Agra, Uttar pradesh, India. वर्धमान महावीर स्वामी जैन मंदिर दादाबाड़ी भोगीपुरा, शाहगंज में मूलनायक भगवान महावीर स्वामी के तलघर मंदिर के लिए गुफा बनाने के दौरान चरण मिले हैं। कमलदल पर रखे गए चरण पत्थर के हैं। इसके साथ ही मंदिर की प्राचीनता का एक और प्रमाण मिल गया है। मंदिर का वास्तु दोष दूर करने के दौरान दो दिन पहले 450 वर्ष प्राचीन सीढ़ियां और ककइया ईंटों की दीवार मिली थी। गुफा बनाने का काम युद्धस्तर पर जारी है।
प्राचीन चरण मिले
सोमवार को कई मजदूर अपना काम कर रहे थे। तभी तलघर मंदिर की ओर जेन वाले रास्ते की दीवार से फावड़ा टकराया। मजदूर यह देखकर हैरान रह गए कि दीवार के साथ वेदिका में चरण स्थापित थे। सीमेंट से नहीं बल्कि चूना से। चूना का प्रयोग मुगल काल में किया जाता था। मजदूर ने इसकी जानकारी मौके पर हर वक्त मौजूद रहने वाले मंदिर निर्माण कमेटी के संयोजक सुनील कुमार जैन और जैन मंदिर दादाबाड़ी ट्रस्ट के अध्यक्ष उत्तम चंद जैन, कोषाध्यक्ष कमलचंद जैन, संयुक्त सचिव महेन्द्र जैन को दी। उन्होंने मौके पर देखा तो पाया कि ये तो वाकई प्राचीन चरण हैं। पुजारी को बुलाया गया। उन्होंने जल से पूजा की।
छिपाकर रखे थे चरण
सुनील कुमार जैन का कहना है कि चरणों की प्राचीनता के बारे में तत्काल कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तो तय है कि यहां प्रचीन खजाना छिपा हुआ है। अब तलघर मंदिर के लिए गुफा का निर्माण हो रहा है तो आज चरण मिले हैं। हो सकता है कि कुछ और मिले। ऐसा लगता है कि आक्रांता मुगल शासक औरंगजेब की नजरों से बचाने के लिए चरणों को यहां रखा गया है।
होगा रोमांच
संयुक्त सचिव महेन्द्र जैन ने बताया कि स्व. अशोक जैन के अनुज और आर्कीटेक्ट सुनील कुमार जैन यहां पुनरोद्धार करा रहे हैं। जल्द ही मंदिर नए रूप में दिखाई देगा। श्रद्धालुओं को यहां रोमांच का अनुभव होगा।
किसी संत के चरण हैं ये
जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रीसंघ के अध्यक्ष राजुकमार जैन ने बताया कि जैन धर्म में मूर्तियां सिर्फ हमारे 24 तीर्थंकरों की बनती हैं। अन्य उच्च कोटि के संतों के चरण बनाए जाते हैं। जैन दादाबाड़ी में हीरविजय सूरी महाराज की प्राचीन चरण पादुका हैं। एक और संत के चरण मिले हैं। अब इसमें कोई संदेह नहीं है कि जैन दादाबाड़ी का इतिहास मुगलकाल से भी पहले का है।