जाने माने स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा को प्रथम डॉक्टर वेद भारद्वाज सम्मान

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जाने माने स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा को प्रथम डॉक्टर वेद भारद्वाज सम्मान

डॉ भारद्वाज ने कुष्ठ रोगियों की सेवा में महात्मा गांधी को भी पीछे छोड़ दिया था

बच्चों में कुष्ठ रोग का पता लगाने की तकनीक ईजाद की जो दुनिया भर में आज भी मान्य

प्रथम पुण्यतिथि पर विज्ञान व्याख्यान माला में उनके सेवा कार्यों को याद किया

डॉक्टर वेद भारद्वाज की सेवा की विरासत

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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक, जालमा के पूर्व निदेशक एवं लेप्रोसी पेशेंट्स वेलफेयर सोसाइटी के पूर्व सचिव डॉक्टर वेद भारद्वाज ने कुष्ठ रोगियों की सेवा में महात्मा गांधी को भी पीछे छोड़ दिया था। 16 सितंबर 2024 को वे इस संसार से विदा हो गए। अब उनके परिजन कुष्ठ रोगियों की सेवा का पवित्र दायित्व निभा रहे हैं।

मुख्य अतिथि के उद्गार: समर्पण की मिसाल

डॉक्टर वेद भारद्वाज की प्रथम पुण्यतिथि पर आयोजित विज्ञान व्याख्यान माला में यह भावपूर्ण बातें कही गईं। सेठ पदमचंद जैन प्रबंध संस्थान, खंदारी परिसर, आगरा विश्वविद्यालय में हुई इस व्याख्यान माला के मुख्य अतिथि, एसएन मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉक्टर राजेश्वर दयाल ने कहा कि डॉक्टर वेद भारद्वाज अपने कार्य के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। जालमा में उन्होंने बच्चों के कुष्ठ रोग में विशेष रुचि दिखाई। उन्होंने शोध किया कि बच्चों में कुष्ठ रोग के लक्षण प्रकट होने से पूर्व ही इसे कैसे पहचाना जाए और यदि लक्षण मिल जाएं तो उसका उपचार कैसे किया जाए। उनके द्वारा ईजाद किया गया परीक्षण आज भी दुनिया भर में मान्य है। डॉक्टर भारद्वाज ने मुझे हाथ पकड़कर कार्य करना सिखाया। वे सच्चे अर्थों में मानव सेवी थे। मंदिर में जाकर धन चढ़ाने से बेहतर है किसी मानव की सेवा करना। डॉक्टर वेद भारद्वाज ने यही किया और इसी कारण कुष्ठ रोगी उन्हें भगवान के रूप में देखते थे।

सम्मान की गरिमा: डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा को मिला पुरस्कार

इस अवसर पर चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सक एवं रेनबो हॉस्पिटल के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा को डॉक्टर वेद भारद्वाज सम्मान 2025 से सम्मानित किया गया। बताया गया कि जब डॉक्टर वेद भारद्वाज कुष्ठ रोगियों पर शोध कर रहे थे, तब डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा की मां डॉक्टर प्रभा मल्होत्रा के मरीजों पर परीक्षण करते थे। डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा ने अत्यंत विनम्रता के साथ यह सम्मान स्वीकार किया। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और वेलनेस कोच डॉक्टर भानु प्रताप सिंह ने डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा का रोमांचकारी परिचय दिया।

अपने सम्मान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा

मित्र की स्मृतियां: जिंदादिल व्यक्तित्व की झलक

पूर्व आईएएस शशिकांत शर्मा ने कहा कि मैं 1971 से डॉक्टर वेद भारद्वाज का मित्र हूं। वे जिंदादिल इंसान थे। उनके पास 40 शर्तें थीं जो मुझे आश्चर्यचकित करती थीं। डॉक्टर वेद भारद्वाज कमजोर छात्रों के संरक्षक थे। उन्होंने अपनी खुशी लुटाकर दूसरों के लिए कार्य किया। वे निष्काम सेवी और दीनबंधु थे। शशिकांत शर्मा ने भागवत और गीता के श्लोक सुनाकर निष्काम सेवा का महत्व प्रतिपादित किया।

सहयोग की कहानी: भाषा और ज्ञान की देन

प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर डी शर्मा ने कहा कि मैं चुंगी के स्कूल में पढ़ा हूं, इसलिए अंग्रेजी में मेरा हाथ तंग था। मेरी एमडी की थीसिस टूटी-फूटी अंग्रेजी में थी, जिसे डॉक्टर भारद्वाज ने सही किया। मैंने एमबीए किया है जो उन्हीं की देन थी। डॉक्टर वेद भारद्वाज एमबीबीएस किए बिना चिकित्सा के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे, यह ताज्जुब की बात है। वे जालमा के प्रथम निदेशक थे। गांधी जी ने कुष्ठ रोगियों की सेवा की, लेकिन डॉक्टर वेद भारद्वाज ने मरीजों को स्वस्थ किया और उन्हें रोजगार भी दिया। इस तरह डॉक्टर वेद भारद्वाज ने कुष्ठ रोगियों की सेवा में गांधी जी को पीछे छोड़ दिया है।

अमरता की पुकार: कभी न मरने वाली आत्मा

आकाशवाणी आगरा के पूर्व निदेशक श्री कृष्ण ने कहा कि डॉक्टर वेद भारद्वाज के नाम के साथ स्वर्गीय न लगाया जाए, क्योंकि डॉक्टर भारद्वाज जैसे लोग कभी मरते नहीं हैं। उन्होंने जापान में भी कैंसर क्षेत्र में कार्य किया और 110 शोध पत्र प्रकाशित किए हैं।

काव्यांजलि: भावपूर्ण श्रद्धांजलि

प्रसिद्ध कवि डॉक्टर राजेंद्र मिलन और अशोक अश्रु ने कवितामय श्रद्धांजलि अर्पित की। कवि रमेश पंडित ने विचार रखे।

कार्यक्रम के बाद फोटोग्राफी तो बनती है।

अध्यक्षीय उद्बोधन: श्रद्धांजलि का सुमन

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ एवं पूर्व प्राचार्य, एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा डॉक्टर एएस सचान ने की। उन्होंने डॉक्टर वेद भारद्वाज को श्रद्धांजलि अर्पित की।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते अतिथि।

भावुक क्षण: परंपरा का संरक्षण

डॉक्टर वेद भारद्वाज की परंपरा को आगे ले जा रही उनकी पत्नी डॉक्टर मधु भारद्वाज काफी भावुक नजर आईं। उन्होंने कहा कि हमने इस विज्ञान व्याख्यान माला में भीड़ तंत्र के बजाय लेप्रोसी से जुड़े लोगों को बुलाया है। उन्होंने गौरव वाही मुंबई, शुभम निगम दिल्ली, हर्ष, रोहित, ध्रुव, तन्मय, फोटोग्राफर असलम सलीमी, डॉक्टर आभा चतुर्वेदी, विनोद वर्मा, डॉक्टर आर सी शर्मा, कमलेश शर्मा, शरद गुप्ता, अजय कुमार कर्दम संजय गुप्त, डॉ अंजू दियालानी, मनिंदर कौर, रवि शंकर पचौरी, विजया तिवारी, मंजरी टंडन, किरण शर्मा, शैलजा अग्रवाल, उपलब्धि भारद्वाज, शिवकुमार, जीएस मनराल रमाकान्त सारस्वत, दीपक प्रहलाद आदि के प्रति सम्मान प्रकट किया।

पुत्री की स्मृति: सेवा का विशाल आयाम

डॉ वेद भारद्वाज की पुत्री गरिमा भारद्वाज ने बताया कि डॉ भारद्वाज ने 48 वर्षों तक कुष्ठ रोगियों की सेवा की। विश्व का प्राचीनतम कुष्ठ सेवा सदन 1861 से जालमा के निकट चल रहा है। यह नगर निगम का भवन है। समिति का उद्देश्य कुष्ठ रोगियों को सम्मानजनक आर्थिक पुनर्वास दिलाना है। कुष्ठ सेवा सदन में कुष्ठ रोगियों को निशुल्क रहने, खाने और उपचार की व्यवस्था है। डॉ वेद भारद्वाज ने एक लाख से अधिक कुष्ठ रोगियों को लाभान्वित किया है, नौकरी दिलाई है, ऑपरेशन किए हैं, पेंशन दिलाई है। वह 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को कार्यक्रम करके कुष्ठ रोगों के बारे में भ्रांतियां को दूर करते थे। कुष्ठ रोगी उन्हें आदर से बाबूजी कहते थे।

कार्यक्रम का आरंभ: पवित्र अनुष्ठान

कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं डॉक्टर वेद भारद्वाज के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

स्वागत और सम्मान: सामूहिक प्रयास

सिविल सोसायटी आगरा के अध्यक्ष अनिल शर्मा ने सम्मान पत्र का वाचन किया। डॉक्टर नीतू चौधरी ने डॉक्टर राजेश्वर दयाल का परिचय दिया। आगरा पब्लिक स्कूल के महेश शर्मा, संदीप भारद्वाज, जितेंद्र सिंह, सर्वेश कुमार आदि ने अतिथियों का स्वागत किया।

आभार प्रकटन: संकल्प की प्रतिज्ञा

डॉ वेद भारद्वाज के पुत्र संकल्प भारद्वाज ने सभी का आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि पिताजी मुझे छोटे भाई की तरह मानते थे। मैं सोसाइटी को लेप्रोसी के बारे में बताऊंगा।

https://youtube.com/shorts/lULNsU1aZBI?si=Ahwr4IoKhdvUi3kO

संपादकीय

डॉक्टर वेद भारद्वाज जैसे महान व्यक्तित्व की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम न केवल उनकी सेवा की अमर कहानी को जीवंत करता है, बल्कि समाज को एक गहन संदेश देता है कि सच्ची मानवता निष्काम भाव से दूसरों के दुखों को दूर करने में निहित है। गांधी जी की सेवा से आगे बढ़कर, डॉक्टर भारद्वाज ने विज्ञान और करुणा के संगम से कुष्ठ रोगियों को न केवल उपचार दिया, बल्कि सम्मानजनक जीवन भी प्रदान किया। आज के स्वार्थपूर्ण युग में, जहां चिकित्सा अक्सर व्यावसायिक हो जाती है, डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा जैसे समर्पित चिकित्सकों को दिए गए यह सम्मान हमें प्रेरित करता है कि सेवा का मार्ग ही सच्ची सफलता का मूल है। हमें ऐसे प्रयासों को बढ़ावा देना चाहिए जो भ्रांतियों को मिटाकर, समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाएं। डॉक्टर भारद्वाज की विरासत को जीवित रखना हम सबका दायित्व है, ताकि आने वाली पीढ़ियां विज्ञान की रोशनी में मानव सेवा का आदर्श अपनाएं।

— रिपोर्ट: डॉ भानु प्रताप सिंह

कौन हैं  डॉ. वेद भारद्वाज

स्व० डॉ० वेद भारद्वाज कुष्ठ रोग अनुसंधान (Leprosy Research) के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। उन्होंने आगरा के एस.एन. मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग में कार्य करने के बाद टोक्यो, जापान के कैंसर संस्थान (Cancer Institute) में भी कार्य किया, जहाँ उन्होंने कैंसर अनुसंधान के क्षेत्र में मौलिक शोध पत्र प्रकाशित किए।

जापान से लौटने के उपरांत वे भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के आगरा स्थित राष्ट्रीय जालमा संस्थान (NJILOMD) में शामिल हुए और वहीं से निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए।

स्व० डॉ० भारद्वाज के 110 से अधिक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए तथा कुष्ठ रोग अनुसंधान से संबंधित 6 पुस्तकों के अध्याय भी उन्होंने लिखे। उन्होंने 100 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध प्रस्तुत किए। उन्हें 31 अंतर्राष्ट्रीय और 17 राष्ट्रीय सम्मेलनों में मुख्य वक्ता, अतिथि व्याख्याता तथा सत्राध्यक्ष के रूप में आमंत्रित किया गया।

उन्होंने लंदन स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च में डॉ. आर. जे. डब्ल्यू, रीज और उनकी टीम के साथ मिलकर कुष्ठ रोगाणु M- Leprae के चयापचय, कीमोथेरेपी और वैक्सीन से संबंधित शोध किया। इस शोध कार्य को आगे बढ़ाते हुए एन.जे.आई.एल.ओ.एम.डी., आगरा में उन्होंने अध्ययन किया, जिसके लिए उन्हें आई.सी.एम.आर. का “जालमा ट्रस्ट फंड ओरेशन अवार्ड एवं स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।

स्व० डॉ. भारद्वाज ने क्योटो विश्वविद्यालय, जापान में अतिथि शोधकर्ता के रूप में इम्यूनोएपिडेमियोलॉजी ऑफ लैप्रोसी तथा कुष्ठ रोग की अल्ट्रास्ट्रक्चरल स्टडीज पर प्रो. एम. निशूरा के साथ शोध किया। उन्होंने टोक्यो स्थित नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर लैप्रोसी रिसर्च में डॉ. एम. आबे के साथ मिलकर कुष्ठ रोग की सेरोएपिडेमियोलॉजी पर कार्य किया और एफ.एल.ए. ए.बी.एस. टेस्ट (FL.A-ABS Test) में संशोधन कर प्रारंभिक अवस्था में कुष्ठ रोग की पहचान की विधि विकसित की।

उन्होंने इवाते मेडिकल यूनिवर्सिटी, मोरिओका, जापान में प्रो. एम. इजाकी के साथ “मेकैनिज्म ऑफ रिएक्शन इन लैप्रोसी” पर शोध किया। उन्हें डब्ल्यू.एच.ओ. ससाकावा मेमोरियल हेल्थ फाउंडेशन, टोक्यो द्वारा आयोजित “रैपिड डायग्नॉस्टिक मेथड्स फॉर M- Leprae इन्फेक्शन्स” के बहुकेंद्रीय कार्यदल में सदस्य के रूप में भी आमंत्रित किया गया।

स्व० डॉ. भारद्वाज ने केवल शोधकार्य ही नहीं किया, बल्कि 1977 से ही कुष्ठ रोगियों के सामाजिक पुनर्वास और सेवा कार्यों में भी गहरी रुचि ली। वे कुष्ठ सेवा सदन, आगरा (स्थापित 1861) में सामाजिक सेवा एवं स्वास्थ्य शिक्षा गतिविधियों का संचालन आजीवन करते रहे। उनकी इस पहल से हजारों लोग तथा स्कूली बच्चे कुष्ठ रोग के बारे में जागरूक हुए और कुष्ठ रोग के प्रति फैले कलंक (Stigma) को दूर करने में मदद मिली। सामाजिक सेवा में गहरी संलग्नता के लिए 1993 में उन्हें मदर टेरेसा ने आशीर्वाद दिया और जर्मन लैप्रोसी रिलीफ एसोसिएशन का एरविन स्टिंडल मेमोरियल ओरशन अवार्ड भी प्रदान किया गया।

स्व० डॉ० भारद्वाज भारतीय कुष्ठ विज्ञान संघ (IAL) के आजीवन सदस्य रहे और वहाँ उन्होंने मानद सचिव तथा प्रथम उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके खाते में 7 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दर्ज हैं।

स्व० डॉ० वेद भारद्वाज एक प्रतिष्ठित एवं व्यापक रूप से यात्राएँ करने वाले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कुष्ठ रोग कांग्रेसों में भाग लिया- नई दिल्ली (भारत), हेग (नीदरलैंड), ऑरलैंडो (अमेरिका), ब्रुसेल्स (बेल्जियम), बीजिंग (चीन दो बार)। इसके अलावा IAL की लगभग सभी महत्वपूर्ण बैठकों में उन्होंने अपने शोध प्रस्तुत किए।

 

Dr. Bhanu Pratap Singh