आगरा: “सिर्फ सही समय पर हाथ धोने से 80 प्रतिशत बीमारियां रोकी जा सकती हैं… मुंह की स्वच्छता न रखने पर गर्भवती महिला और शिशु दोनों की सेहत प्रभावित हो सकती है… और कुपोषण का खतरा बढ़ जाता है।”
ऐसे कई महत्वपूर्ण संदेश पोषण पाठशाला के दौरान एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (आईसीडीएस) विभाग के ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिए गए।
पोषण माह के तहत आयोजित इस वर्चुअल ओरिएंटेशन कार्यशाला का विषय था — “महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण में स्वच्छता का महत्व”। कार्यशाला को संबोधित करते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी ने कहा कि, “स्वच्छता न केवल बच्चे के विकास बल्कि धात्री महिला की सेहत की भी कुंजी है। स्वच्छ व्यवहार न अपनाने पर महिला या बच्चा कुपोषण का शिकार हो सकता है। अगर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता स्वच्छता के महत्व को समझकर अपने क्षेत्र में व्यवहार परिवर्तन लाएंगी तो निश्चित रूप से प्रदेश में मातृ और शिशु स्वास्थ्य सूचकांकों में सुधार होगा।”
उत्तर प्रदेश टेक्निकल सपोर्ट यूनिट (UPTSU) के उपनिदेशक डॉ. दिनेश सिंह ने कहा कि स्वच्छता केवल सफाई नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिवर्तन है। उन्होंने बताया, “विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, बच्चा सबसे अधिक अपनी मां के संपर्क में रहता है। मां अपने बच्चे का नुकसान नहीं चाहती, लेकिन स्वच्छता का व्यवहार न होने से अनजाने में वह जोखिम बढ़ा देती है।
एनएफएचएस-5 के मुताबिक, 88 प्रतिशत लोग बिना उबाले या फिल्टर किए पानी का सेवन करते हैं, जिससे संक्रमण और कुपोषण की स्थिति बनती है।” उन्होंने यह भी बताया कि बच्चों की लगभग 68 प्रतिशत मौतें कुपोषण के कारण होती हैं और इसके पीछे स्वच्छता की कमी एक प्रमुख वजह है।
स्वास्थ्य व पोषण विशेषज्ञ सतीश श्रीवास्तव ने कहा कि स्वच्छता केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि एक समग्र जीवनशैली है जो शारीरिक, मानसिक और पोषण संबंधी स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करती है।
उन्होंने बताया कि गर्भावस्था में अस्वच्छता संक्रमण, समय पूर्व प्रसव, कम वजन वाले शिशु के जन्म और नवजात संक्रमण की संभावना को बढ़ाती है। प्रसव के बाद स्वच्छता की अनदेखी मातृ मृत्यु दर को भी बढ़ा सकती है। मासिक धर्म के दौरान अस्वच्छता से जननांग संक्रमण और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं, जिन्हें साफ-सुथरे नैपकिन और व्यक्तिगत वस्तुओं के साझा न करने जैसे व्यवहारों से रोका जा सकता है।
कार्यशाला में आईसीडीएस निदेशक सरनीत कौर ब्रोका और उपनिदेशक डॉ. अनुपमा शांडिल्य ने भी विभागीय कर्मचारियों को संबोधित करते हुए स्वच्छता को महिला और बाल स्वास्थ्य सुधार का मूल आधार बताया। उन्होंने यूनिसेफ, यूपीटीएसयू ,एनईसी और सीफार संस्था को सहयोग के लिए धन्यवाद भी ज्ञापित किया ।
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