के ठेके खोल दिए गए हैं, इन ठेकों पर दिन-रात गरीब परिवारों के बच्चों एवं लोगों का जमावड़ा लगा रहता है, ये लोग अपने पूरे दिन की कमाई शराब पीने में खर्च कर रहे हैं। जिससे गरीब और गरीब होता जा रहा है और कम उम्र के युवा एवं नौजवान का के गाल में असमय समाए जा रहे हैं, औरतें विधवा हो रही हैं बच्चे अनाथ एवं बेसहारा होते जा रहे हैं। विधवा महिलाऐं परिवार के भरण पोषण की प्रतिपूर्ति के लिए दर-दर भटकने के कारण शोषण का शिकार हो रही हैं एवं उनके बच्चे भीख मांगने को मजबूर हैं। इसलिए अब यह अति आवश्यक है कि हमारा भारत देश जो कि घी, दूध की नदियां बहाने वाला देश है, इसमें इस तरह के मादक पदार्थों की बिक्री पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगाया जाना अत्यन्त आवश्यक है। ताकि गरीब मजदूर व्यक्ति को भी देश की मुख्यधारा में लाया जा सके।
5. समान रूप से आरक्षण व्यवस्था (प्रतिनिधित्व) के तहत खाली पड़े पदों की भर्ती / नियुक्तियाँ कर रोजगार दिया जाना-
हमारे देश में बड़े पैमाने पर शिक्षित एवं प्रशिक्षित बेरोजगार की एक बड़ी आबादी खड़ी हो गई है। पूरे देश में करोड़ों पद खाली पड़े हुए हैं, परन्तु सरकार उन पदों पर भर्ती/नियुक्ति करने हेतु इच्छुक नहीं है। इसके अलावा लैटरल एन्ट्री के माध्यम से बिना किसी उचित भर्ती प्रक्रिया के उच्च पदों पर ओबीसी, एससी एवं एसटी के लोगों को असंवैधानिक तरीके से N.F.S. (Not Found Suitable) के तहत दरकिनार कर सामान्य वर्ग के लोगों को पदस्थ किया जा रहा है एवं ओबीसी, एससी एवं एसटी के निर्धारित कोटे को षड़यंत्रपूर्वक धीरे-धीरे गुप-चुप तरीके से खत्म भी किया जा रहा है। साथ ही गैर संवैधानिक आरक्षण E.W.S. (Economical Weaker Section) स्कीम में 10% कोटे के तहत विशेष वर्ग के अपात्र एवं अपने चहेते लोगों की भर्ती / नियुक्तियाँ सरकार द्वारा की जा रही है। साथ ही E.W.S. आरक्षण संविधान के अनुच्छेद-15, अनुच्छेद-16 का पूर्णतः हनन एवं उल्लंघन करता है। जबकि गैर संवैधानिक आरक्षण E.W.S. देश के आर्थिक रूप से कमजोर समस्त नागरिकों के लिए होना चाहिए किन्तु E.W.S. का लाभ केवल एक विशेष वर्ग के लोगों की नियुक्तियों के लिए असंवैधानिक रूप से सरकार द्वारा दिया जा रहा है और साथ ही इस 10% E.W.S. की भर्ती / नियुक्ति प्रक्रिया शत-प्रतिशत पूरी जा रही है जबकि पिछले 75 वर्षों में आज तक कभी भी अनुच्छेद-340, अनुच्छेद-341 एवं अनुच्छेद 342 के तहत क्रमशः ओबीसी, एससी एवं एसटी के पदों पर आरक्षण के तहत शत-प्रतिशत भर्ती नहीं की जा सकी है। ऐसा लगता है कि सरकार द्वारा जानबूझकर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाते हुए ओबीसी, एससी एवं एसटी को नुकसान पहुँचाए जाने एवं उन्हें पुनः फिर से दरिद्रता की ओर धकेलने के उद्देश्य से उनके आरक्षण कोटे में सेंध लगाई जा रही है। जो कि संविधान के नियमों एवं संविधान में प्रदत्त मौलिक हक-अधिकारों का पूर्णतः घोर उल्लंघन एवं हनन किया जा रहा है, जिसे तत्काल रोका जाना अत्यन्त आवश्यक है। इस हेतु आवश्यक है कि देश में पूर्व से लागू आरक्षण व्यवस्था का पालन करते हुए भर्ती / नियुक्ति प्रक्रिया में ओबीसी, एससी एवं एसटी को उनका प्रतिनिधित्व देते हुए समान रूप से नियुक्ति प्रक्रिया प्रारम्भ कर बेरोजगारों के लिए रोजगार का शासन स्तर से स्थाई प्रवेश किया जाना अति आवश्यक है।
6. यातायात में बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार / माफियागिरी को रोका जाना-
हमारे देश में यातायात माफियाओं का जंगलराज कायम हो चुका है। सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। राज्य परिवहन निगम कई प्रदेशों में मृत प्राय हैं एवं मध्य प्रदेश की तरह अन्य प्रदेशों में भी परिवहन निगम पूरी तरह खत्म करने की स्थिति में है और जिन प्रदेशों में यातायात को माफियाओं के हवाले कर दिया गया है, वहाँ उन प्रदेशों की जनता को अत्यधिक नुकसान तथा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए यातायात व्यवस्था को पूर्व की भांति सरकारी हाथों में दिया जाए, जिससे जनता को आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक क्षति से बचाया जा सके।
इसी तरह हमारे देश की रेल व्यवस्था भी पूर्णतः अव्यवस्थित एवं लाचार है। चूंकि सामान्य/आम जनता के लिए टिकट लेने के उपरांत भी ट्रेन में बैठने की सीट नहीं मिल पाती है तथा तत्काल आरक्षण करने के नाम पर आम जनता से अत्यधिक रुपया लेकर उनको सीट न उपलब्ध कराना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है, कई वर्षों से यह भी देखा जा रहा कि आम जनता को ऑनलाइन रिजर्वेशन एवं तत्काल आरक्षण पर सी उपलबध नहीं हो पाती है। चूंकि पूरे भारतवर्ष में तत्काल आरक्षण कराने में अल्पमात्र समय एक या दो मिनट में ही सीटें फुल दिखाई जाती हैं, इसके विपरीत यह देखने में आता है कि रेलवे विभाग द्वारा ऑनलाइन साइट पर अनुचित लाभ कमाने के उद्देश्य से ऐसा गलत कृत्य किया जाता है। जबकि
जनता की यह मांग है कि रेलवे विभाग के द्वारा देश में जनसंख्या के बढ़ते स्तर को देखते हुए अत्यधिक ट्रेनें चलाकर सामान्य एवं अनारक्षित बोगियों की संख्या बढ़ाई जाएँ।
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