आगरा में सबसे कम आयु का स्वयंसेवक बना आकर्षण का केंद्र, 8 माह का हृदयम पूर्ण गणवेश में पहुंचा RSS के श्री गुरुदक्षिणा कार्यक्रम में

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संघ के शताब्दी वर्ष में नन्हे स्वयंसेवक ने खींचा सबका ध्यान, परिवार से ही शुरू होता है राष्ट्रसेवा और भारतीय संस्कृति का संस्कार

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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.

आगरा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के श्रीगुरुदक्षिणा कार्यक्रम में उस समय सभी की निगाहें एक नन्हे स्वयंसेवक पर ठहर गईं, जब मात्र आठ माह का बालक हृदयम चौहान पूर्ण गणवेश में अपने परिवार के साथ कार्यक्रम में पहुंचा। राष्ट्रभक्ति और संस्कारों की यह अनुपम झलक देखकर उपस्थित स्वयंसेवक एवं अतिथि भावविभोर हो उठे।

आषाढ़ शुक्ल गुरुपूर्णिमा, विक्रम संवत् 2083, तदनुसार बुधवार 29 जुलाई 2026 को माधव भवन, जयपुर हाउस, आगरा में आयोजित श्रीगुरुदक्षिणा कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भानु प्रताप सिंह चौहान अपने पुत्र जितेंद्र चौहान और अपने आठ माह के पौत्र हृदयम चौहान को पूर्ण गणवेश में लेकर पहुंचे। इस अवसर पर परिवार की तीसरी पीढ़ी की सहभागिता ने कार्यक्रम को विशेष बना दिया। उपस्थित लोगों ने इसे राष्ट्रभक्ति और पारिवारिक संस्कारों की जीवंत मिसाल बताया।

संस्कार निर्माण की अनूठी पाठशाला है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री भानु प्रताप सिंह चौहान ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक व्यापक सामाजिक अभियान है। संघ की शाखाओं में बच्चों से लेकर युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों तक सभी को अनुशासन, समयपालन, चरित्र निर्माण, सेवा, समरसता, संगठन, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। शाखा में खेल, योग, व्यायाम, गीत, प्रार्थना और बौद्धिक चर्चा के माध्यम से व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास किया जाता है।

शताब्दी वर्ष में प्रवेश, सेवा और संगठन का अद्भुत सफर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर शताब्दी वर्ष मना रहा है। एक शताब्दी की यात्रा में संघ ने शिक्षा, ग्राम विकास, सेवा, आपदा राहत, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, गौसेवा, परिवार प्रबोधन, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी जागरण और राष्ट्र चेतना जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। देशभर में लाखों स्वयंसेवक बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के समाज और राष्ट्र की सेवा में निरंतर जुटे हुए हैं। संघ का उद्देश्य सशक्त, संगठित और संस्कारित समाज का निर्माण करना है, जिससे राष्ट्र और अधिक समर्थ एवं आत्मनिर्भर बन सके।

संपादकीय

संस्कारों की यह विरासत आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है

आज जब आधुनिकता की दौड़ में अनेक परिवार अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभाव से जोड़ने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, ऐसे समय में भानु प्रताप सिंह चौहान और सचिन चौहान जैसे परिवार प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आते हैं। अपने आठ माह के बालक को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरुदक्षिणा कार्यक्रम में पूर्ण गणवेश के साथ ले जाना केवल एक औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि यह संदेश है कि राष्ट्रप्रेम, सेवा और संस्कारों की शिक्षा जीवन के प्रारंभिक संस्कारों से ही शुरू होनी चाहिए।

बच्चे वही बनते हैं जो वे अपने परिवार में देखते और सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति समर्पित होंगे तो आने वाली पीढ़ियां भी उसी मार्ग पर आगे बढ़ेंगी। चौहान परिवार ने तीसरी पीढ़ी को संघ के संस्कारों से जोड़कर यह सिद्ध किया है कि राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों से नहीं, बल्कि परिवार में बोए गए संस्कारों से होता है।

आज आवश्यकता ऐसे ही परिवारों की है, जो अपने बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि सेवा, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और भारतीय संस्कृति का अमूल्य संस्कार भी दें। यही संस्कार भविष्य के सशक्त भारत की आधारशिला बनेंगे।

डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक

Dr. Bhanu Pratap Singh