पुलिस आयुक्त आगरा दीपक कुमार ने जलाया ‘काव्य दीपक’, आधी रात तक गूंजती रहीं कृष्ण भक्ति, देशभक्ति और हास्य की कविताएं

साहित्य

पुलिस आयुक्त आगरा दीपक कुमार ने जलाया ‘काव्य दीपक’, आधी रात तक गूंजती रहीं कृष्ण भक्ति, देशभक्ति और हास्य की कविताएं

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पुलिस लाइंस में साहित्य का अनूठा संगम—रात 8:30 बजे से 2:30 बजे तक चला कवि सम्मेलन

जब खाकी साहित्य का हाथ थाम ले, तो निश्चित ही समाज में भरोसे, संवेदना और संस्कृति की एक नई रोशनी जन्म लेती है।

डॉ भानु प्रताप सिंह

आगरा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर आगरा की पुलिस लाइंस में इस बार सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि साहित्य और कविता का ऐसा दीप प्रज्वलित हुआ, जिसकी रोशनी देर रात तक जनमानस के हृदय को आलोकित करती रही। पुलिस आयुक्त आगरा श्री दीपक कुमार ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पुलिस लाइंस में भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ कवि सम्मेलन का आयोजन कराकर साहित्य और संस्कृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया।

रात्रि 8:30 बजे प्रारंभ हुआ कवि सम्मेलन लगभग 2:30 बजे तक चला। हास्य, श्रृंगार, देशभक्ति, सामाजिक सरोकार और श्रीकृष्ण भक्ति से ओत-प्रोत कविताओं ने उपस्थित जनसमूह को कभी गुदगुदाया, कभी भावुक किया और कभी राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत कर दिया।

दीप प्रज्ज्वलन से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ कैबिनेट मंत्री श्री योगेन्द्र उपाध्याय, मंत्री श्री धर्मवीर प्रजापति, सांसद श्री राजकुमार चाहर, सांसद श्री नवीन जैन, विधायक श्री बाबूलाल चौधरी, विधायक श्री जी.एस. धर्मेश, पुलिस आयुक्त आगरा श्री दीपक कुमार, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मोनी शाण्डिल्य तथा अपर पुलिस आयुक्त श्री सचिन्द्र पटेल ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

समारोह का शुभारंभ करते अतिथि गण

इस अवसर पर जिलाधिकारी आगरा, समस्त पुलिस उपायुक्त, अपर पुलिस उपायुक्त, सहायक पुलिस आयुक्त, थाना एवं शाखा प्रभारी, पुलिसकर्मी, पुलिसकर्मियों के परिजन तथा क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

पत्नी संग मौजूद रहे पुलिस आयुक्त, कवियों का किया सम्मान

पुलिस आयुक्त दीपक कुमार अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मोनी शाण्डिल्य के साथ पूरे कार्यक्रम में मौजूद रहे। उन्होंने कवियों की रचनाओं को देर रात तक सुना और कार्यक्रम के अंत में सभी कवियों को सम्मानित किया।

पुलिस आयुक्त का साहित्य के प्रति यह अनुराग और कवियों के प्रति सम्मान उपस्थित लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।

अतिथियों को सम्मानित करते पुलिस आयुक्त दीपक कुमार

अशोक चौबे की पंक्तियों ने छू लिया दिल

कार्यक्रम के समन्वयक एवं जिला शासकीय अधिवक्ता अशोक चौबे एडवोकेट ने अपनी मार्मिक पंक्तियों से श्रोताओं को रोमांचित कर दिया—

“जीने के लिए खुद को मारते हैं लोग,
यह किस तरह से जिंदगी गुजारते हैं लोग।
जाते हैं इस जहां से यूं सब ही खाली हाथ,
हक दूसरों का किसलिए फिर मारते हैं लोग।”

इन पंक्तियों ने जीवन की विडंबनाओं और मनुष्य की स्वार्थपरता पर गहरी चोट की।

डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने खाकी की शान में बांधा समां

देशभक्ति की कविताओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने पुलिस की भूमिका और समर्पण को अपनी कविता के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी कविता पर पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा—

“जैसे संगम स्वर लहरी है देशभक्ति के गान की,
रक्षा करती है पल-पल पुलिस हमारी जान की।
नमन इस खाकी को, दीप हमारे घर जलते हैं,
ड्यूटी पर वह रहते, अपनी खुशियां त्याग हमारी खुशियों को सुख कहते हैं।”

कविता के माध्यम से उन्होंने पुलिसकर्मियों के त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रसेवा को नमन किया।

श्याम की मुरली और राधे-राधे से कृष्णमय हुआ वातावरण

डॉक्टर रुचि चतुर्वेदी ने अपनी भावपूर्ण रचना से वातावरण को कृष्णमय कर दिया—

“और तूने जब-जब जन्म लिया श्याम मुरलिया वाले,
खुल गए जेल के ताले।
जन्म सफल हो जाए, रटो बस राधे-राधे।”

उनकी प्रस्तुति ने जन्माष्टमी की आध्यात्मिक भावना को और गहरा कर दिया तथा श्रोता भक्ति रस में डूब गए।

कवि सम्मेलन में उपस्थित मंत्री और अन्य जन प्रतिनिधि

‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा’ ने बांधा समां

सुप्रसिद्ध गीतकार विष्णु सक्सेना की लोकप्रिय पंक्तियों ने श्रोताओं को प्रेम और संवेदना के गहरे संसार में पहुंचा दिया

“रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा,
एक लहर आएगी, कुछ बचेगा नहीं।
तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया,
पत्थरों पर लिखोगे, मिटेगा नहीं।”

इन पंक्तियों पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं।

मनवीर मधुर ने जगाया राष्ट्र चेतना का ज्वार

मथुरा के चर्चित कवि मनवीर मधुर ने राष्ट्र, पराक्रम और समय की आवश्यकता को अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए जनमानस को झकझोर दिया—

“भारत के शेरो, शांतिव्रत तोड़ दीजिएगा,
शत्रु के लिए विनाशकारी बन जाइए।
बाली दूसरों का हक छीनने की ताक में है,
आप श्रीराम से शिकारी बन जाइए।
गांधी के अहिंसावादी मूल्य मानिएगा किन्तु,
बोस जैसे क्रांति के पुजारी बन जाइए।
देश को है श्याम, आज बांसुरी की चाह नहीं,
वक्त चाहता है चक्रधारी बन जाइए।”

उनकी ओजपूर्ण प्रस्तुति ने पूरे वातावरण में राष्ट्रभक्ति और वीर रस का संचार कर दिया।

विनम्र सेन सिंह ने जोड़ा आधुनिकता और अतीत का रिश्ता

कवि विनम्र सेन सिंह ने बदलते समय और बदलते समाज की तस्वीर अपनी पंक्तियों में खींची—

“शहर-शहर, गांव-गांव बनते-बिगड़ते हैं लोग,
नई डगर, नया सफर चुनते हैं लोग।”

उनकी कविता में परंपरा और आधुनिकता के बीच बदलते सामाजिक परिवेश की झलक दिखाई दी।

काव्य पाठ का आनंद लेते लोग।

नीलोत्पल मृणाल ने ‘रील बनाने वाले लड़कों’ पर साधा निशाना

कवि नीलोत्पल मृणाल ने आज के युवाओं और पुराने दौर के युवाओं के बीच अंतर को अपनी चर्चित कविता के माध्यम से बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया। उनकी कविता पर श्रोताओं ने खूब ठहाके लगाए—

“स्कूलों की दीवारों पर जा दिल बनाने वाले लड़के,
चलती तीर को हंसके अपने दिल पर खाने वाले लड़के।
उड़ती तीर भी खुद पर लेकर लड़ भिड़ जाने वाले लड़के,
और दिल टूटे तो बिस्तर पर ही झील बनाने वाले लड़के।
उस दौर का जादू क्या जाने,
ये रील बनाने वाले लड़के।”

कविता ने पुराने दौर की भावनात्मक गहराई और आज के सोशल मीडिया युग के बीच का दिलचस्प अंतर सामने रखा।

कविता के बहाने पुलिस परिवारों को मिला सांस्कृतिक उत्सव

यह आयोजन पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के लिए भी विशेष रहा। आमतौर पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने वाले पुलिसकर्मियों को जन्माष्टमी के अवसर पर साहित्य, संगीत, कविता और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिला।

कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि पुलिस केवल कानून की रखवाली करने वाली संस्था नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति से जुड़ी संवेदनशील संस्था भी है।

दीपक कुमार की पहल बनी कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व पर इतने लंबे समय तक कवि सम्मेलन का आयोजन कराना अपने आप में उल्लेखनीय पहल रही। पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने पुलिस लाइंस को एक रात के लिए साहित्य के मंच में बदल दिया।

यह आयोजन इस बात का प्रमाण रहा कि जहां साहित्य जीवित रहता है, वहां संवेदना जीवित रहती है और जहां संवेदना जीवित रहती है, वहां समाज अधिक मानवीय बनता है।

पुलिस कमिश्नर के साथ कई गण और जन प्रतिनिधि

संपादकीय : जब खाकी ने जलाया काव्य का दीपक

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आगरा पुलिस लाइंस में आयोजित कवि सम्मेलन को केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम मानना इस आयोजन के महत्व को कम करके आंकना होगा। यह आयोजन दरअसल उस सोच का परिचायक है, जिसमें कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस समाज की सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना से भी अपना रिश्ता जोड़ती दिखाई देती है।

इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पुलिस आयुक्त आगरा श्री दीपक कुमार ने कवि सम्मेलन को केवल औपचारिकता नहीं बनने दिया। वे अपनी धर्मपत्नी के साथ देर रात तक कार्यक्रम में मौजूद रहे, कविताएं सुनीं और कवियों का सम्मान किया। आज के समय में, जब साहित्यिक आयोजनों में प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी कम होती जा रही है, वहां पुलिस आयुक्त का यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय है।

क्यों जरूरी हैं ऐसे आयोजन?

पुलिसकर्मी दिन-रात तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करते हैं। अपराध, दुर्घटना, विवाद, कानून-व्यवस्था और वीआईपी ड्यूटी के बीच उनके जीवन में सहज मनोरंजन और मानसिक विश्रांति के अवसर बहुत कम आते हैं। ऐसे में कविता, संगीत और संस्कृति पुलिस परिवारों के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक ऊर्जा का माध्यम भी बन सकते हैं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आयोजित इस कवि सम्मेलन ने पुलिसकर्मियों, उनके परिवारों और आम नागरिकों को एक साझा सांस्कृतिक मंच दिया। यही किसी भी सार्वजनिक आयोजन की सबसे बड़ी सफलता होती है।

दीपक कुमार ने परंपरा को आधुनिकता से जोड़ा

हमारे यहां त्योहारों की परंपरा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रही है। भारतीय संस्कृति में पर्व हमेशा से संगीत, साहित्य, लोककला, नाटक और काव्य के उत्सव भी रहे हैं। मंदिरों में भजन होते थे, राजदरबारों में कवि सम्मेलन होते थे और गांवों में लोकगीतों की महफिलें सजती थीं।

इसी परंपरा को आधुनिक परिवेश में आगे बढ़ाने का काम पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने किया है। जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के साथ हास्य, श्रृंगार, वीर रस, देशभक्ति और सामाजिक चेतना की कविताओं को एक मंच देना भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की सुंदर निरंतरता है।

पुलिस की छवि को मानवीय बनाने वाली पहल

अक्सर आम नागरिक पुलिस को केवल वर्दी, कानून और अनुशासन के नजरिए से देखता है। लेकिन वर्दी के पीछे भी एक संवेदनशील मनुष्य होता है—जिसका परिवार है, भावनाएं हैं, पसंद-नापसंद है और सांस्कृतिक जीवन भी है।

डॉ. रुचि चतुर्वेदी द्वारा पुलिस की शान में पढ़ी गई कविता ने इसी मानवीय पक्ष को सामने रखा। पुलिसकर्मियों के त्याग और कर्तव्य को शब्द देना केवल कविता नहीं, बल्कि उस खाकी के प्रति समाज का सम्मान भी है जो त्योहारों की रातों में भी अक्सर ड्यूटी पर तैनात रहती है।

साहित्य समाज का आईना है

कवि सम्मेलन में प्रस्तुत रचनाओं की विविधता भी उल्लेखनीय रही। कहीं कृष्ण भक्ति थी, कहीं देशभक्ति; कहीं प्रेम और संवेदना थी तो कहीं आधुनिक जीवन पर व्यंग्य। यही साहित्य की शक्ति है—वह समाज को हंसाता भी है, रुलाता भी है और जरूरत पड़ने पर आईना भी दिखाता है।

नीलोत्पल मृणाल की ‘रील बनाने वाले लड़कों’ पर कविता हो या मनवीर मधुर की चक्रधारी कृष्ण की पुकार—दोनों अपने-अपने तरीके से वर्तमान समाज को संबोधित करती हैं।

दीपक कुमार की पहल को मिलना चाहिए प्रोत्साहन

आगरा साहित्य और संस्कृति की धरती है। ताजमहल की नगरी में साहित्य की भी एक समृद्ध परंपरा रही है। ऐसे शहर में पुलिस प्रशासन द्वारा साहित्यिक आयोजनों को प्रोत्साहन मिलना निश्चित रूप से स्वागत योग्य है।

पुलिस आयुक्त दीपक कुमार की इस पहल की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। उन्होंने यह साबित किया है कि प्रशासनिक पद केवल आदेश देने के लिए नहीं होते; वे समाज को सकारात्मक दिशा देने के लिए भी होते हैं।

जरूरत इस बात की है कि ऐसी पहल एक आयोजन तक सीमित न रहे। पुलिस लाइंस में समय-समय पर कवि सम्मेलन, साहित्यिक गोष्ठियां, संगीत कार्यक्रम और सांस्कृतिक आयोजन होते रहें। इससे पुलिस परिवारों को स्वस्थ मनोरंजन मिलेगा और पुलिस तथा समाज के बीच संवाद का एक नया पुल भी बनेगा।

अंततः…

श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में केवल युद्ध का संदेश नहीं दिया था; उन्होंने कर्म, कर्तव्य और धर्म का संदेश दिया था। उसी कृष्ण जन्माष्टमी पर जब पुलिस प्रशासन ने साहित्य का दीपक जलाया, तो यह आयोजन प्रतीकात्मक रूप से भी बहुत अर्थपूर्ण बन गया।

पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने इस बार सचमुच ‘काव्य दीपक’ प्रज्वलित किया। यह दीपक देर रात तक कविताओं के रूप में जलता रहा और पुलिस लाइंस से निकलकर श्रोताओं के मन तक पहुंचा।

आगरा पुलिस आयुक्त को इस अभिनव और सराहनीय पहल के लिए साधुवाद। क्योंकि समाज को सुरक्षित रखने के लिए कानून जरूरी है, लेकिन समाज को संवेदनशील बनाए रखने के लिए साहित्य भी उतना ही जरूरी है।

और जब खाकी साहित्य का हाथ थाम ले, तो निश्चित ही समाज में भरोसे, संवेदना और संस्कृति की एक नई रोशनी जन्म लेती है।

Dr. Bhanu Pratap Singh