आगरा। “आर्यत्व बोलने की चीज नहीं, जीने का अनुशासन है।” इसी संदेश के साथ स्वामी रामदेव ने कमला नगर स्थित जनक पार्क में आयोजित आर्य महासम्मेलन के दूसरे दिन हरिद्वार से वर्चुअल संबोधन में वैचारिक स्वर तेज किए। उन्होंने कहा कि हमारे डीएनए में वेद और रक्त में पूर्वजों की संस्कृति बहती है, इसलिए आहार, वाणी, व्यवहार और आचरण में आर्यत्व दिखना चाहिए, केवल भाषणों में नहीं। सूर्य जैसा तेज और चंद्र जैसी शीतलता ही सच्चे आर्य की पहचान है।
स्वामी रामदेव ने राम की मर्यादा, कृष्ण के योगतत्व और शिव के शिवत्व को जीवन में उतारने का आह्वान करते हुए कहा कि अच्छे लोगों का संगठन और असामाजिक प्रवृत्तियों का दृढ़ विरोध समय की मांग है। स्पष्टता और साहस के बिना धर्म और राष्ट्र की रक्षा संभव नहीं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाखंड का विरोध केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि जड़ सोच और दिखावे के विरुद्ध भी होना चाहिए।
चरित्र निर्माण और आत्मतैयारी पर जोर
वक्तव्य में स्वामी दयानंद सरस्वती का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समाज सुधार का मूल आधार चरित्र निर्माण है। जाति-पाति, आडंबर और सामाजिक पाखंड से मुक्त भारत ही दयानंद का स्वप्न था। उनके अनुसार हिंदुत्व या वेद खतरे में नहीं, असली कमी आत्मतैयारी और संगठन की है।
संगठन की जरूरत पर उदाहरण
स्वामी रामदेव ने अन्य समुदायों के संगठनात्मक ढांचे का जिक्र करते हुए कहा कि हिंदू समाज को भी शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक मूल्यों के माध्यम से संगठित होने की जरूरत है, ताकि नई पीढ़ी स्वधर्म और नैतिक जीवन मूल्यों से जुड़ी रहे।
वेद, योग और नारी शिक्षा पर मंथन
सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने वेद, अष्टांग योग और नारी शिक्षा को समाज निर्माण की धुरी बताया। कन्या गुरुकुल सासनी की अधिष्ठाता आचार्या पवित्रा ने कहा कि नारी सशक्तिकरण नारों से नहीं, शिक्षा और संस्कार से आता है।
स्वामी आर्यवेश ने अष्टांग योग को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि का मार्ग बताते हुए इसे जीवनशैली का हिस्सा बनाने की बात कही, जबकि आचार्य विष्णुमित्र वेदारथी ने वैदिक सिद्धांतों और नैतिक जीवन मूल्यों पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम की शुरुआत योग, प्राणायाम और पंचकुंडीय यज्ञ से हुई। परिसर में वैदिक साहित्य की प्रदर्शनी लगी और सायंकाल महर्षि दयानंद पर आधारित फिल्म दिखाई गई। “वेद की ज्योति जलती रहे” के उद्घोष और वैदिक भजनों के बीच सम्मेलन का माहौल आध्यात्मिक और वैचारिक ऊर्जा से भरा रहा। बड़ी संख्या में आर्य समाज के पदाधिकारी और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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