​सपा-कांग्रेस में सीटों पर घमासान तेज: 200 सीटों की जिद पर अड़ी कांग्रेस, क्या बिखर जाएगा विपक्षी एकता का ताना-बाना?

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उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों की सियासी बिसात पर विपक्ष के भीतर की आपसी रस्साकशी अब खुलकर सामने आने लगी है। एक तरफ जहां भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने की कवायद चल रही है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच बढ़ते मतभेदों ने इस गठबंधन के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। हालांकि, दिल्ली के रामलीला मैदान में राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक ही मंच पर नजर आए थे, लेकिन यूपी की जमीनी राजनीति में लौटते ही स्वामी प्रसाद मौर्य के प्रकरण ने दोनों दलों के बीच दूरियां बढ़ा दी हैं।

कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की स्वामी प्रसाद मौर्य से मुलाकात और उन्हें ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल करने की खुली पैरवी ने सपा नेतृत्व को खासा नाराज कर दिया है।

खास बात यह है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही मौर्य को गठबंधन में किसी भी कीमत पर शामिल करने से साफ इंकार कर चुके हैं। इसके बावजूद, कांग्रेस का उनसे लगातार संपर्क में रहना दोनों दलों की प्राथमिकताओं के भारी अंतर को उजागर करता है।

​विवाद की शुरुआत और मौर्य की एंट्री पर घमासान

पूरे घटनाक्रम की सुगबुगाहट तब तेज हुई जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व—राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा—से मुलाकात कर ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा बनने की इच्छा जताई। मौर्य ने दावा किया कि उनकी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से सकारात्मक बातचीत हुई है। इसके तुरंत बाद, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दो टूक शब्दों में यह स्पष्ट कर दिया कि मौर्य के लिए पार्टी और गठबंधन में कोई जगह नहीं है, और आगामी विधानसभा चुनाव के सीट शेयरिंग फॉर्मूले में उन्हें कोई हिस्सा नहीं मिलेगा।

​सपा मुखिया के इस स्पष्ट रुख के बावजूद, कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने स्वामी प्रसाद मौर्य से मुलाकात की। जब इस मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, तो सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं। इन तस्वीरों के तूल पकड़ने पर कांग्रेस प्रभारी ने अपना बचाव करते हुए कहा कि मौर्य उनके पुराने मित्र हैं और सामाजिक न्याय की लंबी लड़ाई में साथ रहे हैं, इसलिए वह अपने मित्रों से मिलना बंद नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मौर्य और अखिलेश के बीच के गतिरोध को दोनों नेताओं को आपस में सुलझाना चाहिए।

​दूसरी तरफ, सपा खेमे का तीखा सवाल यह है कि जब पार्टी अध्यक्ष पहले ही गठबंधन में मौर्य की भूमिका को लेकर अपना रुख साफ कर चुके हैं, तो कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी लगातार उनसे मुलाकात कर क्या संदेश देना चाहते हैं।

​उधर, स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी अखिलेश यादव के बयान पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने दो टूक कहा कि उन्हें ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल करने या न करने का फैसला कांग्रेस को करना है और इसके लिए उन्हें किसी अन्य दल के मुखिया के ‘प्रमाण पत्र’ की कोई आवश्यकता नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व के साथ अपनी बातचीत का हवाला देते हुए मौर्य ने साफ किया कि उन्होंने सपा के कोटे की सीटें नहीं मांगी हैं। इस तरह मौर्य ने अपने राजनीतिक भविष्य को सपा के पाले से पूरी तरह हटाकर कांग्रेस नेतृत्व के साथ जोड़ लिया है।

​सीटों के बंटवारे के फार्मूले पर रस्साकशी

​कांग्रेस और सपा के बीच उपजा वैचारिक और राजनीतिक मतभेद केवल स्वामी प्रसाद मौर्य तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सीटों की दावेदारी को लेकर भी दोनों दलों के बीच बहुत बड़ा फासला है।

​कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम शुरुआती दौर की 150 सीटों की चर्चाओं को दरकिनार करते हुए अब 200 सीटों तक चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस की तरफ से लगभग 175 से 200 सीटों की एक सूची भी सपा को सौंपे जाने की बात सामने आई है। कांग्रेस इस बड़ी दावेदारी के पीछे अपने संगठनात्मक विस्तार, लोकसभा चुनावों में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन और राहुल गांधी के जनता के बीच पड़े प्रभाव का हवाला दे रही है।

​इसके विपरीत, सपा नेतृत्व कांग्रेस को उसकी वर्तमान विधानसभा की ताकत और संबंधित क्षेत्रों में जीत की संभावनाओं के आधार पर ही सीटें देना चाहता है। सपा के अंदरखाने से यह चर्चा है कि पार्टी कांग्रेस को लगभग 70 से 80 सीटें देने तक ही विचार कर रही है। कांग्रेस द्वारा इतनी बड़ी संख्या में सीटों की मांग किए जाने को सपा के कई नेता स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

​कांग्रेस का मुख्य तर्क यह है कि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उत्तर प्रदेश में ‘इंडिया’ गठबंधन की शानदार सफलता में राहुल गांधी की भूमिका बेहद अहम रही थी। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस पार्टी ने 6 सीटों पर विजय हासिल की थी, जिससे गठबंधन कुल 43 सीटें जीतने में कामयाब रहा था। कांग्रेस इस मोमेंटम को विधानसभा चुनाव में भी भुनाना चाहती है।

​कांग्रेस के लिए सीटों की संख्या केवल चुनाव लड़ने भर का सवाल नहीं है, बल्कि पार्टी इसके जरिए उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को दोबारा से जमीन पर खड़ा करने और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल होने के नाते गठबंधन का नेतृत्व अपने हाथ में रखना चाहती है और सीटों के बंटवारे में खुद को ड्राइविंग सीट पर बनाए रखना चाहती है। इसी बुनियादी सोच के अंतर के कारण, दोनों दलों के बीच बातचीत शुरू होने के बावजूद किसी ठोस सहमति पर पहुंचना आसान नजर नहीं आ रहा है।

ओबीसी वर्ग और पिछड़ों को साधने की सियासी रणनीति

​स्वामी प्रसाद मौर्य के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी की अत्यधिक सक्रियता के पीछे पिछड़े वर्गों (OBC) के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की सोची-समझी रणनीति भी काम कर रही है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में ऐसे तमाम क्षत्रपों और छोटे राजनीतिक दलों को अपने पाले में लाना चाहती है, जिनका विभिन्न पिछड़ी जातियों में अच्छा-खासा प्रभाव माना जाता है। मौर्य के अलावा संजय चौहान और अपना दल (कमेरावादी) से जुड़े नेताओं के साथ कांग्रेस नेतृत्व की हालिया बातचीत इसी बड़ी राजनीतिक कवायत का हिस्सा रही है।

​स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि इस पूरी रणनीति में एक अहम कड़ी है। समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद से ही मौर्य लगातार अखिलेश यादव की ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति पर खुलकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने दलितों और पिछड़ों के वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर कई बार सपा नेतृत्व की खुलकर आलोचना की है। अब कांग्रेस के साथ उनकी बढ़ती नजदीकियों ने इस पुराने विवाद को सीधे तौर पर विपक्षी गठबंधन के भीतर का एक बड़ा मुद्दा बना दिया है।

​विपक्षी एकता के समक्ष दोहरी चुनौती

​कांग्रेस और ठीक उसी समय सपा के बीच बढ़ते ये अंतर्विरोध ऐसे संवेदनशील वक्त पर सतह पर आए हैं, जब दोनों ही दल लोकसभा चुनावों में मिली भारी सफलता को आगामी विधानसभा चुनाव में भी दोहराने के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं।

​एक तरफ कांग्रेस जहां अपने सांगठनिक विस्तार के लिए अधिक से अधिक सीटों पर लड़ने और प्रभावशाली ओबीसी नेताओं को साथ लेकर नया जनाधार तैयार करने की फिराक में है, वहीं समाजवादी पार्टी अपने ‘पीडीए’ समीकरण और राज्य के सबसे बड़े विपक्षी दल होने की हैसियत के आधार पर ही गठबंधन की तमाम शर्तें तय करना चाहती है। पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की मंशा छोटे दलों और सामाजिक आधार वाले मजबूत चेहरों को जोड़कर अपनी चुनावी ताकत बढ़ाने की है, जबकि अखिलेश यादव गठबंधन में शामिल होने वाले हर एक दल और चेहरे के चयन को केवल और केवल अपनी जीत की संभावनाओं और सपा की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति के चश्मे से देख रहे हैं।

​यदि समय रहते इन दोनों प्रमुख दलों ने आपसी मतभेदों को दरकिनार कर कोई ठोस समन्वय नहीं बैठाया, तो यह आपसी खींचतान विपक्ष के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती साबित हो सकती है।

Dr. Bhanu Pratap Singh